Saturday, 21 July 2018

दोहे

दोहे

कम्बल भीतर खा डरिस ,बटकी भर के खीर
बिना निशाना छोड़ दिस,टुटहा-टुटहा तीर



टोपी थी बे  नाप की ,भगवा रंग अभाव
बीचो- बीच पहन सभा ,दिखलाते क्या भाव
सुशील यादव

सूने घर जैसे बुने , मकड़ी अपना जाल
वैसे ही प्रभु नाम का,आता रहे ख्याल

बनना प्रभु का धाम भी ,कैसे बने विवाद
आधार-शिला में रखो ,समझौता बुनियाद

एक तुम्हारी सादगी ,दूजा व्यापक प्यार
उनतालिसवां है बरस,फूले-फले दयार

जी चाहा वैसा मिला,अतीव अतल अथाह
प्रेम भरी थी सादगी, अनुपम था उत्साह

किस दधीचि से मांगना , वज्र बनाने हाड
खतरे में आ बैठ लो,हिला हुआ है झाड़

कौन दधीची दे भला , वज्र बनाने हाड
खतरे में आ बैठ लो,हिला हुआ है झाड़


वर्षगाँठ का आज है ,उनतालिसवां साल
बीते सुख-दुःख साथ में ,प्रभु  रखना  खुशहाल
सुशील यादव

मन में हो गर आस्था ,ह्रदय विराजे प्रेम
वहां कभी क्या पूछना ,कुशल-मंगलम क्षेम

ह्रदय द्वार को खोलिये , करना हो व्यापार
अंधविश्वास  'सेल' में  ,लूटो अपरंपार
  सुशील यादव

मन्दिर बनवा राम का ,ह्रदय बसा लो राम
एक तीर  से हो सके ,शायद दो-दो काम



दो आगे दो को मिला ,हो जाए जब चार
समझौतों का तब दिखे ,होना बेडा पार
सुशील यादव

जी को अपने खोल कर ,दिखलाओ जी आज
दिखे योजना कागजी ,बन्दर बाँट समाज
सुशील यादव

लेना प्रभु का नाम भी ,जी का है जंजाल
हमें  वहीं पे छोड़ दो,होता जहां बवाल



  मंसूबा दिल से बता ,होता  कहाँ  सटीक
  कल भी तू बीमार था ,आज लगे  बस ठीक


कैसे कह दें हम  तुम्हे ,मर्यादा के राम
गिनती के दो-चार तो ,गिनवा दो बस काम


घर से मर्यादा गई ,मन से गया विवेक
आगे मस्तक क्या धरें ,कौन करे अभिषेक

मन  की अंतर्वेदना ,तन में करे खिंचाव
उलझे तनाव  दायरे , कैसे करें बचाव



मत जाओ तुम लांध कर ,गृह-मर्यादा आज
दिशा-हीन हर चाह को ,दण्डित करेसमाज


राजनीति में पालते ,भ्रष्टाचार-रखैल
सबकी माया  एक है,पैसा- पैसा खेल
सुशील यादव दुर्ग

दांत दर्द ..
दन्त कथा ..

दांती वज्र  प्रहार शनि,कैसे करे उपाय
इसी कृपा बूते कभी ,लाखों को निपटाय
##
आज कहूँ फिर से सुनो,कोई साधु न सिद्ध
आसमान से ताकता , सांप-छछुंदर गिद्ध
##
तन से मर्यादा गई ,मन से गया विवेक
आगे मस्तक क्या धरें ,कौन करे अभिषेक
##
सुशील यादव दुर्ग

 २३ जून १८


२३.६.१८


जेखर ये संसार में, लबरा हवे मितान
ठलहा मन के गोठ में,झन फूको जी प्रान
##

उजड़ चुका है बाढ़ में ,संयम का अब खेत
फसलो की मोती कहाँ ,दूर-दूर तक रेत

किस्से और कहानियां ,सब थी कल की बात
आज समय की मार है ,घूसा  लाठी लात

मुझे चाहता है मगर, नहीं बोलता यार
दो-दिन की बस दोस्ती,चार दिनों तकरार


अच्छे दिन के फेर में,किसको चुनते  आप
वजन बराबर तौल कर ,कद को फिर से नाप

झट से चढ़ जा सीढियां ,इस पीढ़ी की मांग
कोई कल को तोड़ दे ,भीम गदा से जांघ

हम पर ये किसने किया ,ऐसा वज्र-प्रहार
आज-अभी से ढूंढ़ लें ,कल का तारणहार


बाहर बैठे लोग हैं ,ज्ञान चक्षु को खोल
अगर चढा कोई नशा,चाणक्य बन के बोल


मोह गया-ममता गई ,राह-चाह  की सून
सर में गोली मार के  ,टेंशन फ्री कानून

पथ दिखलाता था कभी ,पथ से भटका आज
सबको  जिसपे  नाज था ,उतरा वो ही  ताज

कितनी हुई कवायदें ,  तुझको जाएँ  भूल
पर तेरी नादानियाँ , फिर करती मशगूल


तेरी मेरी नादानियां,अतीत समय की बात
दिशा- ध्रुव से ज्ञात है,तारा चमक प्रभात

मन के द्वार विराजिए , नटखट-मोहन- श्याम
धुला-ह्रदय मैं खोलता ,सुबह-दोपहर-शाम



बाहर बैठे लोग हैं ,ज्ञान चक्षु को खोल
अगर चढा कोई नशा,राजनीति में बोल


शायद मेरी साधना,निहित कहीं है खोट
हर ऊंचाई नाप कर,मैं पाता हूँ चोट

आज सभी ने खा लिया , पेट-भरा दो जून
कल की केवल राम पर , कैसा हो कानून

अब तो मेरे हाल पर, मुझको छोडो यार
करते-करते  तंग हूँ ,अपना ही किरदार
सुशील यादव दुर्ग

४जून १८

मेरे कद से नाप ले , कद यूँ  कभी- कभार
कुर्ता उजला साफ हो,नीयत हो  चमकार
जून 7

पाप  मुक्त सबको करे ,तेरा यह भगवान
उसके बाद मुझे  कहे ,आका कोई काम
सुशील यादव दुर्ग ,२ जून १८

शायद मेरी साधना, निहित कही पर खोट
हर ऊंचाई नाप कर,पाता रहता चोट
सुशील यादव दुर्ग, ३ जून १८


अब तो मेरे हाल पर ,मुझको छोडो आप
जो मुड़ कर देखा नहीं,मेरा रुदन विलाप
सुशील यादव दुर्ग, ३ जून १८

खूंटे पर ज्यों बांध दे ,निरीह कोई बैल
रुकती साँसे देखती ,जीवन उतरन मैल

परम सत्य आकाश है ,झूठ मोह पाताल
नया बसेरा  खोज तू,अपना आज सँभाल

क्यों कर अब तू पालता,परहित व्यापक मोह
अंत-शरण में दीखते ,केवल खाई-खोह

कभी  परों  को खोल दो, देखो सहज उड़ान
स्थापित करती बेटियां, आसमान  पहचान

नेकी के अब दिन लदे ,सेवा है बेकार
नाम कमा के क्या मिले ,ले जाए सरकार

मन की हर अवहेलना,दूर करो जी टीस
व्यवहारिकता जो बने ,ले लो हमसे फीस
सुशील यादव



तेरा दिल बस छोड़ के ,बाकी सब बकवास
तुझको केवल देख के ,आनन रहे उजास
सुशील यादव

साल नया स्वागत करो ,हो व्यापक दृष्टिकोण
अंगूठा छीने फिर  नहीं ,एकलव्य से  द्रोण
सुशील यादव

ध्वनि की आहट में सहज,मारा करता तीर
प्रतिमा केवल पूज के ,एकलव्य  गंभीर
सुशील यादव ,दुर्ग

भारी जैसे हो गए,नये साल के पांव
खाली सा लगने लगा,यही अनमना गांव
सुशील यादव

ना राहत  की योजना ,ना विकास के पाँव
जिसको पूछे वो कहे ,छुआ तरक्की  गांव

सुख के पत्तल चांट के ,गया पुराना साल
दोना भर के आस दे , बदला लिया निकाल
 
कलेंडर सब उतार दो ,गया पुराना साल
नये साल की  स्वागते,रंग नई दीवाल
सुशील यादव


तेरे पास अकल नहीं ,ले ले ज़रा उधार

तुझसे रिश्ता यूँ लगे ,कोई कर्ज उधार
पीसा की जमीन खड़ी, झुकती सी मीनार

बीते साल यही  कसक,हुए रहे भयभीत
कोसो दूर हमसे रहे ,सपने औ मनमीत

नवा साल उतरे मुड़ी ,जाबे काखर गांव |
साधन तोर घटे हवे ,काला खात-बचांव ||

सुरतावत बनते  बने,अइसन पाछू साल
अतका खिलिस कमल इहां,गाले गाल गुलाल
सुशील यादव दुर्ग

हाइकू

नहीं नाप की टोपी
रंग भगवा नहीं
कैसे पहने योगी

समय अब चलता नहीं
रुकी है ये घड़ी
कबाड़ निकलता नही

आप  मेहमान जहां
बातों की आंधी
बस  तूफान वहां

अपनी कद काठी के
तलाशें आदमी
बिना सुई-लाठी के

आराम किसे बोलो
बाट तराजू ला
देखो, झटपट तौलो

२७ जून१८

धरती की डोली ,उठ नहीं सकती
आसमा हिंडोले झूल नहीं सकता
मेरा मन वैसे ही तुम्हे ,भूल नहीं सकता
सुशील यादव    २८ जून १८
विवाह के चालीसवे प्रवेश द्वार पर स्वागत


दानी पिता का ऋण
#
दधीचि
की तरह थे ,मेरे पिता !
हम भाइयों ने जब भी मांगा
अपने हिस्से की अस्थियां
वे चुपचाप
समय के अंतराल में
एक -एक कर
हम सब को  देते गए ,
भीतर से खोखला  होते तक
बाटते  रहे अपनी अस्थियां
हम भाइयों के बीच |
#
हमे, उन अस्थियों को धार कर
आता नहीं था
वज्र बनाने का हुनर
सीखे नहीं थे किसी गुरुदेव की पाठशाला में
हो के एकाग्रचित्त
रण कौशल की
बारीकियां
आता नहीं था किसी चक्रव्यूह का
भेदना-निकलना,
अभिमन्यु  से हम भी
अधूरी जानकारी के अभिशप्त थे, पिता !...
#
-हम आपकी दी हुई इन अस्थियों की आहुति
आपकी चिता को साक्षी मान आज
इस मुक्तिधाम में करने को  हैं
प्रतिबद्ध,तत्पर
हम जीवन के रण  में
स्वत: को मानते हैं
पराजित योद्धा
नहीं जानते अब ,
किस पवित्र गंगा किनारे
आपकी समाधि बनाएं
और ...
आपको अनन्त काल तक
ऋणी बन के पूजते रहें
उन अस्थियों के
ऐवज ....?
###
 सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर जोन १ स्ट्रीट ३
दुर्ग छत्तीसगढ़
9408807420
susyadav7@gmail.com

@@

अश्वस्थामा ...

मेरे अश्व सापेक्ष  हिनहिनाने पर
मुझे नाम मिला अश्वस्थामा |
-जन्म से मेरे माथे पर
थी एक मणि
-देव -दानव
शस्त्र -व्याधि
देवता नाग से हरदम
रहता था मैं निर्द्वन्द
निर्भय
#
मेरे पिता,
द्रोणाचार्य की
धनुर्विद्या की पाठ-शाला में
अर्जुन जैसे धनुर्धारी  का हुआ
ज्ञानार्जन |
मेरे पिता थे
राजकीय निष्ठा के प्रतीक
जिसने
कौरव-पांडव युद्ध में
लिया राज का पक्ष
और बने
कौरवों के तरफदार
सेनापति ...
#
-युद्ध भूमि पर
पिता के संहार ने
भीम पुत्र घटोत्कच.
घटोत्कच पुत्र अंजनपर्वा
द्रुपदकुमार . शालानिक , बयानीक
राजा जयास्व,श्रुताहू
और कुंती भोज के दस पुत्रों को
किया धराशायी ....
@
उसी युद्ध भूमि में
पिता को साथ देने का
अकल्पनीय सुख
और सौभाग्य पाने का
मैं भी रहा  साक्षी ....
#
हमे परोसी जा रही जीत को
देख पाने का साहस
पांडव-दल को लगाने लगा
अकल्पनीय और
क्षीण होने लगी उनकी
रण जीतने की लालसा ..
@
पांडव सेना को
तितर-बितर होते देख
श्री कृष्ण ने
युधिष्ठिर से
कूटनीति का सहारा लेने
को कहा ,
एक सूत्र वाक्य नियोजित हुआ
"अश्वस्थामा मारा गया, परन्तु हाथी"
इसमें 'परन्तु हाथी' शब्द  को धीमे स्वर में
बोले जाने पर दिया गया जोर...
एक अफवाह के तौर
फैल गया 'अश्वस्थामा मारा गया "
#
अश्वस्थामा के आत्मज
गुरु द्रोण ने
सुनी हुई अफवाह का
निराकरण करना चाहा
धर्मराज युधिषिठर से
सत्यापित करने की गरज से पूछा
तब , वही संवाद को
वैसे ही व्यक्त किया
-'अश्वस्थामा मारा गया '
"परन्तु हाथी"
शब्द'परन्तु हाथी ' को
युद्ध की  शंख ध्वनि की भेट
चढा दिए जाने का
षड्यन्त्र
कर गया अपना काम

@@
पुत्र-मृत्यु शोक से ग्रस्त
द्रोण
शस्त्र त्याग कर
शोक मुद्रा में बैठ गए
निशब्द ,निष्चेष्ट ,तभी
द्रोपदी के भाई धृष्टधुम्न ने
काट दिया उनका गला
एक शक्तिशाली सेनापति
युद्ध-भूमि में हो गया
शांत ...
दूसरी तरफ
मल्लयुद्ध में भीम ने
चीर दी
दुर्योधन की जांघ।।।
#
एक साथ दो योद्धाओं की शिकस्त
दो आत्मीय का विछोह
दो ध्रुवो का अस्त
कर गया सर से पाँव तक
अश्वस्थामा को अस्त-व्यस्त
#
पांडव के रुख में
जीत की  ध्वनि
गूँजते हुए  आकाश से
पिघले हुए शीशे की तरह
उतरने लगे
पिता की ह्त्या और
अपने राजा की अकाल दशा ने
बना दिया अश्वस्थामा को अधीर
@
उनके आहत ह्रदय में उठे
सवालो का उत्तर  है कहाँ ?
आघात न सह  सकने वाला मन
एकाएक कैसे हो जा है विक्षिप्त
द्रोणपुत्र के अलावा कोई जान पायेगा ?
@
"मेरे क्रोध की ज्वाला
बुझा सकोगे कृष्ण ...?"
@
मेरे पिता की ह्त्या की साजिश के
तुम  थे सृजनकर्ता
नीति के निर्धारण में
तुम नहीं थे क्या अग्रणी ...
क्या तुमने गजराज के मरने वाले
सूत्र वाक्य को
उस मुह से नहीं बुलवाया था
जिनसे सत्य  के सिवा और कुछ
सीखा नहीं था बोलना
धर्म के विरुद्ध किसी राह का
जो अनुशरण कर्ता
अनुगामी नहीं था जो
##
ठीक भटकाव के
इसी जगह पर,
क्रोध की आग में
उठा लिया उसने
'नारायण- अस्त्र'
और ठान लिया
मारना
जन्मे -अजन्मे
पांडव  के 'कुल-कारको'  को
इस नराधम शौर्य प्रदर्शन पर
सभी योद्धाओं ने
डाल दिए अपने हथियार
द्रोपदी के पाँच पुत्र और भाई
धृष्टधुम्न को उतार दिया
मौत के घाट..
एक विकराल सनाटा
पसर गया चारो ओर
##
द्रोपदी विलाप सुन
उसी सन्नाटे में
अर्जुन की एक प्रतिज्ञा गूंजी
किसी भी सूरत
अश्वस्थामा का
काटना है सर
#
इस प्रतिज्ञा को सुन कर
भागा अश्वस्थामा ,
श्रीकृष्ण सारथि बन
अर्जुन गांडीव धरे
पीछा करते रहे....
-कहीं आश्रय मिलाता न देख
चला दिया, अश्वस्थामा ने ब्रम्हास्त्र
जिसे चलाने की,
विधा भर थी उसे मालुम
लौटाना ब्रम्हास्त्र का
आता नहीं था उसे,
इस ब्रम्हास्त्र से बचने का
अर्जुन और उसके सारथी के सामने
न था कोई उपाय
फिर सारथि- मन्त्रणा से प्रेरित हुआ अर्जुन
प्रत्युत्तर
छोड़ना पड़ा उसे भी
बचाव में ब्रम्हास्त्र ,,,
अग्नि, दावानल, कोहराम
हाहाकार मच गया तब चारों ओर
जनता होने लगी दग्ध ,
गनीमत अर्जुन को
आती थी विद्या
ब्रम्हास्त्र को  लौटाने की
सो लौटा लिया |और ..
बच गए लाखो निरीह ...
तत्पर,बांधा ,
धर दबोचा अश्वस्थामा को
बंधे हुए दीन अश्वस्थामा को
देख कृष्ण ने कहा
हे  अर्जुन,
यूँ तो
धर्मात्मा ,सोये हुए
असावधान
मतवाले ,पागल, अज्ञानी , रथहीन
स्त्री तथा बालक को मारना
धर्म के अनुसार है वर्जित ...
परन्तु इसने धर्म के विरुद्ध
किया है आचरण
इसने सोये हुए निरपराध बालको की
की है ह्त्या .
यदि रहेगा तब भी जीवित
फिर दुहरायेगा कलंक-गाथा
तुम करो अपनी प्रतिज्ञा पूरी
ले जाओ द्रोपदी समक्ष कटा सर
इस युद्ध -द्रोही का |
#
अर्जुन को गुरुपुत्र पर प्रहार करने में
आई दया
उसने जीवित अश्वस्थामा को कर दिया
द्रोपदी सम्मुख
#
पशु सदृश बंधा मानव देख
द्रोपदी विवश हो गई
करुणा  आगे
गुरुपुत्र!
उस पर ब्राम्हण
फिर उसकी ह्त्या का पाप ...?
बाँध दिए इन तर्कों ने
हथियार उठाने को उकसाने  वाले हाथ
इनकी माता कृपी को मैं,
दे न सकूँगी कोई जवाब ..
वो मां जिसने
पुत्र मोह के चलते
नकार दिया सती होना ,,,
फिर यह भी तो,
मेरे मरे पुत्र
इनके वध से
लौटाए नहीं जा सकते ...?
कई बार
बुरे अपमान से आहात नेत्री
फिर एक बार भटक  गई
दुविधाओं के जंगल में..
#
... किन्तु भीम नहीं हुआ शांत,
आक्रामक थे उनके तेवर ...

-मध्यस्थ कृष्ण ने  दिया सुझाव
वैसे अपराधी  नहीं होता क्षम्य
दंड का वो भागी हो जरूर
रही बात ,
पतित ब्राम्हण को ,दंड देना है पाप
तो आतताई को मुक्त करना भी, है पाप
अर्जुन तुम वो करो जो है उचित,
अर्जुन ने काटे,
अश्वस्थामा के सर के बाल
फिर निकाल ली मस्तक की मणि
वो मस्तक मणि जिसकी औरा में था
गजब का तेज ...
मणिहीन मस्तक और केश विहीन सर ने
कर दिया उसे श्रीहीन ...
इतना लज्जित नहीं हुआ था कभी
अश्वस्थामा ....|
अश्वस्थामा आज
भी  कहते
हैं जीवित
श्रीकृष्ण के श्राप से
है वह  कुष्ठ रोग से ग्रस्त
अपने पापो के पीप-लहुँ को
रिसते हुए देखने को
आजीवन अभिशप्त
###

 सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर जोन १ स्ट्रीट ३
दुर्ग छत्तीसगढ़
9408807420
susyadav7@gmail.com


पत्नी का अविष्वास प्रताव

पत्नी का अविश्वास प्रस्ताव

ऐ जी आप पहले जैसे नहीं रह गए ...!
एक वाक्य में पत्नी ने अविशास प्रस्ताव प्रस्तुत कर दिया |
हम सरकार के गिरने की उम्मीद लगा बैठे |
पगली तुम्हे आज चालीस साल बाद ये महसूस क्यों हुआ ..?
देखो हमने विकास के कितने सारे काम किये हैं |तुमने सब चूल्हे में झोक दिया ...?
बताओ क्या कमी देखती हो अपने सरकार में
फिर हम भी अपनी सरकार की सुनाएंगे तो, समझो चलती गाड़ी का पहिया बिलकुल रुक जाएगा |
मेरी चेतावनी पर ध्यान वो अक्सर नहीं देती ,इस बार भी वो इसे इग्नोर कर जाती ,मगर हम जज्बाती होकर ज़रा तल्खी में बोल गए थे लिहाजा मामले ने दाम्पत्य जीवन के शांति भंग की सीमा लांघ ली थी | वह कुछ नरम पड़ी |
हम जानते थे कि दिलासा का ज़रा सा भी हाथ फेरा तो,वह सुबक पड़ेगी ....!
नार्मल करने के अंदाज में पूछा ,देखो तुम्हारा बैल जैसा पति आफिस से सीधे घर आता है | अद्धी-पौव्वा का औरों की तरह चक्कर नहीं पालता | ढेरो बालाएं-बलाएं  आफिस से घर के बीच टकराती घूमती  हैं उनसे बच के निकला रहता है ,फिर बताओ, ये क्या बात हुई "आप पहले जैसे नहीं रह गए ".... ?
चलो पहले वाली खूबियां गिनवा दो ,खामिया बाद में सुन कर देखेंगे क्या बात है ?आज शादी के चालीस साल बाद तुमने विपक्ष की तरह लंबा मुह खोला है |
जब हनीमून में गए थे तब आप कैसे आगे आगे हर काम किये रहते थे | स्टेशन से बेग लादना ,हर रेस्टोरेंट में आर्डर देने के पहले बाकायदा पसन्द का पूछना ,हर शापिंग माल में बिना ऐतराज के मेरी ली हुई चीजो का तारीफ करना ,उस पर ये कहना वेणु तुम्हारी पसन्द लाजवाब है | मैं विभोर हो जाती थी | तुम ये भी कहते तुम्हार टेस्ट अच्छा है वेणु
इस चक्कर में शायद मैं भी पसन्द आ गया ना ?
सभी मर्द  शादी की शुरुआत यूँ ही करते हैं क्या ....?
मैंने कहा वेणु ,अरसा पहले कहीं पढ़ा था ,जब आदमी नई कर लेता है और बीबी बैठने को आती है तो पति दरवाजा खुद खोलता है | इसे देखकर लोग दो अनुमान लगाते हैं, या तो कार नई है या शायद बीबी ....,मेरे इस जोक की पालिश उसको कुछ उतरी हुई लगी |
वह तर्क के दूसरे सिरे को पकड़ने को हुई ,जनाब ! शादी के शुरूआती दिनों में आपकी हालत अपने स्टेट जैसी जर्जर थी ,न सलीके का पहनना आता था न कोई खाने-पीने की टेस्ट थी | मैं सिर्फ खाने की कह रही हूँ ,पीने की शुरूआती टेस्ट तो आपने, दोस्तों की संगत में आजमाना चालु कर दिया था |
-मैं आपकी  डेंटिंग-पेंटिंग क्लास सख्ती से न लेती तो आप ढोलक माफिक फूल गए होते ....?
उलाहना दर उलाहना मुझे झुकाने, नीचे पटकने का यह अर्धवार्षिक कायर्क्रम पिछले कुछ दिनों से तिमाही के स्तर पर सेंसेक्स की भाँती लुढ़क गया है |
मुझे  अपनी टी आर पी सुधारर्ने का नुस्खा तब हासिल होता है, जब कोई धांसू चीज लिख के उम्दा मैगजीन में छपवा लूँ |
-मैं  फक्र से उन्हें दिखा कर कहता, ये छपी है देख लो| इस प्र्दशन नुमाइश में वह आर्थिक पहलू पर नजर रखती है ,इस छपे पर कितना मिलेगा ...? मैं कहता, वे आजकल कुछ देते-वेते नहीं | उलटे ईमेल से भेजो तो नखरे दिखाते हैं ,हम ईमेल की रचना स्वीकार नहीं करते | भाई लोग हार्ड कॉपी माँगते हैं | चार रचनाओं के स्पीड पोस्ट में भेजते,किसी गरीब लेखक का क्या होता होगा पता नहीं ..?

मैं देखती हूँ ,जब भी अपने गुस्से का व्यावहारिक इजहार करती हूँ तो आप अपनी साहित्य-यात्रा में निकल पड़ते हैं या इसे  बीच में ढल बना खड़े हो जाते हैं | साहित्यक भाव  हम्मे भी मौजूद हैं मगर आपके चूल्हे-चकले के झंझट में वहीँ रोटी माफिक गोल हो जाते हैं | हाँ तो मैं कह रही थी ,"आप आजकल बदल गए है",
-मैंने बात को फिर मरोड़ा , हाँ साठ साल की उम्र बदलने की ही होती है |
रिटायरमेंट के फकत छह महीनों में ये हाल है,हमे घर बैठे देख ऊब जाने का , तो आगे अल्ला जाने क्या होगा ,मौला जाने क्या होगा ?
-देखो घर में दिन भर, कोट-टाई में, हिंदुस्तान का कोई भी माई का लाल नहीं रहता |
देशी स्टाइल, यानी लुंगी -पाजामा कुरता ,बनियान यही लपेटे रहता है |
हमसे ज़रा नीचे लेबल बाले लोग तो धारीदार चड्डियों में ही पाए जाते हैं |
अब इसे बदलना कहते हैं तो बेशक हम बदल गए हैं |
-वह बेकार की बातों पर कान धरने की फुरसत नहीं पा रही थी |
उसने झल्लाते हुए अंतिम हथियार की सौगात ब्रम्हास्त्र के रूप में दी ,गुस्से में पूछी ,
आज तारीख क्या है ,मैंने सहजता से कहा छह अगस्त .....? कल ही तो बैंक  से विथ-ड्रावल करके घर खर्चे वाली रकम दी थी की नहीं ,मैंने याददास्त पर जोर देकर बताया |
-उधर से  दांत पीसने की प्रतिक्रिया नजर आई ..... बस छह अगस्त .....
फिर कल .....?
मैंने उसी सहजता से फिर कहा एक दिन पहले तो पाँच अगस्त हुआ न ..न..न ..?
पांच अगस्त याद करते ही  मेरी जीभ लड़खड़ा गई .....!
- सारी वेणु डार्लिंग मुझे तुम्हारा बर्थडे परसों तक बामुक़म्मल याद था मैंने आराधना ज्वेलर्स को एक तारीख को बाकायदा आर्डर दिया है नए डिजाइन के नेकलेस का| ये वही नेकलेस है जिसे तुम हसरत से रिटायरमेंट के पहले उस ज्वेलर्स की शाप में देख रही  थी| मैंने खुद से  वादा किया था रिटायरमेंट के बाद की पहली   बर्थडे पर इस बार वो तोहफा तुम्हे दूंगा |
उसके मुरझाये चहरे पर तनिक विश्वास लौटा |
वह मेरे चरण छूने को झुकी मैंने बाहों मे थाम लिया |
मैंने उससे कहा, हर बर्थडे पर तुम पैर छूती थी कल क्या हुआ जो ....?
अगर छू लेती तो मुझे याद नहीं आ जाता क्या ....?
-मैं ये देखना चाहती थी मेरे भुल्लकड़ राम क्या-क्या भूल सकते हैं .....?मैंने मौन व्रत ले रखा था अपनी तरफ से ...कई बहाने किये आपको याद आ जाए,मगर आप अब अलग दुनिया में खोये रहते हैं |
चलो ज्वेलर्स के पास चलें वरना .....?
मैंने चलने की तैयारी करते पूछ लिया ,बच्चो ने विश किया ....?
-वह फिर उदासी की लंम्बी गुफा में समाने आ गई,उच्छवास के साथ बोली ,
'आजकल सब अपनी लाइफ जीते हैं .... पता नहीं उन्हें याद भी हो या नहीं ...?'
हो सकता है , उधर की तारीख एक दिन बाद आती है, शायद आज कोई याद कर ले ...?
मैंने कहा कोई बात नहीं , छोडो , मेरी तरह भूल जाओ उनको ,
-तुम अपनी मर्जी की आज पूरी शापिंग कर लो ....मैंने ऐ. टी. एम, कार्ड को चेक कर वालेट में रखा ...... बाहर ही खाकर लौटेंगे |
वह निशब्द साथ हो ली ....|
मुझे लगा ...
अविश्वास प्रस्ताव ने आखिर दम तोड़ दिया |

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर
जोन १ स्ट्रीट ३ दुर्ग छत्तीसगढ़