Saturday, 21 July 2018

अश्वस्थामा ...

मेरे अश्व सापेक्ष  हिनहिनाने पर
मुझे नाम मिला अश्वस्थामा |
-जन्म से मेरे माथे पर
थी एक मणि
-देव -दानव
शस्त्र -व्याधि
देवता नाग से हरदम
रहता था मैं निर्द्वन्द
निर्भय
#
मेरे पिता,
द्रोणाचार्य की
धनुर्विद्या की पाठ-शाला में
अर्जुन जैसे धनुर्धारी  का हुआ
ज्ञानार्जन |
मेरे पिता थे
राजकीय निष्ठा के प्रतीक
जिसने
कौरव-पांडव युद्ध में
लिया राज का पक्ष
और बने
कौरवों के तरफदार
सेनापति ...
#
-युद्ध भूमि पर
पिता के संहार ने
भीम पुत्र घटोत्कच.
घटोत्कच पुत्र अंजनपर्वा
द्रुपदकुमार . शालानिक , बयानीक
राजा जयास्व,श्रुताहू
और कुंती भोज के दस पुत्रों को
किया धराशायी ....
@
उसी युद्ध भूमि में
पिता को साथ देने का
अकल्पनीय सुख
और सौभाग्य पाने का
मैं भी रहा  साक्षी ....
#
हमे परोसी जा रही जीत को
देख पाने का साहस
पांडव-दल को लगाने लगा
अकल्पनीय और
क्षीण होने लगी उनकी
रण जीतने की लालसा ..
@
पांडव सेना को
तितर-बितर होते देख
श्री कृष्ण ने
युधिष्ठिर से
कूटनीति का सहारा लेने
को कहा ,
एक सूत्र वाक्य नियोजित हुआ
"अश्वस्थामा मारा गया, परन्तु हाथी"
इसमें 'परन्तु हाथी' शब्द  को धीमे स्वर में
बोले जाने पर दिया गया जोर...
एक अफवाह के तौर
फैल गया 'अश्वस्थामा मारा गया "
#
अश्वस्थामा के आत्मज
गुरु द्रोण ने
सुनी हुई अफवाह का
निराकरण करना चाहा
धर्मराज युधिषिठर से
सत्यापित करने की गरज से पूछा
तब , वही संवाद को
वैसे ही व्यक्त किया
-'अश्वस्थामा मारा गया '
"परन्तु हाथी"
शब्द'परन्तु हाथी ' को
युद्ध की  शंख ध्वनि की भेट
चढा दिए जाने का
षड्यन्त्र
कर गया अपना काम

@@
पुत्र-मृत्यु शोक से ग्रस्त
द्रोण
शस्त्र त्याग कर
शोक मुद्रा में बैठ गए
निशब्द ,निष्चेष्ट ,तभी
द्रोपदी के भाई धृष्टधुम्न ने
काट दिया उनका गला
एक शक्तिशाली सेनापति
युद्ध-भूमि में हो गया
शांत ...
दूसरी तरफ
मल्लयुद्ध में भीम ने
चीर दी
दुर्योधन की जांघ।।।
#
एक साथ दो योद्धाओं की शिकस्त
दो आत्मीय का विछोह
दो ध्रुवो का अस्त
कर गया सर से पाँव तक
अश्वस्थामा को अस्त-व्यस्त
#
पांडव के रुख में
जीत की  ध्वनि
गूँजते हुए  आकाश से
पिघले हुए शीशे की तरह
उतरने लगे
पिता की ह्त्या और
अपने राजा की अकाल दशा ने
बना दिया अश्वस्थामा को अधीर
@
उनके आहत ह्रदय में उठे
सवालो का उत्तर  है कहाँ ?
आघात न सह  सकने वाला मन
एकाएक कैसे हो जा है विक्षिप्त
द्रोणपुत्र के अलावा कोई जान पायेगा ?
@
"मेरे क्रोध की ज्वाला
बुझा सकोगे कृष्ण ...?"
@
मेरे पिता की ह्त्या की साजिश के
तुम  थे सृजनकर्ता
नीति के निर्धारण में
तुम नहीं थे क्या अग्रणी ...
क्या तुमने गजराज के मरने वाले
सूत्र वाक्य को
उस मुह से नहीं बुलवाया था
जिनसे सत्य  के सिवा और कुछ
सीखा नहीं था बोलना
धर्म के विरुद्ध किसी राह का
जो अनुशरण कर्ता
अनुगामी नहीं था जो
##
ठीक भटकाव के
इसी जगह पर,
क्रोध की आग में
उठा लिया उसने
'नारायण- अस्त्र'
और ठान लिया
मारना
जन्मे -अजन्मे
पांडव  के 'कुल-कारको'  को
इस नराधम शौर्य प्रदर्शन पर
सभी योद्धाओं ने
डाल दिए अपने हथियार
द्रोपदी के पाँच पुत्र और भाई
धृष्टधुम्न को उतार दिया
मौत के घाट..
एक विकराल सनाटा
पसर गया चारो ओर
##
द्रोपदी विलाप सुन
उसी सन्नाटे में
अर्जुन की एक प्रतिज्ञा गूंजी
किसी भी सूरत
अश्वस्थामा का
काटना है सर
#
इस प्रतिज्ञा को सुन कर
भागा अश्वस्थामा ,
श्रीकृष्ण सारथि बन
अर्जुन गांडीव धरे
पीछा करते रहे....
-कहीं आश्रय मिलाता न देख
चला दिया, अश्वस्थामा ने ब्रम्हास्त्र
जिसे चलाने की,
विधा भर थी उसे मालुम
लौटाना ब्रम्हास्त्र का
आता नहीं था उसे,
इस ब्रम्हास्त्र से बचने का
अर्जुन और उसके सारथी के सामने
न था कोई उपाय
फिर सारथि- मन्त्रणा से प्रेरित हुआ अर्जुन
प्रत्युत्तर
छोड़ना पड़ा उसे भी
बचाव में ब्रम्हास्त्र ,,,
अग्नि, दावानल, कोहराम
हाहाकार मच गया तब चारों ओर
जनता होने लगी दग्ध ,
गनीमत अर्जुन को
आती थी विद्या
ब्रम्हास्त्र को  लौटाने की
सो लौटा लिया |और ..
बच गए लाखो निरीह ...
तत्पर,बांधा ,
धर दबोचा अश्वस्थामा को
बंधे हुए दीन अश्वस्थामा को
देख कृष्ण ने कहा
हे  अर्जुन,
यूँ तो
धर्मात्मा ,सोये हुए
असावधान
मतवाले ,पागल, अज्ञानी , रथहीन
स्त्री तथा बालक को मारना
धर्म के अनुसार है वर्जित ...
परन्तु इसने धर्म के विरुद्ध
किया है आचरण
इसने सोये हुए निरपराध बालको की
की है ह्त्या .
यदि रहेगा तब भी जीवित
फिर दुहरायेगा कलंक-गाथा
तुम करो अपनी प्रतिज्ञा पूरी
ले जाओ द्रोपदी समक्ष कटा सर
इस युद्ध -द्रोही का |
#
अर्जुन को गुरुपुत्र पर प्रहार करने में
आई दया
उसने जीवित अश्वस्थामा को कर दिया
द्रोपदी सम्मुख
#
पशु सदृश बंधा मानव देख
द्रोपदी विवश हो गई
करुणा  आगे
गुरुपुत्र!
उस पर ब्राम्हण
फिर उसकी ह्त्या का पाप ...?
बाँध दिए इन तर्कों ने
हथियार उठाने को उकसाने  वाले हाथ
इनकी माता कृपी को मैं,
दे न सकूँगी कोई जवाब ..
वो मां जिसने
पुत्र मोह के चलते
नकार दिया सती होना ,,,
फिर यह भी तो,
मेरे मरे पुत्र
इनके वध से
लौटाए नहीं जा सकते ...?
कई बार
बुरे अपमान से आहात नेत्री
फिर एक बार भटक  गई
दुविधाओं के जंगल में..
#
... किन्तु भीम नहीं हुआ शांत,
आक्रामक थे उनके तेवर ...

-मध्यस्थ कृष्ण ने  दिया सुझाव
वैसे अपराधी  नहीं होता क्षम्य
दंड का वो भागी हो जरूर
रही बात ,
पतित ब्राम्हण को ,दंड देना है पाप
तो आतताई को मुक्त करना भी, है पाप
अर्जुन तुम वो करो जो है उचित,
अर्जुन ने काटे,
अश्वस्थामा के सर के बाल
फिर निकाल ली मस्तक की मणि
वो मस्तक मणि जिसकी औरा में था
गजब का तेज ...
मणिहीन मस्तक और केश विहीन सर ने
कर दिया उसे श्रीहीन ...
इतना लज्जित नहीं हुआ था कभी
अश्वस्थामा ....|
अश्वस्थामा आज
भी  कहते
हैं जीवित
श्रीकृष्ण के श्राप से
है वह  कुष्ठ रोग से ग्रस्त
अपने पापो के पीप-लहुँ को
रिसते हुए देखने को
आजीवन अभिशप्त
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 सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर जोन १ स्ट्रीट ३
दुर्ग छत्तीसगढ़
9408807420
susyadav7@gmail.com


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