Saturday, 21 July 2018


दानी पिता का ऋण
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दधीचि
की तरह थे ,मेरे पिता !
हम भाइयों ने जब भी मांगा
अपने हिस्से की अस्थियां
वे चुपचाप
समय के अंतराल में
एक -एक कर
हम सब को  देते गए ,
भीतर से खोखला  होते तक
बाटते  रहे अपनी अस्थियां
हम भाइयों के बीच |
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हमे, उन अस्थियों को धार कर
आता नहीं था
वज्र बनाने का हुनर
सीखे नहीं थे किसी गुरुदेव की पाठशाला में
हो के एकाग्रचित्त
रण कौशल की
बारीकियां
आता नहीं था किसी चक्रव्यूह का
भेदना-निकलना,
अभिमन्यु  से हम भी
अधूरी जानकारी के अभिशप्त थे, पिता !...
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-हम आपकी दी हुई इन अस्थियों की आहुति
आपकी चिता को साक्षी मान आज
इस मुक्तिधाम में करने को  हैं
प्रतिबद्ध,तत्पर
हम जीवन के रण  में
स्वत: को मानते हैं
पराजित योद्धा
नहीं जानते अब ,
किस पवित्र गंगा किनारे
आपकी समाधि बनाएं
और ...
आपको अनन्त काल तक
ऋणी बन के पूजते रहें
उन अस्थियों के
ऐवज ....?
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 सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर जोन १ स्ट्रीट ३
दुर्ग छत्तीसगढ़
9408807420
susyadav7@gmail.com

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