Wednesday, 11 December 2024

 

136....

8.12.24

कोचक- कोचक के

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मोरे गोड़ इहाँ, अबड़े  खजुवावत हे

संगी चुनाव लड़त बेरा, सुरतावत हे

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रेल में चढ़ के महू ,जातेंव  अपन गाँव

ऐ खानी भीड़ मारे, पोटा  कपकपावत

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लोगन जानत,  दू फाड़ गाव के मनखे

डोंगा संसो के,  डोलत- डगमगावत हे

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माई-लोगन कोनो, कहुँ जा समझातेव

लइका मुँहजोरि,  पुरखा जोत बुतावत हे

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नेता मन   जीते हारे ,  चारे दिन बर खेला

कोचक- कोचक के कोन तुमला  बगियावत हे

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सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)

7000226712

 


 

137...

10.12.24

 

behr-e-paa.nch-fauulun

fa'uulun fa'uulun fa'uulun fa'uulun fa'uulun

122  122 122 122 122

 

लालच लकीरें ....

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मेरे सामने अब समस्या खड़ी हो गई है

जो  छोटी थी लालच- लकीरे, बड़ी हो गई है

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यहाँ लोग घायल से मिलते ,ले बीमार किस्मत

अभी ये  सियासत ही,  बूटी - जड़ी हो गई है

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चलो हम बचा लें, विरासत यहाँ ,आखिरी बार

धरोहर पुरानी-  कबाड़ी ,   घड़ी हो गई है

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किसी रोज देखो  मसीहा कोई आ जाए फिर से

जमाना ही,    तकदीर की  हथकड़ी हो गई है

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नहीं जानता कब  मुझे कौन सी बात चुभती

इसे जानने की मुझे   हड़बड़ी हो गई है

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सुशील यादव दुर्ग

 

 


 

138....Hazaj murabba mahzuuf muzaa.if

mufaa'iilun fa'uulun mufaa'iilun fa'uulun 1222122+1222122

कभी जब जिंदगी ये बिखरने वाली लगती

दुआ  मुझ पर किसी की बरसने वाली लगती

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हजारो ख्वाब देखा, बने  हालात   अपनी

सियासत ये नहीं अब, सुधरने वाली लगती

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कसीदो में कई बार तुझको  ही पिरोया

तभी नजदीक दुनिया  निखरने वाली लगती

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लगा था तुझको पाके ज़माना भूल जाऊं

मेरी हर आरजू  तब सँवरने वाली लगती

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चढ़ा के रोज क्यों , दाव  रखना जिंदगी को

ये किस्मत अब  बुलंदी ,उतरने वाली लगती

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सजा के तौर पर साथ ज्यादा दिन गुजारा

यही बाते तो मन को  अखरने वाली लगती

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वही  है रास्ता औ  मुसाफिर हम वही है

तरीके दौर बदले  तरसने वाली लगती

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घड़ी ये फैसलों की  इसी पल  सामने है

पहेली सी  कोई बात उलझने वाली लगती

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हमारी रेल सी जिन्दगी आगे कहाँ  तक

चलेगी और कितनी  ठहरने वाली लगती       # सुशील यादव दुर्ग

 

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