136....
8.12.24
कोचक-
कोचक के
$$
मोरे
गोड़ इहाँ,
अबड़े खजुवावत हे
संगी
चुनाव लड़त बेरा, सुरतावत
हे
$$
रेल
में चढ़ के महू ,जातेंव अपन गाँव
ऐ
खानी भीड़ मारे,
पोटा कपकपावत
$$
लोगन
जानत, दू फाड़ गाव के मनखे
डोंगा
संसो के, डोलत- डगमगावत हे
$$
माई-लोगन
कोनो,
कहुँ जा समझातेव
लइका
मुँहजोरि, पुरखा जोत बुतावत हे
$$
नेता
मन जीते हारे , चारे दिन बर खेला
कोचक-
कोचक के कोन तुमला बगियावत हे
$$
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)
7000226712
137...
10.12.24
behr-e-paa.nch-fauulun
fa'uulun fa'uulun fa'uulun fa'uulun fa'uulun
122 122 122
122 122
लालच
लकीरें ....
#
मेरे
सामने अब समस्या खड़ी हो गई है
जो छोटी थी लालच- लकीरे, बड़ी हो गई है
#
यहाँ
लोग घायल से मिलते ,ले बीमार किस्मत
अभी
ये सियासत ही, बूटी - जड़ी हो गई है
#
चलो
हम बचा लें, विरासत यहाँ ,आखिरी बार
धरोहर
पुरानी- कबाड़ी , घड़ी हो गई है
#
किसी
रोज देखो मसीहा कोई आ जाए फिर से
जमाना
ही, तकदीर की हथकड़ी हो गई है
#
नहीं
जानता कब मुझे कौन सी बात चुभती
इसे
जानने की मुझे हड़बड़ी हो गई है
#
सुशील
यादव दुर्ग
138....Hazaj murabba mahzuuf muzaa.if
mufaa'iilun fa'uulun mufaa'iilun fa'uulun 1222122+1222122
कभी जब जिंदगी
ये बिखरने वाली लगती
दुआ मुझ पर किसी की बरसने वाली लगती
#
हजारो ख्वाब
देखा, बने हालात अपनी
सियासत ये नहीं
अब, सुधरने वाली लगती
#
कसीदो में कई
बार तुझको ही पिरोया
तभी नजदीक
दुनिया निखरने वाली लगती
#
लगा था तुझको
पाके ज़माना भूल जाऊं
मेरी हर
आरजू तब सँवरने वाली लगती
#
चढ़ा के रोज
क्यों , दाव
रखना जिंदगी को
ये किस्मत
अब बुलंदी ,उतरने वाली लगती
#
सजा के तौर पर
साथ ज्यादा दिन गुजारा
यही बाते तो मन
को अखरने वाली लगती
#
वही है रास्ता औ
मुसाफिर हम वही है
तरीके दौर
बदले तरसने वाली लगती
#
घड़ी ये फैसलों
की इसी पल सामने है
पहेली सी कोई बात उलझने वाली लगती
#
हमारी
रेल सी जिन्दगी आगे कहाँ तक
चलेगी
और कितनी ठहरने वाली लगती #
सुशील यादव दुर्ग
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