Saturday, 7 December 2024

 

101..

 

25.5.24.

Mutqaarib musamman mahzuuf

fa'uulun fa'uulun fa'uulun fa'al

122  122 122  12

#

कोई जब किसी को  भुला देता है

वो चुपचाप खुद को सजा देता है

#

ये तालीम चाहत की कहती है बस

मिया मजनू  सबकुछ हिला देता है

#

हमे मय कदा देखना था कभी

उसूलो का जमजम पिला देता है

#

हमसफर वो  तन्हाई के हैं नहीं

बुरे वक्त दिल  हौसला देता है

#

घड़ी रुक के मेरी चला करती पर

ठिकाने  से बारा बजा देता है

#

 

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग

 


 

102…

27.5.24

हज़ज मुसद्दस सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन

1222   1222  1222

 

यहाँ रिश्तों में इतना फासला क्यों है

है पीछे भीड़  भारी फिर अकेला क्यों है

#

मुझे चाहे निगाहों से रखो ओझल

मगर ख्यालो में कोई दूसरा क्यों है

#

चलो माना हमी बदनाम थे केवल

शराफत के लिफाफे ये पता क्यों है

#

रहा करते हमी जद हर निशाने के

जमाना रात दिन फिर ढूढता क्यों है

#

ये बस्ती अजनबी सी हो गई आखिर

नहीं मालूम इससे वास्ता क्यों है

#

यहाँ मझधार में आ के फँसी कश्ती

तहे दिल बारहा तुझको पुकारा क्यों है

#

लगे चारो तरफ  मेले  हैं खुशियों के

फकत  घर में गजब मेरा अँधेरा क्यों है

#

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग

103..

28.5.24

Mutqaarib musamman mahzuuf

fa'uulun fa'uulun fa'uulun fa'al

12212212212

 मेरे सामने आ के रोते हो क्यों

इरादों की कश्ती डुबाते हो क्यों 

#

नहीं जान पाते , शराफत  चलन

कोई पिन शरारत, चुभाते हो क्यों

#

शिकायत जमाना , करेगा नहीं 

फसल वो ही  बीमार , बोते हो क्यों

#

लदे हों कई बोझ, पर उफ नही

बशर तुम , तमाशा ये ढोते हो क्यों

#

अकेले मिले हो बता  हर जगह

अदब की रिदा नम सुखोते हो क्यों

#

घनी बस्तियों  मामला रोज का

मगर तुम फटे हाल  होते हो क्यों

#

सियासत अजब खेल माना सही

यहां आप आपा यूँ खोते हो क्यों

#

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग


 

104…

1,6,24

मुफ़तइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन

2112   212   212

कितनी थकी हारी है ज़िन्दगी

लगती मगर प्यारी है ज़िन्दगी

#

मैल इसे  तो सभी कहते हैं

हाथ नगद सारी  है जिंदगी

#

नाम चढ़ी  हो लता प्रीत की

दुख भी कहाँ भारी है ज़िन्दगी

#

कोई  तरीका  बता दो जियें 

जंग यहाँ जारी है ज़िन्दगी

#

छोड़ चले बारी बारी सभी

 अपनी कहाँ बारी है ज़िन्दगी

#

 सीख रहे दाँव औ पेंच को

 तेग ये दो धारी है ज़िन्दगी

#

बिगड़ा सा चेहरा हमें जो मिला

साफ ही संवारी है ज़िन्दगी

#

कौन नुमाइश तमंचा करे

साथ ये बीमारी है जिंदगी

#सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग

105...

2.6.24

behr-e-hindi saadhe chaar felun even split

fe'lun fe'lun fe'lun fe'lun fe'

222222222

हक़ की बात पे, तबाही मिलती

नहीं कोई सबूत गवाही मिलती

#

क्या है जिरह ज़माने वालो अब

किस बात शक़्ल में स्याही मिलती

#

सीख ले तू ईमान से रहना यहीँ

इस जगह मयकदा सुराही मिलती

#

नाकामियाँ सिखा देती जीना

पास है हुनर वाहवाही मिलती

#

चार तरफ हैं हुकूमत के चर्चे  

नहीं ऐसे ही  बादशाही  मिलती

#

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग


 

106

3.6.24

मुतदारिक मुसद्दस सालिम

फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन

212 212 212

गौर से देख, चेहरा  समझ

सोच में खुद को, जिन्दा समझ

सीख लेगा , सियासत का खेल

सादगी-संयम, अपना समझ

गर्व की, कब उड़ी, कोई पतंग

आसमां- डोर, उलझा समझ

शोर गलियों में , दीवार खुद   

इश्तिहारों सा,  चिपका समझ

चाहतों को लुटा  हाथ से

नाम नेमत से, फैला समझ

जो करे हर सभा रौशनी

सर  वहीँ पे, झुकाया समझ

फूंक दे जो सियासत में घर

आदमी वो है, तनहा समझ 

हम चिरागो को ले  ढूढ़ते

देवता मिलता जुलता समझ

आप नाराज होते रहे

हमको भी खुद से गुस्सा समझ

##

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग


 

107...

Jadiid musaddas saalim

faa'ilaatun faa'ilaatun mustaf'ilun

2122 2122   2212

 

क्या पता हमसे , कहां गलती रह गई

जिंदगी हाथों को ही, मलती रह गई

#

राह कठनाई, नहीं कम थे बारहा

मुश्किलों में, सादगी, चलती रह गई

#

तेल रेतों से निकालें  ,नादान थे   

बद-हवासी  उम्र ,ये ढलती रह गई

#

तुम इशारे भी नहीं की साझा कभी

,कल्पनायें दूर  सम्हलती रह गई

*

कब लगा कर तुम गए थे इस  पेड को

शाख उसकी  फूलती फलती  रह गई

#

वो शमा अक्सर बुझा  करती  थी  यहाँ

आँधियों के बीच भी  जलती  रह गई

#

कुछ शिकायत तो भुलाई जाती नहीं

बस तुम्हारी दोस्ती खलती रह गई

#

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग

108...

7.6.24

फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन

२१२ २१२ २१२ २१२ २१२

उलझनों  होठ सी आज जीता रहा आदमी

दर्द आसू जहर खून पीता रहा आदमी

#

तुम ज़रा दाग़  दामन बदलने की भी सोचते

दाग़-वाली, कमीज़ों को सीता रहा आदमी

#

शहर में  आज केवल बचा  जानवर पालतू

ये  गरजता जंगल खूब चीता रहा आदमी

#

काट लो  बेसबब, तुम उसे चौक में  बारहा

महज़ उदघाटनों का ये, फीता रहा आदमी

#

साफ़ नीयत, पढ़ो तो, किताबें कभी, आप ये

हर सफ़ा    राम ही  राम -गीता रहा आदमी

#

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग


 

109....

behr-e-hindi saadhe chaar felun even split

fe'lun fe'lun fe'lun fe'lun fe'

222222222

इस दुनिया से जुदा बेखबर हैं लोग

मंदिरों के उखड़े पथ्थर हैं लोग

#

देखा खींच,  आसानी से ताना

ये  किस मिटटी बने रबर हैं लोग

#

कब जिद टूटे , दबाव में तड़के

खिलौनो के, अस्थि-पंजर हैं लोग

#

जब खौफ  बढ़ गई, राहजनी की  

धारणा खूब बनी, रहबर  हैं लोग

#

अपनी जमीन, हाथो निकल गई

सीचे कौन इसे, बंजर हैं लोग

#

वापस खींच उसे हम, ला नहीं सकते

उस गली से चिपके,  अस्तर हैं लोग

#

रोज करते  हम, देख भाल उनकी

अब मर्ज क्या कहें, बेअसर हैं लोग

#

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग


 

110...

 

फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े

२२ २२ २२ २२ २२ २२ 

 

कोई मेरे नक्शे कदम पे चलने वाला नहीं दिखा 

होश में आने वाला , सम्हलने  वाला नहीं दिखा

#

देखे हैं बारहा  हाथ से हमने उड़ते हुए तोते

पंछी की जुबान  कोई बोलने वाला नहीं दिखा

#

रहमतों की कर दी है तुमने बेमौसम बारिश

कोई दुआ की दुकान  खोलने वाला नहीं दिखा

#

आते जाते लोग इस राहगुजर टकराते रहे

मुझको नजदीक से टटोलने वाला नहीं दिखा

#

है मुफलिस अंदाज मेरा नागवार हर किसी को

मेरी वसीयत कोई तौलने वाला नहीं दिखा

#

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग


 

111...

12.6.24

Muzare.a musamman aKHrab makfuuf mahzuuf
maf'uul faa'ilaat mufaa'iil faa'ilun

221  212  11  221  212

नीयत से आप नेक यूँ , सुलतान हो गए

सारे  किताब के हर्फ  आसान हो गए

#

समझे नहीं जिसे कहीं  , गुमनाम लोग वो

हक़ छीन के हमी से , परेशान हो गए

#

कुनबा नहीं सिखाया हमें बैर- दुश्मनी

नाहक ही लोग , हिंदु-मुसलमान हो गए

#

सहमे हुए जिसे ,समझा करते बारहा

बेशर्म- बदमिजाज वो धनवान  हो गए

#

इक हूक सी उठी रही ,सीने में हर दफा

बाजार में पटक दिए, सामान हो गए

#

हमको  मिला दिया था वो पुल ,आप टूटकर

रिश्तों की ओट आप ही , तूफान  हो गए

#

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग


 

112..

12.6.24

ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख़बून महज़ूफ़ मक़तू

फ़ाएलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन

2122 1212 22

तेरी दुनिया नई नई है क्या

रात रोके कभी, रुकी है क्या

#

बदले रहते ,मिजाज भी  अपने

अब सुधर जाने , दुश्मनी है क्या

#

जादु-टोना कभी-कभी चलता

सोच रह रह ,यूँ  चौकती है क्या

#

तीरगी  , तीर ही चला लेते

पास कहने को, रौशनी है क्या

#

सर्द मौसम, अभी-अभी गुजरा

बर्फ रुखसत  कहीं जमी है क्याl

#

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग


 

113...

12.6.24

फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े

 

यूं नेकियां  वो हजार करता है

वादा हर बार उधार करता है

#

जानता है रहमत का गणित कई

मुश्किल गलती  दो चार करता है

#

बस्ती  का हरेक निजाम उसी का

कौन  दखल ये  इंकार करता है  

#

कोशिश  न कर उसे आजमाने  की

मुस्कुरा के वो तुझसे प्यार करता

#

सर झुका यहीं  इसे सजदा भी कर 

सोच समझ का  व्यापार करता है

#

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग


 

114...

13.6.24

बहर-ए-ज़मज़मा मुतदारिक मुसद्दस मुज़ाफ़

फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन

22 22 22 22 22 22

 

आएगी बहार तो ये , पतझर चला जाएगा

ख़ामोशी का आलम, मंज़र चला जाएगा

#

नासमझी के और न, फेंक पत्थर इधर-उधर

हाथो पता नहीं कब गुहर चला जाएगा

#

बिन सोचे उसने जो माँगा था अंगूठा 

माना था तीरंदाजी  हुनर चला जाएगा

#

मेरे हक़ में कौन, गवाही देने आया

सुन के ज़माने की बातें, मुकर चला जाएगा

#

रौनक़ महफ़िल और ना देखा जाए हमसे

सदमों में ये दिल आप उठ कर चला जाएगा

#

शायद मै सीख लूँ, जीना तेरे बग़ैर सुशील

तू  राहों में नहीं कि, मुड़कर चला जाएगा

#

खोया मिला अतीत में तालाब के किनारे

और जैसा उछाल के पत्थर चला जाएगा

#

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग

115..

15.6.24

फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन

212 212 212 212  212

बात- में  खूब सी तल्ख़ियां, तब भी थी अब भी है

मह'फिलों तेरी  खामोशियां, तब भी थी अब भी है

#

गुजरे  दिन की भला  सादगी क्यों नहीं  बोलती

पांवों में कसी बेड़ियां, तब भी थी अब भी है

#

घर पराया जुबा ताले  गुम सा  चहक़  और क्या 

बंदिशों में पली  बेटियां, तब भी थी अब भी है

#

शहर का अब नया चेहरा  कब पाएगा शहर ये 

हर जगह- लाख में  गुम'टियां तब भी थी अब भी है

#

हादसों कितनी  यायावरी हो गई है सुशील

साथ में  उसके नाकामियां ,तब भी थी अब भी है

#

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग


 

116...

 

(फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन

२२ २२ २२ २२ २२ २२ २२

@@)

 

तेरी यादों के संग, लिपट के सोया करते हैं

मैं और मेरी तन्हाई, बाहम रोया करते हैं

#

हम अकेले, उसूलो के जंगल में जाके, जाने क्यों

उपजाऊ मिटटी,  नीम करेला बोया करते हैं

#

ये हकीकत है, नाव को हमने, चलाना नहीं सीखा

बस इसीलिए तो, किनारों पे कश्ती, डुबोया करते हैं

#

एक तुझ को पाने की थी, मुद्दत से  अपनी आरजू

इस जिद में, ना जाने क्या- क्या, हम, खोया करते हैं

#

इस अहद के लोग सभी, हो गए हैं समझदार इस कदर

इस छाँव  पसीना, उस धूप  में  सुखोया करते हैं

#

 

**बाहम=परस्पर ,* अहद =ज़माना ,युग

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग

 


 

 

117…

मुतदारिक मुसद्दस सालिम

 

फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन

212212212

सब के आगे उदासी न रख

अब तलब और प्यासी न रख

#

है मुझे रात भर जागना

जुगनुओं की तलाशी न तख

#

इस तरफ आएगा और कौन

मुल्तवी  और फाँसी  न रख

#

इश्क हो  मुश्क हो कब छिपा

ये गनीमत है खाँसी न रख

#

इत्र शीशी  कहीं गुम रहे

खुशबू को बस दवा सी न रख

#

 

30.6.24

 


 

118…

28.6.24

फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन

22  22  22  22  22  22  22

आसान अगर होता हमको बच्चों जैसा बहलाना

छोड़े हम बैठे होते, बेमतलब का हकलाना

#

हमको समझे होते,ऊपर से नीचे तक जिस दिन

मुमकिन उस दिन हो जाता,चाहत का और ठिकाना

#

बारिश का मौसम भी,केवल खामोशी से आता है

यादों के जंगल भीतर तक, पैरहन भिगा जाना

#

लेकर अपनी सूरत रोनी सी कल से बैठे हैं

खुशियों का लगता, इस दीवाली लौट नहीं आना

#

हमको अच्छा  लगता था डूबे रहते यादों में

छोटी-  बातों में देर- देर तक तेरा सर खाना

##

कोई हरदम समझाता हमको  तेरी रहमत  ताकें

समय लगा बैठा हम पर भारी भरकम  हर्जाना

#

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग
30.6.24

 


 

119…

मन में उठा सवाल

वक्त की नजाकत मन में उठता सवाल समझा करो

मुझसे भी होता  गाहे बगाहे  कमाल समझा करो

#

है ख्वाहिशों की  हरी मिर्च और धनिया पास भी तेरे

मुझ को पीसने के लिए हरदम  पताल समझा करो

#

सब ने मारे हैं अपनी पसंद के चांटे मगर तुम  

जनता के  वजूद को चूमो गाल समझा करो

#

गोया रहना था तुझको  जिगर के करीब  बन के करार   

कुछ मायूस   हुए   दिल को  तंग  हाल समझा करो

#

कौन बगावत को   बंजर में बोता है इन दिनों

तुम इस चाह को  मेरी सनक चाहे ख्याल समझा करो

#

एक मै सम्हाले बैठा  तुम्हारे रिचार्ज का खर्चा

मानो  तो मै हूँ गुल्लक या टकसाल समझा करो

#

याद हैं पिछले बरस की  बनारसी साड़ियों का गिफ्ट

फट गया  मेरी हैसियत का अब  रुमाल समझा करो

#

नासमझ हो नादान हो , किसी की  निगहबानी में रहो

किस नीयत  बदलापुर मुश्किल  कब बंगाल  समझा करो

#

धनवानों की बस्ती में रहने का कायदा सीखो

जी भर गरज-बरस के उनको कंगाल समझा करो              सुशील यादव दुर्ग 7000226712 

 

2.१०.२४

121...

फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े

22222222222

वक्त ने मुझको अपना कह के नहीं देखा

आया- गया- गुजरा, साथ रह के नहीं देखा

#

एक अजनबी की तरह मुझे   घूरने वाला   

नदी में भावनाओं की बह के नहीं देखा

#

दुनिया की नजर अपने रिश्तो पे लग गई

भीतर जा  घुसा , जख्म सतह के नहीं देखा

#

डबडबाई आँख से हमको  रुखसत तो किया

जाने क्यों  न मुडा बे- वजह के नहीं देखा

#

सीख ले तू भी कुछ  दुनियादारी के उसूल   

कातिल सा  माजरा कलह के नहीं देखा

#

बैठा हूँ उम्मीद के कोठे में आजकल

 कोई तारीख  बस  जिबह के नहीं देखा

#

बर्बादियों  में मेरी उसका हाथ  शामिल

कोई रास्ता उसने सुलह के नहीं देखा

#

 

सुशील यादव दुर्ग

122..

बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब इसरम मक़बूज़ महज़ूफ़

फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन

22 22 22 22 22

#

कुछ पल और साथ.....

फर्क अच्छे -बुरे का, बताने से रह गया

कुछ पल और साथ, बिताने से रह गया

मेरे मकसद का, चश्मदीद  आईना

देकर  के गवाह  छुड़ाने से रह गया

मेरी सादगी क़ब तुझे कबूल हुई

या खुद  नेकियाँ  गिनाने से रह गया

तू  जो मिल जाती, गरीब ना होता दिल

आके पास ही, खजाने से रह गया

खीसे  मे लेकर, निकला था तेरा  पता

मन  डाकिया, तेरे ठिकाने से रह गया

होती नहीं ,अब कोई   आरजू- तलब

क्या पता क्यों तुझे सताने से रह गया

मजनू फरहाद की  दौड़ में  था शामिल

आशिक इंच भर कहाने से रह गया

दिल मे छिपा के कुछ राज  जा रहा

पीछे इक   भीड़  बनाने  से रह गया

तेरा रूठना भी अच्छा लगा सुशील

एक  मौका  तुझे मनाने से रह गया

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर दुर्ग

7000226712

26.11.24

 

123..

बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब इसरम मक़बूज़ महज़ूफ़

फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन

 

22 22 22 22  22

 

शिलान्यास के तुमको पत्थर दिखाएँ

हम कहाँ कब झुकी कितनी नजर दिखाएँ

#

हैं दस्तबस्ता हम  सरकार  के आगे

कितनी ज़ुबाँ खोले क्या हुनर दिखाएँ

#

होठ सिले  ये लोग अभी बेगुनाह

मिलो जो फुरसत में तुम गौहर दिखाएँ

#

यूँ छापते नहीं हम कोई अखबार

लोगों की हरकतों पर खबर दिखाएँ

#

अपनी निगाह से हम ही गिरे लगते हैं

कितने सितम झेले क्या कहर दिखाएँ

#

दस्तबस्ता= बंधे हाथ  

सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर दुर्ग

7000226712

26.11.24


 

124

27.11.24

फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन

तुझपे थोड़ा सितम कर लेंगे

अपना दुःख यूँ कम कर लेंगे

 

बिगड़ी आपस में जो बात कभी

बर्तन टकराना वहम  कर लेंगे

 

हासिल ना हो कोई सुविधा

बाज दफा   संयम कर लेंगे

 

हमको  तसल्ली देने वालो

खुश होने का भ्रम कर लेंगे

 

तंज कसे हो हम पर कितने

जहर 'सुशील 'हजम कर लेंगे

सुशील यादव

 

 

 

 

 

 

 

 

 

125..

unnamed

faa'ilun faa'ilun faa'ilun faa'ilun faa'ilun

212 212 212 212 212

 

अब  नफरतों कफस से कभी तो निकल देखिये

बारहा बदला आइना , चेहरा बदल देखिए

कफस=पिंजरा ,बारहा = कई बार

#

आप इंसाफ का गर तकाजा समझ-जान लें

अपने ही लफ्ज में रोज फिर खू कतल देखिए

#

ये हकीकत कहीं और भी  हो बयां आगे तक

मुंसिफो पास है   सामयिक ये पहल देखिए

#

ताकतों सामने हर सदी औ जमाने झुके

ताकतों का यहाँ आप भी बस खलल देखिए

खलल= बाधा , अडचन,विघ्न

#

लोग  मगरूर छूते रहे आसमा रात- दिन

आए हैं फिर सियासत मुखौटों नक़ल  देखिए

#

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)

7000226712


 

126…

 

(फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े)

ये कौन है……?

ये कौन है, जो ना-समझों भी को सिखा देता है

चोट दिल की , आदमी को आदमी बना देता है

#

इश्तिहार बन के चिपका रहा,  गली- दीवारों

मजबूरियों की धड़कन, सब मिट्टी मिला देता है

#

वो पी रहा था ज़हर बे-हिचक सुकरात की तरह

लड़ने की क्षमता, कौन ख़ामख़ाँ जगा देता है

#

एक खामोशी, उसके आने तक थी बस्ती में

उसी को, कह के मुखिया बस परचम थमा देता है

#

आए दिन की ये आजकल सहज बात है यारो

बड़ी साजिश वो छोटा  इल्जाम लगा देता है

#

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)


 

127…

2-12-24

 

(फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े)

जिन्दा है और…..

कोई अब प्यार वफा के दायरे में नहीं आता

जिन्दा है और हवा के दायरे में नहीं आता

#

रखता  खूब वो बालो पर खिजाब  लगाने का शौक

देखो तो  बूढ़ा  हिना के दायरे में नहीं आता

#

कोशिश थी  तोड़ते हम, चाँद- तारे,  तेरी खातिर

वो बस्ती हमारे जिला के दायरे में नहीं आता

#

उसे जिन्दा दफ़न  करने का हुक्म हुआ है जारी

उस दिन से वो इस किला के दायरे में नहीं आता

#

उसे कब नहीं समझाया, हमने फायदे  की हर बात

एक वो आसान कला के दायरे में नहीं आता

#

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)


 

१२८

Muzare.a murabba aKHrab

maf'uul faa'ilaatun

 

221 2122

बिन गरजे बरसे देखो

हम भी हैं कैसे देखो

#

पानी की तह में डूबी

किस्मत की भैसे देखो

#

कल तो नहा के निकली

धनवानो पैसे देखो

#

बच्चो को क्या ले जाऊ

खाली ये खीसे देखो

#

मुश्किल में है ये दुनिया

ये चाहे जैसे देखो

#

Sushil yadav 


 

129..

6.12.24.

फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन

ये दिन काश ....

%

ये दिन काश हमारे होते

हम आंखों के तारे होते

%

दूर न होती मंजिल अपनी

पास कहीं दिल हारे होते

%

बचपन जाओ ढूंढ के लाओ

अक्ल के दुश्मन सारे होते

%

बन अधिकारी हमने    जाना

छीन झपट के चारे होते

%

मातम अब  क्या करना बाकी

दांव लगा घर  हारे होते

%

होती  बीच  भंवर तैराकी

यदि मालूम  किनारे होते

%

निकले घर की छांव छोड़कर

ऐसे ही बंजारे होते

%

खुली किताब समझना मुझको

पढ़  जो बारे न्यारे होते

%

इस जंगल में आग न लगती

कुछ दिन और गुजारे होते

%

खौफ जदा पेशानी में भी

मुश्किल   बर्फ   नजारे होते

%

हमको लगता क्यों कर ऐसा

हम नजदीक सहारे होते

%

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)

7000226712


 

130...

5.12.24.

बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब इसरम मक़बूज़ महज़ूफ़

फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन

22 22 22 22 22

$

क़ोई मुझको  शक ओ शुबहा नहीं रहा

पहले सा तुझपे भरोसा नहीं रहा

$

आसमा  परिंदे यूँ उड़ना  भूले

उम्मीद के  माफिक  नीला नहीं रहा

$

कीमत जब से लगी शराब की बढ़ने

मयकश  डूबना नशीला नहीं रहा

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आहिस्ता आहिस्ता दूर सब हुए

फिर नजदीक कोई   कबीला नहीं रहा

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यादों में बचपन की है फिसल पट्टी

बालू- बजरी वाला  टीला नहीं रहा

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सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)

7000226712

 


 

131...

फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ाइलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ाइलुन

यायावर बन कर कहीं  ....

 

मैं खुद अपने आप का  मुखबिर  अब होने लगा

यायावर बन कर कहीं  मुसाफ़िर  अब होने लगा

इन  पेड़ों ने  शातिरों को  भी साया  क्या दिया

जन संसद  यह  मामला गंभीर अब होने लगा

मेरी हर मौजूदगी   लोगों ने खारिज किया

लगभग उनके  दायरे बाहिर अब  होने लगा

कितनी होती  आजमाने की मुझको कोशिशें

जिम्मेदारी खौफ से  काफ़िर  अब  होने लगा

हाथ तुम्हारे  आ सकूँ,   हिस्से जाऊं गैर के

गिन लो मर्जी से  पुराना   फिर अब  होने लगा

आदमियत हर जात की  मुझको भी पहचान है

ठोकर  खाते सीख  में  माहिर अब होने लगा

शामिल   इस उम्मीद से  था कल तेरे अंजुमन

होगी मेरी जीत पर   आखिर  अब होने लगा

तेरा खुद पे  ख्याल भी  रहता है कब आजकल

जाहिर कहना शील भी ,शातिर अब होने लगा

मुफलिस आवारा रहा  गर्दिश में दिन रात थे

इन  यादों का आईना , जागीर अब होने लगा

कल तक हमको  दीखता सोचा समझा  हो रहा

लगता उल्टा कुछ अजब   तासीर अब होने लगा

@

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)

7000226712

132...

बहर-ए-ज़मज़मा मुतदारिक मुसद्दस मुज़ाफ़

फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन

22 22 22 22 22 22

आएगी बहार तो ये , पतझर चला जाएगा

ख़ामोशी का आलम, मंज़र चला जाएगा

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मत  फेंको, नासमझी में पत्थर चारों ओर

हाथो पता नहीं कब गुहर चला जाएगा

#

बिन सोचे उसने जो माँगा था अंगूठा

माना था, तीरंदाजी हुनर चला जाएगा

#

मेरे हक़ में कौन, गवाही देने आए

सुन के ज़माने की बातें, मुकर चला जाएगा

#

रौनक़ महफ़िल और ना देखा जाए हमसे

सदमों में ये दिल आप उठ कर चला जाएगा

#

शायद मै सीख लूँ, जीना तेरे बग़ैर सुशील

तू राहों में नहीं कि, मुड़कर चला जाएगा

#

आ जाता अक्सर  तन्हाई में  मिलने वो

तानो का   उछाल के पत्थर चला जाएगा

#

सुशील यादव

 न्यू आदर्श नगर दुर्ग


 

133....

22 22 22 22 22

कोई दीवार तो बताओ ...

@

रोने की बात तुम कहकहा  लगा बैठे

जुल्मो  पे सटीक निशाना लगा बैठे

@

खत्म पुराने  है अब एतबार के दिन

तुम हर एक पर भरोसा लगा बैठे

@

खास तजुर्बा  पतासाजी का तुमको

गुम दस्तबस्ता  शहर पता लगा बैठे

@दस्तबस्ता = बंधे हाथ

अजब जिदों से चल रही  तेरी दुनिया

फिर क्यों समझौता  नौका लगा बैठे

@

किस बात की रहती है हर रोज खलबली

किन बातों  बे - सबब छौका लगा बैठे

@

बताओ  तुम दीवार इस कद के माफिक

बे-हिचक सुशील भी  माथा लगा बैठे

सुशील यादव

 न्यू आदर्श नगर दुर्ग


 

134....

7.12.24

बहर-ए-हिन्दी मुतकारिब इसरम मक़बूज़ महज़ूफ़

फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन

22 22 22 22 22 2

हाल में .....

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देखो तो  हुनर का  दरख्त बेच आया

हँसी ख़्वाब के धोखे में  नीयत बेच आया

#

रोटी की जुगाड़ में बस हो गया था तन्हा

गमो की एक ही बारिश असलियत बेच आया

#

पेश्तर  कि  जग-जाहिर  हो वसूली खेल

इस दहशत में   खुद शराफत बेच आया

#

कौन  खरीदे इत्तर को   अब की   बारी

वो पहले ही खुशबु   हकीकत बेच आया

#

मुसीबतों  का पहाड़  नही था  आगे  कुछ

हाल में बस जीने की  हिम्मत बेच आया

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सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)

7000226712

 


 

135...

८-१२-२४

जमील मुसद्दस सालिम

मुफ़ाइलातुन मुफ़ाइलातुन मुफ़ाइलातुन

121221212212122

यूँ  आशिकी में हजारो,  खामोशियाँ न होती

दिलों में रोते सभी, जहां, सिसकियाँ न होती

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गिराने वाले, नसीब मेरा बनाते  जाते

बहाने पर नाचती कोई, बिजलियाँ न होती

#

अभी तुझे,  क़्या पता, हिमायत किसे कहें हम

निगाह उड़ती हुई यहां, तितलियाँ न होती

#

खबर यहाँ  उड़ रही, अभी  है मरीज जिन्दा

‘सुशील’ इतनी, यदा- कदा तल्खियां न होती

#

तमाम दिन बोलते  रहे, काटने की बातें

जुबाँ  फिसलती यहाँ, कभी छूरियाँ न होती

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सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)

7000226712

 


 

136....

8.12.24

कोचक- कोचक के

$$

मोरे गोड़ इहाँ, अबड़े  खजुवावत हे

संगी चुनाव लड़त बेरा, सुरतावत हे

$$

रेल में चढ़ के महू ,जातेंव  अपन गाँव

ऐ खानी भीड़ मारे, पोटा  कपकपावत

$$

लोगन जानत,  दू फाड़ गाव के मनखे

डोंगा संसो के,  डोलत- डगमगावत हे

$$

माई-लोगन कोनो, कहुँ जा समझातेव

लइका मुँहजोरि,  पुरखा जोत बुतावत हे

$$

नेता मन   जीते हारे ,  चारे दिन बर खेला

कोचक- कोचक के कोन तुमला  बगियावत हे

$$

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)

7000226712

 

 

 

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