81..
30.4.24
बहर-ए-हिन्दी
मुतकारिब मुसद्दस मुज़ाफ़
फ़ेलुन
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े
22 22 22 22 22 2
#
इस
शहर में दूध का कोई धुला नहीं है
आदमी
सा आदमी मुझको मिला नहीं है
यों कभी
देखे तुझे आता था जरा क़रार
औरो से तू , मानता हूँ ख़ुद भी जुदा नहीं है
आसमान
से खींच कैसे तुझ को बाँट दूँ मै
मेरे
हिस्से और तो हासिल अब हवा नहीं है
क़फ़स के जैसे घरों में हम कैद रहते है
आदमी होने का
सपना जो बुना नहीं है
बाद
जाने के तू याद भी रह जाएगा
क़्या
कहूं तेरा जाना दिल से अखरा नहीं है
हो गए हालात अब काबू से हमारे बाहर
तजुर्बे में इससे बड़ा और
आकड़ा नहीँ है
क्यूँ
उठा लाई हो खुशबू भरे पुराने दिन
मैंने
इनको आदतो क़ोई गिना नहीँ है
भाइयों
से ख़ूब लड़ के मै थक गया इसीसे
सोचता हूँ अब अदावत से फ़ायदा नहीं है
पाँव
भारी अंगद के जिस निजाम रखे
शक
की बुनियादें हिली हमको पता नहीं है
बारूदी धुए में इस शहर को
बाँट दो तुम
मैं रहूँ बीमार मेरी मेरी दवा नहीं है
#
सुशील
यादव
न्यू
आदर्श नगर जोन 1 स्ट्रीट 3 दुर्ग छत्तीसगढ़
82…
1.5.24
Ramal musamman mahzuuf
faa'ilaatun faa'ilaatun faa'ilaatun faa'ilun
2122 2122 2122
212
खौफ रहजन का रखे हो, दर खुला भी रखते हो
पास जो मैं हूँ तभी ये हौसला भी रखते हो
#
सोच
अपनो की ,है बीमारी ,तुझे खा जाएगी
आदमी
दर आदमी खुद को जुदा भी रखते हो
#
गर
सुनो पंचायते दुनिया जहाँ की बे सबब
तुम मुकम्मल कोशिशों में फासला भी रखते हो
#
क्यूं
लिखा था सीने उसका नाम सोचा समझा सा
तोड़ने
का रात दिन अब सिलसिला भी रखते हो
#
मुंसिफों तकरार कितनी अंदरूनी हो रहे
तुम
चलन अपना अहम सा फैसला भी रखते हो
#
सुशील
यादव
न्यू
आदर्श नगर
जोन
1 स्ट्रीट 3 दुर्ग छत्तीसगढ़
83....
बहर-ए-ज़मज़मा
मुतदारिक मुसद्दस मुज़ाफ़
फ़ेलुन
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
222222222222
#
दायरे
में शक के मेरा आइना इन दिनों
कोने- कोने से टूटा है फकत चेहरा इन दिनों
#
गिनती के थे, कुछ मेरे अच्छे उसूल मगर
पता
नहीं कितने पैरों ने इसे, रौंदा इन दिनों
#
अब
जरा टहलने से सांस लगी,
मेरी फूलने
मेरी
हलचल पे जारी है,
पहरा इन दिनों
#
आस्था
के जंगल,
कोई हिरन ही नहीं बचा
मांद
छोड़ के शेर पास ही,
ठहरा इन दिनों
#
दुखती
रगो में जरा हाथ,
अजाने क्या रख दिया
मायूसियों
का रिश्ता, हो
गया गहरा इन दिनों
#
खामोशी
के जंगल में बे-जुबाँ अकेला 'सुशील'
हुआ
क्यों मजबूर बदलने को रस्ता इन दिनों
#
सुशील
यादव
न्यू
आदर्श नगर
जोन
1 स्ट्रीट 3 दुर्ग छत्तीसगढ़
5.4.24.
84…
6.5.24.
बहर-ए-हिन्दी
मुतकारिब मुसद्दस मुज़ाफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े
22 22 22 22 22 2
#
प्यासे
को पानी भूखे निवाला देना
जो
दिया तले मांगे उजाला देना
#
क्यों
उलझ रहे केवल भ्रम के मायाजाल
बुरे
सोच के हर माथे टीका काला देना
#
वे
जो लूट रहे हैं चारों तरफ खजाने
इन
मंसूबों तत्क्षण देश निकाला देना
#
उजड़े
नहीं सुहाग कोई माता ना रोए
नियमो
की नौबत ना हील हवाला देना
#
अच्छे
दिन का आना अब भी है बाकी
अब
भी बचा मन अवसादों को ताला देना
#
जोश
खरोश में हो घर घर जन जन की वाणी
हर
पूजा मंदिर हर मंदिर शिवाला देना
#
सुशील
यादव
न्यू
आदर्श नगर
जोन
1 स्ट्रीट 3 दुर्ग छत्तीसगढ़
85…
बहर-ए-ज़मज़मा
मुतदारिक मुसद्दस मुज़ाफ़
फ़ेलुन
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
222222222222
#
भरी
महफिल में मै सादगी को ढूढ़ता रहा
तुझको
पाकर भी जिंदगी को ढूढ़ता रहा
#
सब
लोग व्यस्त थे सूरज की जुगाड़ में
दिया
तले मै ही रौशनी को ढूढ़ता रहा
#
जिस फूल की
कभी वो खुशबू चुरा गई
तमाम
उम्र उसी तितली को ढूढ़ता रहा
#
ना
जाने कोई मुराद कब पूरी होती
मैं
ख्वाब में बस यूँ ख़ुशी को ढूढ़ता रहा
#
मेरे
भीतर मिला नहीं सख्त आदमी
एक
अरसे तक उस कमी को ढूढ़ता रहा
#
सुशील
यादव
न्यू
आदर्श नगर
जोन
1 स्ट्रीट 3 दुर्ग छत्तीसगढ़
6.5.24
86…
नए साल में....
*
स्वागत गीत लिखे चलो फिर से
नूतन साल की
मन चाहे रंगों में हो फिर हाथी घोड़ा पालकी
*
बीते को मुड़ देखो भाई
लुटती गाढ़ी कहां कमाई
वे फिकर बिल्कुल ना पालें
समझे ना जो पीर पराई
समझौतों के सकरे पुल से, तिजौरी
भरी दलाल की
*
सपने जो कलयुग में आते
लोभान की दुकान सजाते
डिस्काउंट में बेच रहे हैं
यहाँ सभी हर रिश्ते नाते हे
नाथ कितने
जोर से बोलें जै
कन्हैया लाल की
*
नदी किनारे था एक मरघट
धू धू जल रहती
चिताएं
हर संताप समय के हाथों
पा जाती कपाल
क्रियाएं
बिजली की शव दाह खुले , किल्लत
लकड़ी टाल की
*
संवाद हीन है जग सारा
व्यर्थ का गूंजा करता नारा
अलगू जुम्मन न्याय न
देते
तर जाए जो गरीब बिचारा
रिश्वत के ढेरों पानी ने गति बना
दी क्या दाल की
*
ले दे कर गांव था सुधरा
बिखरा गए मजहब
कचरा
हैं इंसानियत के
घिसते पुर्जे
उस पर भी कानूनी पहरा
सोचो समझो नेता परखो समय
चुनावी चाल की
*
सुशील यादव दुर्ग
87..
बहर-ए-हिन्दी
मुतकारिब मुसद्दस महज़ूफ़
फ़ेलुन
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
22 22 22 22 22 22
@
हम
तो बस याद की लकीर लिए बैठे हैं
एक
खंडहर लूटी जागीर लिए बैठे हैं
#
तीरे
नजर का जख्म तेरे मकसद में शामिल
जंग
लगी हम अलग शमशीर लिए बैठे हैं
#
एक
पहेली बुझाती थी रोज हंसी तुम्हारी
आज
उदास तेरी तस्वीर लिए बैठे हैं
#
होंठ
हमने सी लिए थे कि राज का फाश न हो
इन
पावो तेरी जंजीर लिए बैठे हैं
#
कोई
आग लगा कर तमाशा देख रहा है
जलन
फफोले हम तासीर लिए बैठे हैं
#
सुशील
यादव
न्यू
आदर्श नगर दुर्ग
88...
16.5.24
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
22
22 22 22
22 22 22
जो बरगद –पीपल, बूढ़े पिता के बारे में सोचता है
वो यकीनन मजहब, इमान, खुदा के बारे में सोचता है
#
डिगा कर ही बता दो , तनिक सियासी अंगद के पांव अब
ये मुल्क कब कमजोर , इन्सा के बारे में सोचता है
#
कौन बहाना
चाहता ,गंगा में अपनो की लाशें,
तंग हाल कब , कफन चिता के बारे में
सोचता है
#
मयकदे में जो , बेआबरू हो कर जीने का
आदी
चीथड़ों में कौन, अस्मिता के बारे में
सोचता है
#
लोगो ने बना दिया, आफत को,अवसरों का बाजार
लूटने की नीयत कब सजा के बारे में सोचता है
#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग
89….
16.5.24
मनसरह
मुसद्दस मतवी
मुफ़तइलुन
फ़ाइलात मुफ़तइलुन
211221212112
शहर
का मैं हर मिजाज़ जानता हूं
किन
सरो में है खिजाब जानता हूं
#
चाहे
जमाना मिरी मिसाल यहाँ
पुर्जा कहाँ है खराब जानता हूं
#
खूब
कमी आदमी में देख लगा
नस्ल में कितना रुआब जानता हूं
#
जान
सियासी दबाव दांव यहाँ
रोज
चुनावी खिताब जानता हूँ
#
रहम
नहीं बेवजह करेगा कोई
पढ़ने न देगा किताब जानता हूँ
#
लाख
छिपा चेहरा कोई अनेक तहों
कौन
लगाता नकाब जानता हूं
#
साल
बड़ी मुश्किलों से बीत सका
हर
किसी का उफ जवाब जानता हूं
#
सुशील
यादव
न्यू
आदर्श नगर दुर्ग
90….
16.5.24
मुज़ारे
मुरब्बा अख़रब
मफ़ऊल
फ़ाएलातुन
221 2122
बिन
गरजे बरसे देखो
हम
भी हैं कैसे देखो
#
पानी
की तह में डूबी
किस्मत
की भैसे देखो
#
कल
तो नहा के निकली
धनवानो
पैसे देखो
#
बच्चो को क्या ले जाऊ
खाली
ये खीसे देखो
#
मुश्किल
में है ये दुनिया
ये चाहे जैसे
देखो
#
सुशील
यादव
न्यू
आदर्श नगर दुर्ग
91…
17.5.24.
फ़ेलुन
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
कहीं
तो धब्बे दाग निकालो
बसंत
अब के आग निकालो
#
जो
अपनी मनमानी करते
पकड़
अकड़ वो झाग निकालो
#
बेसुर
होकर ढोल न पीटो
मधुर
सुरों के राग निकालो
#
सोने
को अभी उम्र पड़ी है
कुछ
दिन केवल जाग निकालो
#
अंदर
विष तो काम न देगा
बेहतर
बाहर नाग निकालो
#
सुशील
यादव
न्यू
आदर्श नगर दुर्ग
92…
20.5.24
बहर-ए-हिन्दी
मुतकारिब मुसद्दस महज़ूफ़
फ़ेलुन
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
22 22
22 22 22 22
वस्ल
की रात में,छाई कैसी तन्हाई है
स्याह
अंधेरे में ,ये किसकी परछाई है
#
उनसे
चाह के मांगना भी तो नहीं था मुमकिन
अब
तो बस खुलासा है बेख़ौफ़ उसकी सफाई है
#
नक्शे पा उसके, कभी अनदेखा नहीं किया
हमे कारवां
में गुम, देती रही दिखाई है
#
आज
बिना डर के भरो, घर का खाली खजाना
कल
नहीं हो फिर इस दौर सी, काली कमाई है
#
मेहदी
रची हाथ में, कलाई
भरी हैं चूड़ियां ,फिर
जिंदगी
क्या तेरी कीमत, कितनी मुँह दिखाई है
#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग
93...
20.5.24
Hazaj musaddas saalim
mufaa'iilun mufaa'iilun mufaa'iilun
1222 1222 1222
भरी
दुनिया कुछ अपना भी नहीं होता
समझ
में इतना रिश्ता भी नहीं होता
मुझे
सजदे तुम्हारे अब मिला है ये
महीनो घर
उजाला भी नहीं होता
जिसे मिलती कहीं उतरन कहीं जूठन
उधारी
हँसता चेहरा भी नहीं होता
अदब आराम से है जिंदगी केवल
बुझी
रातें सबेरा भी नहीं होता
कभी खुशबू सबा बनके गुजरती है
अलावा
तेरे दूजा भी नहीं होता
जहाँ
को मैं दिखा दूँ एक झलक अपनी
मयस्सर
साफ चेहरा भी नहीं होता
निगाहों में छिपे अंदाज का जादू
नहीं चलता तो रुसवा भी नहीं होता
ये
भाई हैं बिछुड़ के आज मिल लेंगे
पुराना मर्ज
झूठा भी नहीं होता
मुझे
दी हैं विरासत में जमीने फिर
वहीं पर मेरा
कब्ज़ा भी नहीं होता
उसूलो
में टिकी होती अगर दुनिया
यकीनन
वो तब
टूटा भी नहीं होता
मना लेंगे कभी मिल के खुदाओं को
'सुशील' और
ख्याल पैदा भी नहीं होता#
94…
22.5.24
हज़ज
मुसद्दस अख़्र्म उश्तुर महज़ूफ़ मफ़ऊलुन
फ़ाइलुन फ़ऊलुन 222 212 122
वो
भी खाने कमाने निकले
सौ-
सौ जिनके ठिकाने निकले
#
जिन
सौदों को वे हाथ लेते
उनके
पीछे फसाने निकले
#
नाकामी
से घिरे कहाँ हैं
मजबूती
के घराने निकले
#
मुर्दा
कौमे थी पांच साला
गलियों
में अब बताने निकले
#
बदनामी
जो हवा की करते
दौड़े आगी बुझाने निकले
#
पंचायत
का था खौफ उनको
ज्यादा
शहरों में थाने निकले
#
अवसर
शायद नहीं मिला हो
तस्वीरों को सजाने निकले
#
हमको
अपने वजूद पे शक
खोटा
सिक्का भुनाने निकले
#
मंदिर
जिनको मलाल था वे
खुद
शँख बाहर बजाने निकले सुशील यादव दुर्ग
95..
हज़ज
मुसम्मन मक़बूज़
मुफ़ाइलुन
मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन
1212 1212 1212 1212
अलग
हमारी मंजिल और आज रास्ता अलग
हमारी
सोच भी अलग ,यहां पे काफिला अलग
#
गली
-गली यहाँ ,बदल रही जुबाँ निजाम सी
कि
शख्स -शख्स के लिए, तिरा है मशवरा अलग
#
वो बोझ
बन रहे, नजर किसी की लग गई उसे
अदा के नाम पे हमें ,दिखा है मस-खरा अलग
#
घरों
में अपने हम चलो,कि आग लें लगा अभी
सियासती
ये खेल का , अजी मुआवजा
अलग
#
निगाह फेर लो वहीँ , शिकायतें करूं जहाँ
तू
जानता नहीं मेरा, अँदाज अलविदा अलग
#
सुशील यादव दुर्ग
96…
24.5.24.
बहर-ए-हिन्दी
मुतकारिब मुसद्दस महज़ूफ़
फ़ेलुन
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
22 22 22 22 22 22
तुमसे
क़्या बातें करें रुतबा उतर जाता है।
सर
से साफा, दिमाग काबा उतर जाता है।
#
महफिल
की रही तू रौनक कल तक कस्बे नुमा
तेरे
आते घर- घर
जिला उतर जाता है ।
*
हम
तेरे गम में शरीक हो जाते क़्या कहें
पीछे हुजूम ये काफिला उतर जाता है।
#
कुछ
राह ए सियासत मुश्किल है चलना बेखौफ
नींद कहीं तो खलल, रतजगा उतर जाता है।
#
पाप
धोने से पहले कुछ पाप औऱ कर लें हम
वरना कुंभ का
सारा मजा उतर जाता है
#
सुशील
यादव
न्यू
आदर्श नगर दुर्ग
97...
24.5.24.
बहर-ए-हिन्दी
मुतकारिब इसरम मक़बूज़ महज़ूफ़
फ़ेलुन
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
22 22 22 22 22
तूफानों
का निशाँ मँजर नहीं होगा
अब
कातिल का ये शहर नहीं होगा
#
आ
गए लौट के सारे बुद्धू घर को
अब
इस पहचान का उधर नहीं होगा
#
मुमकिन कल मेरी उड़ान
रोक लो तुम
उस
हाल तेरा भी बचा पर नहीं होगा
#
मयकदे
में उसको पीने दो इस रात
तन्हाई का उसको असर नहीं होगा
#
जादूगरी
छिपी उन हाथों में कल
लगता
अब के वहां हुनर नहीं होगा
#
खैरियत
मरीज की ये खुदा की रहमत
परहेज
में अब चारागर नहीं होगा
#
दुआ
मागने की रस्म अदायगी कर लूँ
जानता हूँ
आसान सफर नहीं होगा
#
सुशील
यादव
न्यू
आदर्श नगर दुर्ग
98..
behr-e-hindi paanch felun even split
fe'lun fe'lun fe'lun fe'lun fe'lun
2222222222
सोचती
हूँ ....
सोचती हूँ तुझको
ध्यान में रखती हूँ
मै जतन से शराफत म्यान में रखती हूँ
#
सजा
पाई कहाँ पसंद की तस्वीरे
फेकने
की चीज मकान में रखती हूँ
#
रो-रो
गुजर जाती, जिन्दगी भी अपनी
दर्द अपने खुद मुस्कान में रखती हूँ
#
बस तडफ सी उठती सीने में, जिस रोज
तेज़ाब
का शौक जुबान में रखती हूँ
#
लोगो
ने किए सितम कहना मुश्किल
जिद
का दीपक तूफान में रखती हूँ
#
सुशील
यादव
न्यू
आदर्श नगर दुर्ग
99..
25.5.24
हज़ज
मुसद्दस अख़्र्म उश्तुर महज़ूफ़
मफ़ऊलुन
फ़ाइलुन फ़ऊलुन
222 212 122
हम
कोलाहल में जीने वाले ,
शांति
- पथ में भटक गए हैं.....
#
नफरत
के बीज हम उगा के
रोपा
करते जो खेतों खंजर
वो
धरती उनको सब दे देती
जो
सेवा करते हल से बंजर
धरती
से नित छलांग मारें
हम
त्रिशंकु लटक गए हैं ।
#
हमको
जीना सिखा दिया है
रहना बिन
भेदभाव सब से
आमादा
फूट डालने वो
लेकर
हथियार हाथ कब से
धीरे
बस बोलचाल में हाँ
अपनी
शैली पटक गए हैं ।
#
चेहरा
बेबस लगा यहां पर
मानव देता दगा यहां पर
कल
तक दौड़ा किया था जीवन
अध
सोया सा जगा यहां पर
हम
विपदा -व्याधि छूटे कैसे
माथा
संशय चटक गए हैं।#
सुशील यादव न्यू आदर्श नगर दुर्ग
100…
25.5.24
फ़ाएलातुन
फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़े
2122
2122 2122 2
राहतें...
कामयाबी
के नशे में चूर हैं साहेब
इसलिए
तो हम पहुँच से दूर हैं साहेब
#
इस
जमानें क़ो वफा की क्या जरूरत बोल
हम
शराफत से जहाँ भरपूर हैँ साहेब
#
जिसने
छीना ख्वाब आजादी का तुमसे आज
वो
सितमगर तों हमी मगरूर हैं साहेब
#
तुमको
नाफरमानी की क्या दूँ सजाये और
सोच
की खाई फँसे मजदूर है साहेब
#
खैरियत
भी पूछता है अब यहाँ पे कौन
राहतें
अब कागजी मंजूर है साहेब
#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग
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