61...
Ramal musaddas saalim
faa'ilaatun faa'ilaatun faa'ilaatun
2122
2122 2122
वादों की रस्सी में तनाव आ गया है
चर्चे मंदिर के हैं चुनाव आ गया है
#
आजकल होने लगी है बस गलतियां
चहरा ज्यादा कुछ खिचाव आ गया है
#
जूझती रोगी उफ नदी पांच सालों
अब की बारिश कैसा बहाव आ गया है
#
वे उठाने राजी होंगे
आज परचम
अब इरादों इनके बदलाव आ गया है
#
बोलेगा कोई तो उठेगी लहर भी
क्यों समुंदर रस्ते कटाव आ गया है
#
खेलना आता कयामत तक हमी से
देख मूँछों में वही ताव आ गया है
#
रास्ता मुड कर था देखा आपने कब
मोड़ पर नाजुक झुकाव
आ गया है
#
अब हुकूमत की हमें बस लग चुकी लत
सच लगे हम बेचने
भाव आ गया है
#
खुश रहा लादेन अपने पैर चल के
बस
पुतिन के मिलते ठहराव आ गया है
#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)
susyadav7@gmail.com
7000226712
3.4.24
62...
हज़ज मुसद्दस सालिम
मुफ़ाईलुन
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
1222
1222 1222
वही बस्ती, वही टूटा खिलौना है
वही अलगू,मिया जुम्मन का रोना है
#
बना जाते सलीके
से मुझे लायक
यहाँ मिटटी को
ढूढो यार सोना है
#
सुना बनते
यहाँ रिश्ते तरीके से
किसे मोती कभी
आया पिरोना है
#
वफा के बीज डालो
ये पता तो हो
खफा मौसम या किस्मत आप बौना है
#
उसे पैगाम दो, है खैरियत मेरी
जिसे काँटे बदन मेरे चुभोना है
#
तरीके से मिला
करती खुशी कल तक
अभी उस दौर का
सपना सलोना है
#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)
susyadav7@gmail.com
7000226712
63...
22
22 22 22 22
सागौन बबूल भी तुम्ही रखना
मौसम अनकूल भी तुम्ही रखना
रोड़े मेरी राह में तुमने दिए हैं
हाथ मेरे फूल भी तुम्ही रखना
सब से मिला खुश
हो हो कर याद करो
सीने मेरे शूल भी
तुम्ही रखना
मर्यादा का ये उलझा
धागा
माथे में
धूल भी तुम्ही रखना
मन के घावों पर
पट्टी मरहम
जी भर प्रतिकूल
भी तुम्ही रखना
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)
64...
२२ २२
२२ २२ २२
२२ २२
संभव होता
उम्मीदों का आसमान छू जाना
छोड़े हम बैठे
होते, बेमतलब का हकलाना
@
हमको समझे होते,ऊपर से नीचे तक जिस दिन
मुमकिन उस दिन हो
जाता,चाहत का और ठिकाना
#
बारिश का मौसम ,केवल खामोशी से आता है
यादों के जंगल
में भीतर ,पैरहन भिगा जाना
#
लेकर अपनी सूरत रोनी सी कल से बैठे हैं
खुशियों का लगता, इस दीवाली लौट नहीं आना
#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)
susyadav7@gmail.com
7000226712
4.4.24.
65....
२२ २२ २२
२२ २२ २२
२२
साया हट गया है, फिर नया बरगद तलाशिये
अब मेरी जमीन, है गुम यहाँ , सरहद तलाशिये
x
एक जहर , पीने का माहिर , सुकरात चल दिया
जो थक गए चांट
खून उन्ही को शहद तलाशिये
x
संभव नहीं उठाना पाँव को अब
धरातल से
कलयुग में , सियासी अमन के, अंगद तलाशिये
x
मेहनतकश ने नुमाइशी बनाया जो ख़ास
ये मन्दिर ढके या
मस्जिद ढके गुम्बद तलाशिये
x
लिए परचम
जिहादी घूमता चारों
तरफ यहाँ
आजादी के क्या
माने वहां , मकसद तलाशिये
x
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)
susyadav7@gmail.com
7000226712
4.4.24.
66...
मनसरह मुसम्मन
मतवी मकसोफ़
मुफ़तइलुन फ़ाइलुन
मुफ़तइलुन फ़ाइलुन
2112 2 12
2 112 212
सोच के मन काम औ काज बदल देता है
कल के तरीके
से वो आज बदल देता है
बदले
उड़ानों के भरने का तरीका कभी
‘पर’
को कतरने वो अंदाज बदल देता हैँ
सीखे हुनर मिट्टी
से जो बना दें सोना यूँ
मेहनती हर शक्श
सम्माज बदल देता हैँ
कौन
बदल पाया आदत जो पड़ी
बारहा
एक बुरा सा सबक रिवाज़ बदल देता है
कौन सिकन्दर बना
सदियों रहा राज में
वक्त लकीरें सिरों ताज बदल देता है
जाने
वही कौन सा हो ढंग उसे भाएगा
वक्त
से पहले वही आगाज बदल देता है
चाहे
गुँजाईश भी होती नहीं सामने
लोग हों
कमजर्फ आवाज बदल देता हैँ
@
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)
susyadav7@gmail.com
7000226712
5.4.24.
67…
बहर-ए-हिन्दी
मुतकारिब मुसद्दस मुज़ाफ़
फ़ेलुन फ़ेलुन
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े
22222222222
खुदगर्जो का नब्ज, टटोलना है बाकी
भरी सभा में मेरा, बोलना है बाकी
मुझसे
मेरी तन्हाई की, क्या होती हैं बातें
फर्क
सामने से बस, तौलना है बाकी
घर से चला था,
नजदीक समझ के शिवाले
तुम सामने आ
दिखी, क्या सोचना है बाकी
यूँ
लगता बरसों से, जानता हूँ तुझको
पर
लगता खूब तुझको, समझना है बाकी
कुछ जगह से टूट गया , रिश्तो का धागा
नाजुक कडियाँ ही
अब, जोड़ना है बाकी
कल
संभावना की बाढ़ से, भरपूर थी नदी
आज
सूखे में योजना , डुबोना है बाकी
हाशिये भर कागज़ में
,खुल के सब लिखना
बिन कहे कह जाती
, आलोचना है बाकी
#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)
susyadav7@gmail.com
7000226712
5.4.24.
68…
मुतदारिक मुसम्मन
सालिम
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
फ़ाइलुन
212 212
212 212
#
बाग़ तू भी लगा
तितलियाँ आएगी
उजड़े गाँव नई
बस्तियाँ आएँगी
#
आँख ही मौन सूनी रहे
सादगी
बरसे बादल यहाँ , बिजलियाँ
आएँगी
#
चार क़दमो को , चलना नहीं जानते
हिम्मतों फिर से बैसाखियाँ आएँगी
#
आज उम्मीद की बंसियां डाल
दे
तैरती कल सभी, मछलियाँ
आएँगी
#
तुम सफ़र में अकेले, जरा
सम्हलो
सामने औऱ , दुश्वारियां आएँगी
#
कुछ असरदार अंदाज़ में
जो छुपा
छप के अख़बार में , सुर्खियाँ
आएँगी
##
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)
69….
मदीद मुसम्मन सालिm
फ़ाएलातुन फ़ाइलुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन
2122 212
2122 212
मेरे
हिस्से जब कभी शीशे का घर आता है
तेरे
हाथों में अचानक क्यों
पत्थर आता है
#
पास रखता
था यहाँ मैं दिखाने आइना
हाथ मेरे
आज छोटा यहाँ घर आता है
#
एक आफत वो हमें रोज चिपकाता रहा
इक
शिकन्जा सामने जांच दफ्तर आता है
#
चाहने
का तुम को मालूम है अंजाम भी
जब धुआँ हो आसमा, पर वो क़तर आता है
#
अब उतर
जाए मिरे खौफ का आलम यहाँ
मुझको
सीधा सादगी बोल अक्सर आता है
#
जानता हूँ हर तरफदारी को मै आजकल
हार को पहचान अपनी पे उतर आता है
#
सीख पाते काश तुम भी शराफत का चलन
रोज की मनहूसियत पास चलकर आता है
70...
Ramal musamman
mahzuuf
faa'ilaatun
faa'ilaatun faa'ilaatun faa'ilun
2122 2122
2122 212
थी हरारत बस बदन को , हार
ले के आ गए
तुम हवा कुछ बाहरी बीमार ले के आ गए
काट लाना था तुम्हे जो लहलहाती सी
फ़सल
मुट्ठियों में तुम
दबा बस ज्वार ले के आ गए
खास जब तकलीफ आई सामने उनको जरा
आप अपना राग सुर
विस्तार ले के आ गए
ये सियासत
नासमझ बन चौंक उठती बारहा
तुम कहीं खुदगर्ज
से तलवार ले के आ गए
आज वादों से मुकरने की बनी
गुन्जाइशें
सामने फिर इल्तिजा दो चार ले के आ गए
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)
14.4.24
71….
KHafef musaddas
maKHbuun mahzuuf
faa'ilaatun
mufaa'ilun fa'ilun
2122 1212
112
देख विस्तार , काँपने लगे हम
अपना क़द फिर से, नापने लगे हम
#
हम थे बेबस यही, मलाल रहा
आइना साफ ढाँपने लगे हम
#
हर सहूलत यहाँ इमान बिका
हाशिये पर ये छापने लगे हम
#
ढूंढ लो आदमी बगैर पता
वोट जंगल ये भांपने
लगे हम
#
काश अच्छे दिनों की जाप न
हो
आँच आसान तापने लगे हम
##
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.) 14.4.24
72….
19.4.24
मुंसरह मुसम्मन मतवी मनहूर
मुफ़तइलुन फ़ाइलात मुफ़तइलुन फ़े
2112
2121 2112 2
इस जहां में अब वो, अजनबी नहीं मिलता
शक्ल का मुझसा भी आदमी नहीं मिलता
#
ख़ास नहीं
था कहीं लिबास छिपाया
मेरी
तलाशी में कुछ कभी नहीं मिलता
#
आज लगा
आसमान दूर पहुँच से
राह में
तकलीफ अब, सही नहीं मिलता
#
एक तिराहा
सुकून का, था मिरा दिल
चोट जिगर माँगता ,वही" नहीं मिलता
#
छीन लिया
रहबरी में चैन करार अब
वक्त
मुझे खास खास भी नही मिलता
#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर
जोन 1 स्ट्रीट 3 दुर्ग छत्तीसगढ़
73…..
hazaj musamman akhrab
maf'uul mufaa'iilun maf'uul mufaa'iilun
221 1222 221
1222
हर बात छुपाने की दिल से ही मिटा देंगे
जिस हाल
हमें छोड़ा वो, हाल भुला देंगे
मालूम न था, हमको बस तुझ से,
शिकायत है
तस्वीर जुदा होगी, जो तुझको दिखा देंगे
बस आज इशारों कर लो आप वफादारी
मजबूत इरादे कल ये राह हटा देंगे
इस तरह कोई अपनों से रूठ नहीं जाता
रूठे से ख़ुदाओं को बेफ़िक्र हँसा देंगे
गुत्थी जो सुलझती सी, दिखती है तभी हमको
वो
राज़ के खुलने का तफ़सील बता देंगे
मुफ़लिस के भरोसे
रहती काश तेरी दुनिया
दरवाज़े
पे जन्नत तक दरबार लगा देंगे
अब पैर बढ़ा के इत्मीनान ज़रा रख ले
सुलगे से सवालों ये आसान बना देंगे
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर
जोन 1 स्ट्रीट 3 दुर्ग छत्तीसगढ़
20.4.24
74….
Ramal musaddas maKHbuun mahzuuf
faa'ilaatun fa'ilaatun fa'ilun
2122
1122 112
ज़ख़्म मेरा, लो उभरने लगा है
शहर इक
नाम से, डरने लगा है
#
प्याले विष ,कोई अभी
हाथ न थे
पर जहर
नस नस , उतरने लगा है
#
हाथ आया क्या
जमाना जो गया
'पर' समय कौन, कुतरने लगा है
#
अब तुझे भूल ,कवायद जो करें
अक़्स दिल जान अखरने लगा है
#
इक बसाहट
थी तिरे नाम यहाँ
वो भी
खामोश उजड़ने लगा है
#
साथ साये
की तरह मेर रहा
खौफ से वो भी बिछुड़ने लगा है
#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर
जोन 1 स्ट्रीट 3 दुर्ग छत्तीसगढ़ /20.4.24
75….
23.5.24
फ़ेलुन
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े
नज़्म
इंतजार
कर ....
तू
है अगर मेरी रूह तो नजाकत से पेश आ
जो परछाई है तो चलने का इंतजार कर
#
तू
जो सदा है खामोश रह न खुल के बोलना सीख
जो
पांव की जंजीर है ,
खुलने का इंतजार कर
अक्ल
का अगर धागा पक्का सोच समझ के उलझ
संयम
का गौहर है, पिरने का इंतजार कर
#
जंगल
की आग है तो जरा ठहर-ठहर के जल
हवा
-आँधी का रुख भांप बुझने का इंतिजार कर
#
आफताब
ने सब पिघला दिए मेरे ख्वाब बुलंद
बादल
बुला कहूँ शाम ढलने का इंतजार कर
#
तेरे
हक में कोई दिन यहाँ बुलंदी
मयस्सर
कुछ और
ठहर कयामत के गिरने का इंतजार कर
#
सुशील
यादव
न्यू
आदर्श नगर
जोन
1 स्ट्रीट 3 दुर्ग छत्तीसगढ़
76….
मदीद मुसम्मन सालिम मख़बून
फ़ाएलातुन फ़इलुन फ़ाएलातुन फ़इलुन
2122
112 2122 112
वक्त से पहले किसे कुछ मिला है भाई
सोच
काफिर की मनौती खुदा है भाई
#
नेकियाँ काम कभी
आएगी कौन कहे
एक निर्धन का निवाला छिना है भाई
#
वो मुहब्बत की दुकाने सजाने लगा है
पास उस के सुविधायें हिना है भाई
#
खैरियत मान कि तू आजकल जीत रहा
नाप ताबूत
तिरे बन रिया है भाई
#
माँगने वाला जो
तकदीर से है ज्यादा
अब घरो घर वो भटकता फिरा है भाई
#
इस हुकूमत ने किया है बिना काम तबाह
बस समझ सोच सियासत किया है भाई
#
खुद सजाने पे लगा सोच के इस घर को
जिन्दगी नाम इसी के जिया है भाई
#
सुशील यादव न्यू आदर्श नगर जोन 1 स्ट्रीट 3 दुर्ग
छत्तीसगढ़
76…
24.5.24
bahre zamzm.h Mutdaarik musaddas muzaa.if odd
split
fe'lun fe'lun fe'lun fe'lun fe'lun fe'lun
22 22 22 22 22 22
जा
के दूर, वापस
लौटना, अच्छा
नहीं लगा
बात
आपसी मुँह का मोड़ना ,अच्छा
नहीं लगा
#
मातमपुर्सी
आते, लोग
हैं आजकल इस तरह
रस्मो
को तराजू-तौलना अच्छा नहीं लगा
#
काबिल
अभी माफी के दीगर बात है वर्ना
हर
जगह हो जाना रुसवा, अच्छा नहीं लगा
#
तुम
सम्हालो खुद तमीज की सल्तनत यहीं
कल
तो और का है बोलना, अच्छा
नहीं लगा
#
गम
के दौर में कब चलन से बाहर हुआ 'सुशील'
'नोटों'
आप-खुद का बिखरना,
अच्छा नहीं लगा
#
आती
लाखों तक गिनती, करोड़ क़्या जाने
छोटी
उम्र का ये तजुर्बा, अच्छा
नहीं लगा
#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर
जोन 1 स्ट्रीट 3 दुर्ग छत्तीसगढ़
78…
26.4.24.
Madiid musamman saalim maKHbuun
faa'ilaatun fa'ilun faa'ilaatun fa'ilun
2122 112
2122 112
सूख
कर कौन यहां खास ,काँटा
हुआ है
आज
तुम देख लो ऐसा ,तमाशा
हुआ है
#
जंग
मे हारा हुआ, लौट
आया है हताश
महफिलों
आप वही, तो
नकारा हुआ है
#
कौन है बेच
दे , सौदा
कभी घाटे यहाँ
जब
तलक मंदी का आगे , इशारा
हुआ है
#
हम
नहीं अपना सके, राह जो भूल गए
छोड़
के आना उसे, कब
गवारा हुआ है
#
हम तरसते
ही रहे इक बुलंदी को सुशील
भीतरी दर्द मिरा
सब्र मारा हुआ है
#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर
जोन 1 स्ट्रीट 3 दुर्ग छत्तीसगढ़
79...
रमल मुसद्दस सालिम
फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन
2122 2122
2122
मचला है मासूमियत पारा हो जाए
जितना रब से मागो तुम्हारा हो जाए
#
राह तुमने कल बिछाये तल्ख काँटे
फूल में तब्दील वो सारा हो जाए
#
देख दाता सब के ऊपर है हिसाबी
कर इबादत जान दिल प्यारा हो जाए
#
भेज दो तुम पत्र जिसको हाथ से लिख
बस मुहब्बत का वही हरकारा हो जाए
#
ये धुँआ सा क्या उठा है दिल में तेरे
आग
जलकर साफ अंगारा हो जाए
#
याद जंगल भूल भटका तेरे खातिर
मन कहीं लगता ना बंजारा
हो जाए
#
राह पर काँटे जहाँ बिखराती हो तुम
बस वहीं मेरे कदम दोबारा हो जाए
#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर
जोन 1 स्ट्रीट 3 दुर्ग छत्तीसगढ़
80...
29.4.24.
मुतकारिब
मुसम्मन महज़ूफ़
फ़ऊलुन
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल
122 122 122 12
###
बिना कुछ कहे सब अता हो गया
खतों
का वही सिलसिला हो गया
#
दबे पाँव चल के,गया था जहाँ
शिकारी वहीं , लापता हो गया
#
मुझे
देख , फिरती
निगाहें हसीँ
गुनाहों
जुड़ा कुछ नया हो गया
#
नही बच सका, आदमी लालची
भरे पाप का जब , घडा हो गया
#
छुपा
सीने में राज रखता कई
सयाना
सा मुखबिर, बड़ा
हो गया
#
सरे राह
अस्मत जहाँ पर लुटी
सियासत
वहीं बे सदा हो गया
#
कहीं
मातमी धुन. सुना तो लगा
अचानक
नगर में दँगा हो गया
#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर
जोन 1 स्ट्रीट 3 दुर्ग छत्तीसगढ़
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