Saturday, 13 May 2023

 

गीत

उम्र क़े इस पड़ाव में.....

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दर्द जहाँ मैं टांगा करता,

 टूटी आज वो खूंटी लगती

सारे संबल, सभी आसरे,

बिना असर की बूटी लगती

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लेकर चलना उसी गली में,

यादों का भरता हो मेला

बचपन खेल घरोंदे वाले,

मैं

नाव डूबता, रहूँ अकेला

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 उम्र क़े अब इस पड़ाव में,

कितनी बातें छूटी  लगती

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अरमानों के जब पँख नहीं थे,

आकाश लगा करता छोटा

उड़ने की जब ताकत आई,

व्यवधानो ने अक्सर टोका

lll

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शेष नहीं कुछ कहने जैसा,

 नगीना खोई अंगूठी लगती

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इन बाजुओं का दम तो देखो

पहले जैसा आज भी क़ायम

आज भी  मिलने की चाहत,में

रत्ती भर उत्साह नहीं कम

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चाहत की दुनियां तुझ बिन

खाली - खाली झूठी लगती

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उमंग उजालों की सजती,

सदा रहे पहचान दिवाली

मुस्कान बांटते जाना यूँ,

तमाशबीन  बजा दे ताली

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मंहगाई के हाथ थमी हो ,

विपदा लम्बी सूटी लगती

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सुशील यादव

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