देख दुनिया . . .
सुशील यादव(अंक: 206, जून प्रथम, 2022 में प्रकाशित)
2122 2122
2122
नेक नीयत आप यूँ सुल्तान हो गए
हर किताबी
हर्फ़ अब आसान हो गए
हम शिकायत
कर नहीं पाते वहाँ पर
आजकल
बच्चे जहाँ तूफ़ान हो गए
देख
दुनियाँ बैठ जाते हम किनारे
क़ीमतें
छूते हुए असमान हो गए
राहतों का
ये ज़ख़ीरा जो लिए तुम
सादगी के
ईश्तहारो-बखान हो गए
डर के
जीना आ नहीं पाया कभी मगर
क़ौम
ज़िन्दा के बचे हम निशान हो गए
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