भरे ग़म के ये नज़ारे समझ नहीं
आते
सुशील यादव(अंक: 228, मई प्रथम, 2023 में प्रकाशित)
1222 2122 12
12 22
भरे ग़म के
ये नज़ारे समझ नहीं आते
हमें हर
हालात मारे समझ नहीं आते
जुगनुओं
को पास के मैं समझ लेता
हुए दूर
अगर सितारे समझ नहीं आते
ख़ला में
दिन-रात क्या ढूँढ़ते जनाब आली
करें मातम
ये बिचारे समझ नहीं आते
मेरे भीतर
एक रहता सदा बना ख़ामोश
मुझे उसके
क्यों इशारे समझ नहीं आते
कहीं
ज़ेहन बुग्ज़ सा तो रहा नहीं हाज़िर
सितम वाले
तैश सारे समझ नहीं आते
भटक रहा
हूँ रात दिन यहाँ बना काफ़िर
खुली
क़िस्मत के दुवारे समझ नहीं आते
बुग़्ज़=
(अरबी; संज्ञा, पुल्लिंग) वह बैर जो मन ही मन में
बढ़ाया जाय, और प्रकट
न किया जाय, द्वेष, बैर, छल, कपट, ईर्ष्या, दुश्मनी, कीना, हसद, जलन
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