Friday, 12 May 2023

 

कितनी थकी हारी है ज़िन्दगी

सुशील यादव(अंक: 204, मई प्रथम, 2022 में प्रकाशित)

2212     2212     12

 

कितनी थकी हारी है ज़िन्दगी 
लगती मगर प्यारी है ज़िन्दगी
 
सब नगद की चाहत लिए खड़े
किसकी नक़ल उतारी है ज़िन्दगी
 
कितनी चढ़ी प्रभु नाम पतंगे
दुख से भरी भारी है ज़िन्दगी
 
हम मसखरी में कह नहीं सके 
जंग तुझ से जारी है ज़िन्दगी
 
सब छोड़ चले बारी बारी मगर 
कब अपनी बारी है ज़िन्दगी 
 
वो चेहरा बिगड़ा हमें मिले
सौ जतन संवारी है ज़िन्दगी
 
हमसे तमंचे की तमीज़ ले
खादी पहन गुज़ारी है ज़िन्दगी

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