मेरे शहर में
सुशील यादव(अंक: 182, जून प्रथम, 2021 में प्रकाशित)
मेरे शहर में दूध का कोई धुला नहीं है
या आदमी
सा आदमी मुझको मिला नहीं है
तुझको कभी
देखे ज़रा आता क़रार सा था
औरों से
तू ये मानता हूँ ख़ुद जुदा नहीं है
अब आसमां
से खींच कैसे बाँट दूँ तुझे भी
मेरे
हिस्से की और तो हासिल हवा नहीं है
हम हो क़फ़स
में क़ैद रहते हैं घरों में मसलन
आज़ाद होने
का जैसे सपना बुना नहीं है
तू बाद
जाने के बहुत हमें याद भी रहेगा
कैसे कहूँ
जाना तेरा दिल को अखरा नहीं है
हालात फिर
होते गए क़ाबू से आप बाहर
कोई सदी
में हादसा इस क़दर तो गुज़रा नहीं है
ख़ुशबू उठा
लाई पुराने दिन को सामने फिर
मेरे बदन, तू रु ब रु, गोया जुदा नहीं है
मै भाइयों
से ख़ूब लड़ के थक गया इसीसे
सोचा
अदावत से किसी को फ़ायदा नहीं है
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