अपनी सरकार
हाथों में
दम-पतवार है साथी
माझी की
कब दरकार है साथी
बस एक
बिगुल से दौड़े तुम चलना
सीमा की
सुनो पुकार है साथी
छलनी-छलनी
कश्मीर का सीना
घायल-
मज़हब, व्यवहार
है साथी
है अपनी
जमा पूँजी बस इतनी
साबुत
साँझी-दीवार है साथी
उनसे मेरी
अब निभेगी कैसे
मेरी-उनकी
तकरार है साथी
हाशिये
में बहुत आम हैं ख़बरें
सफ़ा-सफ़ा
तो इश्तिहार है साथी
बैद- हकीम
बैगा-गुनिया देखे
मुल्क अब
तलक बीमार है साथी
देशद्रोह
का इल्ज़ाम है उनपर
मासूम
कहीं गिरफ़्तार है साथी
राम-राज
लाने विदेश निकलती
अजीब अपनी
सरकार है साथी
अवसर
सुशील यादव(अंक: 182, जून प्रथम, 2021 में प्रकाशित)
जो बरगद, पीपल, बूढ़े पिता के बारे में सोचता है
वो यक़ीनन
मज़हब, ईमान, ख़ुदा के बारे में सोचता है
डिगा सकता
है वही शख़्स यहाँ, इंच-भर
अंगद के पाँव
जो मुसीबत
में पिसते हुए, इन्सां के
बारे में सोचता है
बहाना
कौन चाहता है, गंगा में
अपनों की लाश को
तंग हाल
आदमी कब, कफ़न चिता
के बारे में सोचता है
वो मयकदे
में आख़िरी साँस तक, हो बेआबरू
जी लेता
गिद्धों
के बीच कौन, अस्मिता
के बारे में सोचता है
लोगो ने
बना दिया, आफ़त को, अवसरों का बाज़ार
हर आदमी
आमदनी फायदे के बारे में सोचता है
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