Tuesday, 27 September 2022

मुफ्त चंदन

 

2122   1222 2

मुफ्त चंदन.....

कल जिसे तू मिला है भाई
 दूध का वही धुला है भाई

आदमी चाहे जो अपनापन 
खैरियत से मिला है भाई

हिन्दु मुस्लिम सँग रहते हों 
पास क़ोई जिला है भाई

फूल कितने बिछाए रखते 
तेरा कांटा गिला है  भाई 

बो रखे  हैं बबूल हजारों
फूल कह दो खिला है भाई

राग कैसे अलापे जीवन
ये गला तो छिला है भाई

मुफ्त  चंदन घिसा जो करते
दिल मेरा वो सिला है भाई 

सुशील यादव::: न्यू आदर्श नगर दुर्ग

2122 2122 1222
वो जो मोहब्बत की तकदीर लिखता है
किसी-किसी के हाथ जागीर लिखता है
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कोई चाहे कुछ गरम कोई ठंडा यूं
मांग के माफ़िक वो तासीर लिखता है 
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साथ चलते भाँप लेते हवा का रुख
नाम उनके वक़्त ही समीर लिखता है
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  हो जिसे अँधेरे का खौफ जीवन भर
  बस खुदा ही समझ तनवीर लिखता है  
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हम रहें जिसे पाने आवेग  से आतुर
ये जमाना अब हमें अधीर लिखता है
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दर्द के हर कोण की नाप ले जीता
वो ख़लाओ तेरी तस्वीर लिखता है

सुशील यादव

1222 1222 1222 22
गज़ल
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जमीनों में छिपा रक्खा खजाना मिल जाए
जुदा बरसों कोई साथी पुराना मिल जाए
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हमें ख़त क़े नहीं मिलते पढ़े होने का सबूत
फकत मजनून भाँपे हों,हर्जाना मिल जाए
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नहीं मिलते कभी शहरों सहज रिश्ते जन्मों क़े
बनावट क़े विज्ञापन कुछ बहाना मिल जाए
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गली में जो गुजरती शाम क्या कहने उनके
मेरी तकदीर मौसम वो सुहाना मिल जाए
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मुकम्मल ही नहीं खाना -बदोशी क्या कीजे
खुदा की बारहा रहमत ठिकाना मिल जाए

सुशील यादव

122२    1222  1222
वही बस्ती, वही टूटा  खिलौना है
वही अलगू,मिया जुम्मन का रोना है
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बना जाते सलीके से मुझे लायक
ये मिटटी अगरचे ढूढो कि सोना है

कहाँ बनते यहाँ रिश्ते सलीके  से
किसे मोती कभी आया पिरोना है
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वफा के बीज डालो ये पता तो चले
खफा मौसम रहा या नसीब बौना है
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उसे पैगाम दे दो, खैरियत है मेरी
मिसाल के तौर सुइयां जिसे  चुभोना है
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तरीके से मिला करती खुशी कल तक
अभी उस दौर का ख़्वाब ही सलोना है
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सुशील यादव दुर्ग छत्तीसगढ़

आजकल जाने क्यों.....
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एक गलत सोच, आखों की स्याही बदल देता है
समूचे शहर को बारूदी , तबाही बदल देता है
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फर्क पड़ता नहीं तुम्हारे ऐशो- आराम में तनिक
आंकड़ो की मुनादी ही बस गवाही बदल देता है
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रिश्तों को निभाना इतना नहीं  आसान आपस में
जुबान की जरा तलखी आवाजाही  बदल देता है
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मजबूरी ये कि हम बदल नहीं सकते खुद पडोसी
सामने का मुल्क बातों की कड़ाही बदल देता है
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छीन कर ले जाता था कोई मेरा चैन -करार वही
आजकल जाने क्यों तरीका उगाही बदल देता है
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सुशील यादव
2212  2212 222
बात तल्ख़ सी
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मेरी जुबां जब भी फ़िसल जाती है
कुछ बात तल्ख़ सी बस निकल जाती है
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खामोश हो जीने का मकसद भी क्या
खामोशियाँ गम में बदल जाती है
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बैसाख या आषाड़ सावन भादो
मजबूरियां मौसम निगल जाती है
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उसको तराशे  थे हमी जी जान से
हीरे की सूरत अब तो खल जाती है
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लाखों की  चाहे हो कमाई दौलत
सरकार की नजर आजकल जाती है
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सुशील यादव

2212     2212      2122
सनसनी....
अब तो यहाँ  इस बात की सनसनी है
हाथों में पत्थर, और जान पे बनी है
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हमने तराशा  हीरे की शक्ल-सूरत
लिपटी वहीं पे तरबतर  चाशनी है
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सरकार क्यूँ हैं आग बबुला से मेरे
दब कौन सी नस गई, चढ़ी  झुंझुनी है
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खामोश हो जीने का मकसद यहाँ क्या
आसार बारिश ,मेघ परतें घनी  है
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ये फैसलों क़े बाल सारे हैं सफेद
राहत यहां कमजोर सी संगनी है
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तुम हो कहां सब आजमाने लगे हैं
उम्मीद की हर किरण अब अनमनी है
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रहबर मिले तो मंजिले खूब आसान
वरना तो  खुल्ले आम अब रहजनी है
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सुशील यादव
2122 2122 2122
कातिलों क़े शहर में.....
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फूल की खुशबू  कहीं तो चमक क़े लिए
होश वालों की लड़ाई है नमक के लिए
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वक़्त ने देखा जहर नफ़रत का घुलता
बोलते क्या- क्या रहे तुम सनक क़े लिए
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आज मायूसी मे तेरी याद आई
आज छलका दर्द मीठी  कसक के लिए
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एक हम  जो दे रहे हैँ आप  दस्तक
यूँ सभी लापता हैं शफक क़े लिए
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कहने को  बाक़ी बचा  क्या पास मेरे
कातिलों क़े इस शहर में रमक़ क़े लिए
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रहगुजर में बैठ कर देखना कभी तुम
आस तो मिटती कहां इक झलक क़े लिए
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मयकदे में जो नसीहत पी गया हो
खैर उसकी क्या मनाएं शतक क़े लिए
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शफक = क्षितिज की लाली
रमक़ = रही सही जान, थोड़ी सी जिंदगी
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सुशील यादव

2212  2212 2212 112/22
माथे शिकन  कब  चेहरा आकर तनाव गया
सच बेचने  निकला जहाँ लाखो का भाव गया

क्यूं तौलते अपनी गरज से लोग आजकल
लगता तुम्हारे शहर से होकर चुनाव गया

माथे पे शिकन, चेहरे पर चाहे  तनाव आ जाये
सच कभी न बेचिये लाखों भले भाव आ जाये

लोगों को तौलते हैं अक्सर अपनी गरज में आप
बिना मकसद कब पूछते,जब न चुनाव आ जाये

उनके इशारों में तो फिजूल लाख लुटा देते हैं
बात तब हैं ईंट पत्थरो क़े घर लगाव आ जाये

अपना कुनबा छोड़ क़े यायवर  कब तक जियें चढ़ती उमर क़े फैसलों में कहीं कसाव आ जाये

बारिश क़े भरोसे में नदी उफनाती रही यक़ीनन
किसे मालूम किस ढलान कहां  रिसाव आ जाये

26.6.22

मौसम....
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मेरे चाहने से कब बदला है मौसम
तेरे कहने पे जो चलता है मौसम
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घुटने - घुटने पानी  जब नावें चलती
ठहरा - ठहरा  तब तो लगता है मौसम
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नदिया बीच  भंवर  मेँ फँस कर ये जाना
खुद भी कैसे रह लेता तन्हा मौसम
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एक दूजे की करते पूछ परख तब तक
तिरपाल तले हो कुनबा सूखा मौसम
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सालों बाद भटकते आया है जाने
कुछ तिलस्मी, फिल्मी कुछ गोया मौसम
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सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ़
मोबाईल :7000226712

2212  2212   2212 1222
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1222 1222 1222
तमाचा वक़्त का...
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किताबों में  कहां अब  फूल मिलता है
बचे लोगों  ले दे क़े उसूल मिलता है
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सभी पाशे चले शकुनी की अब चालें
जिसे मौका सही अनुकूल मिलता है
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विरासत को बचाने की कवायद हो
वगरना मशवरा उल जुलुल मिलता है
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नहीँ है कायदे से कोइ रखवाला
सियासत सादगी अब धूल मिलता है
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क़ोई कांटे बिछा क़े जब चला जाता
तमाचा वक़्त का माकूल मिलता है
#
सुशील यादव





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