Thursday, 15 September 2022

  ये वो सुबह तो नहीं ,

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ये वो सुबह तो नहीं ,

जिसकी बांग

किसी मुर्गे ने दी हो

और

जाग गया हो

सोते से

सारा गाँव ..

वो सुबह ,कि

घण्टियाँ बजाते

चल रहे हो बैल

किसी खेत की पगडंडियों पर

और हुर्र की आवाज से चौंक कर

उड़ गई हो चहचहाट करती चिड़ियाएं

वही मस्जिद की किसी मीनार पर जा बैठते

बरबस गूंज गई हो अजान

वो सुबह जब

शब्द -कीर्तन की आवाज संग उठने को

आतुर हुई हो

सूरज की पहली आभा वाली किरणे

या जाड़े में ठिठुरते

रामायण की चौपाई बांचता

बगल से गुजर गया हो

कोई पण्डित

ये सुबह वो तो नहीं

जब

अलगू और जुम्मन

एक ही छाते में

कुछ भीगते, कुछ भागते

पड़ौस के गाँव से

बुला लाये हो डाक्टर

और बचा ली हो

प्रसव वेदना से कराहती किसी

गऊ माता की जान

ये वो सुबह भी नहीं

जब

झुर्रियों भरे चरहरों से

पर्दा करती

चुपचाप निहरे

पानी भरने

निकल रही हो औरतें

या पीछे ,नँगे-अधनंगे बच्चे

रात की बासी रोटियां लिए

माँ की घुड़कियों सुन

खपरैल के घरों को लौट रहे हो

***

शायद गाँवों में

इन दिनों भी

ऐसी सुबह हुआ करती हो

अम्न,चैन ,भाई चारे की

पर रोना तो ये है

मेरी नींद

इन दिनों

देर से खुलती है

***

सुशील यादव

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