Thursday, 15 September 2022

कातिलों क़े शहर में....

 

2122 2122 2122
कातिलों क़े शहर में.....
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फूल की खुशबू  कहीं तो चमक क़े लिए
होश वालों की लड़ाई है नमक के लिए
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वक़्त ने देखा जहर नफ़रत का घुलता
बोलते क्या- क्या रहे तुम सनक क़े लिए
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आज मायूसी मे तेरी याद आई
आज छलका दर्द मीठी  कसक के लिए
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एक हम  जो दे रहे हैँ आप  दस्तक
यूँ सभी लापता हैं शफक क़े लिए
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कहने को  बाक़ी बचा  क्या पास मेरे
कातिलों क़े इस शहर में रमक़ क़े लिए
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रहगुजर में बैठ कर देखना कभी तुम
आस तो मिटती कहां इक झलक क़े लिए
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मयकदे में जो नसीहत पी गया हो
खैर उसकी क्या मनाएं शतक क़े लिए
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शफक = क्षितिज की लाली
रमक़ = रही सही जान, थोड़ी सी जिंदगी
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सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ़

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