Thursday, 15 September 2022

 2122 2122   2122  2122

सच कहो तो आजकल दर-ब-दर हैं हम

दस्त बस्ता  शहर में बे-हुनर हैं हम


नोचता है  चेहरा मासूम कोई

अब किसे बतलाय कितने निडर है हम


ये अमानत सौप जानो- जिस्म देकर

ढूढने को निकले क्या-क्या  गुहर हैं हम


हम कहानी किस्से की बुनियाद हो गए

सोचते हैं खलवतों  जादुगर हैं हम


खबर ये   वादा खिलाफी की उड़ा दे

जग ने जाना सच,चलो बे फिकर हैं हम


पुल बना कर आप चलना चाहते हो

ये हकीकत जान लो  पुरखतर हैं हम


अब न रूठती है अनारकली यहां पर

नए जमाने खैरख्वाह  अकबर हैं हम


बाअदब वा बा-मुलाहिजा अकबर हैं हम


122 122 122 122 

कहीं चोट  खाए सवालो घिरे हैं

बंधे हम  मुस्काए सवालो घिरे हैं

 

जनाजा किसी गैर का और शामिल

रहे मुह  छिपाए सवालो घिरे हैं


नहीं बात बनती दिखे तो समझिये

बुद्दू लौट  आए सवालो घिरे हैं


जिसे नींद में चलने की आदत नहीं

तजुर्बे भुनाए, सवालो घिरे हैं

 

जनाजे को उनके कंधा क्या दिये हम

रहे  सर चढ़ाए ,सवालो घिरे हैं


नहीं जानता  था सबूतों में शामिल

दस्ताने छुपाए ,सवालो घिरे हैं

सुशील यादव

२. ४. १८

122 122   122 122

कहीं चोट  खाए हैं मेरी तरह वो

बंधे हाथ  मुस्काय हैं मेरी तरह वो

 

  जनाजा किसी गैर का और शामिल

  रहे मुह  छिपाए हैं मेरी तरह वो


नहीं बात बनती दिखे तो समझिये

बुद्दू लौट  आए हैं मेरी तरह वो



जिसे नींद में चलने की आदत यहाँ

तजुर्बे भुनाए हैं  मेरी तरह वो

 

@@

जनाजे को उनके कंधा क्या दिये हम

बेजा  सर लगे  खाये हैं  मेरी तरह वो





1222  1222 २१2


नफरतो के घने जंगल

 मुहब्बत या  जंग बराबर सा लगा

 पड़ौसी फिर  मुझे रहबर सा लगा


यकीन के बाजुओं सर पटका किए

अचानक वो कड़ा पत्थर सा लगा


लकीर जिसे नसीब कहे आदमी

कहीं वो  बेसबब अजगर सा लगा


नफरतो के घने जंगल क्या घिरे

दुआ भी पलट ढाई अक्षर सा लगा


हमेशा सावधानी की सोचिये

भले ही सांप मोम-रबर सा लगा

सुशील यादव

21.7.17


यकीन के काँधे जो  सर पटका किए

अचानक वो कड़ा पत्थर सा लगा


No comments:

Post a Comment