लोग कहते अब.....
अब यहां ना आशियाँ- परिंदा बचा
यार बारूद का धुँआ बस धुँआ बचा
ले गया फिर छीन बस्ती कोई अमन
डबडबायी आँख आँगन कुँआ बचा
कौन सूरत आप पहचानता यहाँ
पास किसके आजकल आइना बचा
वो सभी पल याद हमको करीब से
वो जहां बस आदमी झुनझुना बचा
हाँ मुझे भी लौटना है 'सुशील' पास
लोग कहते अब वहीँ मन 'घना' बचा
सुशील यादव दुर्ग
2122 2122 1212
20.6.18
122 12
मुझे चाहता है मगर वो नहीं बोलता
जुबा सादगी नाम से ही नहीं खोलता
'सुशील' जो भूला ....
दिल रखने को तुझे दिया क्या है
तू ही बता कि फ़ायदा क्या है
यारा बुझा दिया चिरागो को
जलता हुआ यहाँ बचा क्या है
मुहताज हैं खुदा यहाँ हम भी
ये मुफलिसी सिवा मिला क्या है
अब तिलस्मी लगी हमे दुनिया
देखे ये फैलता नशा क्या है
चारो तरफ है भीड़ का उन्माद
नारो के बीच निकलना क्या है
मजबूरियों 'सुशील' जो भूला
अब तो बता सही पता क्या है
सुशील यादव दुर्ग
खोज लिया जिसने .....
जब दुश्मन जाने पहचाने हैं
यारो हम भी बहुत सयाने हैं
लेकर अपनी बस राम-कहानी
समझौतों के सहज निशाने हैं
मुस्कान मिली तो जीवन छलका
यूँ गम के सौ-सौ अफसाने हैं
जग को दे न सके अपना परिचय
कहने के कई लाख बहाने हैं
किसने हमको कब तौला-परखा
हम बीते इतिहास पुराने हैं
खोज लिया जिसने दिल को भीतर
पाए असल 'सुशील' खजाने हैं
सुशील यादव
14.7.17
गलत राय गलत मशवरा देने वाले
मुंसिफी की आड़ फतवा देने वाले
बिजलियाँ सौ -सौ गिरे तेरे घरों में
ओ जन्नते काश्मीर जला देने वाले
सुशील यादव
दहशत ,दीवारें और अदावत केवल
सीख लिए होते काश बगावत केवल
माथा सहजादों का है झुकते देखा
जिनका मकसद होता मोहब्बत केवल
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2212 2212 1222 2
अहसास ....!
है कौन,जो तन्हाई को सदा देता है
मुझको कभी,बन के सबा हिला देता है
मैं सुनने का आदी नहीं,मगर कानो में
सुर-ताल-नगमा सा कहीं,सुना देता है
हिलती रही दीवार पर,तेरी परछाई
अहसास, अक्स कई तरह,बना देता है
जिस राह पर होती रही मुलाकाते,आज
उस रास्ते पहरा कोई बिठा देता है
गुमनाम से अँधेरे हम निकल भी आये
हालात जीना, हाल हर सिखा देता है
अंजान सा बैठा छिपा हुआ नासूर अब
खुद हरकतों अपनी कभी डरा देता है
मत सोचना, मेरे कदम के नक्शो चलना
जंगल करीब यकबयक पहुचा देता है
है तलब हमको तेरी किया क्या जाए
ये नाव गलत सुराख ही डुबा देता है
मजबूरियां है या समय फरेबी जाने
दीवार साझा बीच में उठा देता है
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग
10.7.17
१८६१८
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