Thursday, 15 September 2022

 १२२ १२२ १२२ १२२

सदी एक लगे है

मुहब्बत  हजारों तल्खियाँ न होती

जमाने में उडती तितलियाँ न होती


नहीं रोकता राह, बादल उजाला

सुबह सुर्ख़ियां में बदलियाँ न होती


इसी घर अहाते में छुप कर रहा है

यहाँ कौधती सी बिजलियाँ न होती


निगाहों समाने  लगे आजकल वो

भुलाना जिसे चाहु खुशियाँ न होती


कमा के रखे माल असबाब सारे

सदी एक लगे है, गिनतियाँ न होती


सुशील यादव दुर्ग


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