१२२ १२२ १२२ १२२
सदी एक लगे है
मुहब्बत हजारों तल्खियाँ न होती
जमाने में उडती तितलियाँ न होती
नहीं रोकता राह, बादल उजाला
सुबह सुर्ख़ियां में बदलियाँ न होती
इसी घर अहाते में छुप कर रहा है
यहाँ कौधती सी बिजलियाँ न होती
निगाहों समाने लगे आजकल वो
भुलाना जिसे चाहु खुशियाँ न होती
कमा के रखे माल असबाब सारे
सदी एक लगे है, गिनतियाँ न होती
सुशील यादव दुर्ग
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