Thursday, 15 September 2022

 

पर जिनके कटे थे

पर जिनके कटे थे ,परिन्दे कहाँ गए
भोले-भाले,सीधे-सादे, बाशिंदे कहाँ गए

जमीन खा गई उसे ,या निगला आसमान
वो निगरानी शुदा थे ,दरिन्दे कहाँ गए

यही है जगह जहाँ ,कल्पना का लोक था
सब मिले सलीके से,घरौंदे कहाँ गए

मजहब की ये जमी ,बारूद और धुँआ
लाशों के सब ढेर में,जिन्दे कहाँ गए

सुकून तेरे होने का, रहता कहीं भीतर
जहाँ सर रखे रोते ,कन्धे  कहाँ गए

सुशील यादव

२ २ १ २   २ २ १ २  २1२
वो कुछ दिनों से ....
वो कुछ दिनों से इधर नहीं बोलता
मुझे चाहता है मगर नहीं बोलता

खोया रहे अपनी धुनों में मगन
उसपे नशा कोई जहर नहीं बोलता

शायद चली तलवार किसी बात पर
अपना कभी ख़ंजर नहीं बोलता

कितनी कवायद की तुझे भूलने
हमसे हमारा जिगर नहीं बोलता

तेरी  महक रहती है फूलो यहाँ
यूँ खिल के तो इतर नहीं बोलता

कुछ समझ में आने लगी बात फिर
तुमसे भले बेहतर नहीं बोलता
सुशील यादव

यही रिश्ता बचा ....
अब यहां ना आशियाँ, परिंदा बचा
बारूद का यार  केवल धुँआ बचा

ले गया छीन कर बस्ती से अमन
खारे आंसूओ, आंगन कुंआ  बचा

सब ना-वाकिफ अपनी सूरत से
किसके पास कहो  आइना बचा

दहशत ,दीवारें , अदावत केवल
दरमियान अपने यही रिश्ता बचा
सुशील यादव

१.एक एकलव्य
##
अँधेरे में मैं अब भी
तीर चला लेता हूँ
और सही मानो तो सही
निशाना लगा लेता हूँ |
तुम्हे जरूरत होगी
या तो मेरे अंगूठे की या
पूरा हाथ मांग लोगे ..?
***
तुम नहीं थे मेरे आदर्श
नहीं झुकाया था सर तुम्हारे आगे
तुमने नहीं दी थी मुझे दिशाएँ
तुम्हारी उंगली थाम के भी एक पग
चला नहीं था मैं...
नहीं किया था अनुशरण
तुम्हारे किसी दिकबोध का
तुम्हारे पग चिन्हों को ढूढते
नहीं गया था दूर अरण्य, दलदल  में
पता नहीं क्यों
बावजूद इसके
तुम्हे लगता रहा
मेरी उपलब्धियों में कहीं न कहीं हो तुम
केवल तुम
**
अपनी इस सोच के दायरे से
जरा भी नहीं डिगते तुम
साधिकार
आ जाते हो
सुबह -शाम  दरवाजे पर
इस तगादे में कि,
तुम्हे काट कर दे दूंगा
मैं
अपना अंगूठा
**
मेरे पिता ,
तुम्हे मालुम है आदमी जब
भूख की
अहम् की
अस्तित्व की
लड़ाई में
जब होता है
उसके सामने बौने हो जाते हैं
सभी किरदार
वे खुद लिख लेता है
अपने भोगे
यथार्थ का इतिहास
उसे याद हो आये
पुराने लनम की कोई बात
खून से लथपथ अंगूठा
अंगूठे के बीच
प्रत्यंचा में अब -तब छूटने को
तीर की नोक पर उसकी
अपनी आजीविका ...
***
सुशील यादव

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