Thursday, 15 September 2022

 आदमियत की पहचान...

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मैं खुद अपने आप का मुखबिर सा हो गया हूँ यायावर हूँ आजकल मुसाफ़िर  सा हो गया हूँ 

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दरख़्त था जो शातिरों को भी छाँव देता रहा

रहमत के नाम से जग - जाहिर सा हो गया हूँ 

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लोग  सभी, वजूद मेरा , नकार के, निकले यहाँ-वहाँ

लगता उनके उसूल से, लगभग, बाहिर सा हो गया हूँ

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कितनी बार, आजमाने की,मुझको हुई कोशिशे

मतलबी दुनियां देख यहाँ, काफ़िर  सा हो गया हूँ

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तुम्हारे हाथ आऊं,कि गैर के हिस्से गिना जाऊं तेरे कुनबे मे लौट कर , वही फिर सा हो गया हूँ

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आदमियत की पहचान,जरा- जरा होने लगी

ठोकर  खा सम्हलने मे अब, माहिर सा हो गया हूँ 

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मैं भी लगा था उस्तादों की कतार मे, उम्मीद से

जीतूंगा जंग मगर, आदमी आखिर सा हो गया हूँ

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यूँ तो ख्याल तेरा दुरुस्त रहता है यार आजकल

शक के दायरे मे मैं ही बस शातिर सा हो गया हूँ

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बंन्द हूँ, बेजान हूँ, अब तक किसी ने सुधारा नहीं  चौराहे पर नगर घड़ी मैं , स्थिर सा हो गया हूँ

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 खजाना ईमान का खोल के कभी देखा भी करो

बेशकीमती हीरा -मोती जवाहिर सा हो गया हूँ

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सुशील यादव दुर्ग

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