आदमियत की पहचान...
XxX
मैं खुद अपने आप का मुखबिर सा हो गया हूँ यायावर हूँ आजकल मुसाफ़िर सा हो गया हूँ
XxX
दरख़्त था जो शातिरों को भी छाँव देता रहा
रहमत के नाम से जग - जाहिर सा हो गया हूँ
XxX
लोग सभी, वजूद मेरा , नकार के, निकले यहाँ-वहाँ
लगता उनके उसूल से, लगभग, बाहिर सा हो गया हूँ
XxX
कितनी बार, आजमाने की,मुझको हुई कोशिशे
मतलबी दुनियां देख यहाँ, काफ़िर सा हो गया हूँ
XxX
तुम्हारे हाथ आऊं,कि गैर के हिस्से गिना जाऊं तेरे कुनबे मे लौट कर , वही फिर सा हो गया हूँ
XxX
आदमियत की पहचान,जरा- जरा होने लगी
ठोकर खा सम्हलने मे अब, माहिर सा हो गया हूँ
XxX
मैं भी लगा था उस्तादों की कतार मे, उम्मीद से
जीतूंगा जंग मगर, आदमी आखिर सा हो गया हूँ
XxX
यूँ तो ख्याल तेरा दुरुस्त रहता है यार आजकल
शक के दायरे मे मैं ही बस शातिर सा हो गया हूँ
XxX
बंन्द हूँ, बेजान हूँ, अब तक किसी ने सुधारा नहीं चौराहे पर नगर घड़ी मैं , स्थिर सा हो गया हूँ
XxX
खजाना ईमान का खोल के कभी देखा भी करो
बेशकीमती हीरा -मोती जवाहिर सा हो गया हूँ
XxX
सुशील यादव दुर्ग
No comments:
Post a Comment