Thursday, 15 September 2022

 

दानी पिता का ऋण
#
दधीचि
की तरह थे ,मेरे पिता !
हम भाइयों ने जब भी मांगा
हमारे हिस्से
की अस्थियां
वे चुपचाप
समय के अंतराल में
एक -एक कर
हम सब को  देते गए,
@
भीतर से खोखला  होते तक
बाटते  रहे उन अस्थियों को
कहते हैं जिनक़ी
मज्जा से समूचे शरीर के तंत्र को
जिन्दा रखने के लिए
बनता है रक्त....
पता नहीं क्यों ?
वे रक्त हीनता के शिकार होने से
रोक न पाते थे खुद को
हम भाइयों के बीच |
@
हमने , उनक़ी दी हुई अस्थियों को
धार करना कभी सीखा नहीं या
आता नहीं था हमें
वज्र बनाने का हुनर....!
@
जीवन की पाठशाला में
हो के एकाग्रचित्त
दुनियावी रण कौशल की
बारीकियां को जानने को
कोशिश नहीं की
पिता के रहते .
@
और उन्ही के रहते
महसूस नहीं हुआ किसी रणकौशल
की बारीकीयों का जानना,
सीखने  की ललक नहीं उपजी
किसी चक्रव्यूह का तोड़...
.....
@
मुश्किल से
अभिमन्यु  क़ी तरह
आता नहीं निकलना
अधूरी जानकारी के अभिशप्त रहे
हम भी पिता !...
@
-हम आपकी दी हुई
अस्थियों की आहुति
आपकी चिता को
साक्षी मान
इस मुक्तिधाम
आज  करने को  हैं
प्रतिबद्ध,....तत्पर
हम जीवन  रण  के
पराजित योद्धा...
@
स्वीकार करते हैं
कि,
हालात से तंग ....
होने के बावजूद
आपने हमारी परवरिश मे
अपने आप को समूचा झोंक दिया
हमारी खातिर
कहाँ कहाँ
कितना नहीं झुके आप ?
@@
ये कम नहीं होगा,
आपको अनंत काल तक
मन मे समाधि बना
हम पूजते रहें
उन अस्थियों के
ऐवज ....?
@@

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