छोड़े हम बैठे होते,,,,,
संभव हमको दिखता सब,आसान अगर हो जाना
छोड़े हम बैठे होते, बेमतलब का हकलाना
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हमको समझे होते,ऊपर से नीचे तक जिस दिन
मुमकिन उस दिन हो जाता,चाहत का और ठिकाना
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बारिश का मौसम भी,केवल खामोशी से आता है
यादों के जंगल भीतर तक, पैरहन भिगा जाना
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लेकर अपनी सूरत रोनी सी कल से बैठे हैं
खुशियों का लगता, इस दीवाली लौट नहीं आना
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सुशील यादव
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