2212 2212 222
बात तल्ख़ सी
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मेरी जुबां जब भी फ़िसल जाती है
कुछ बात तल्ख़ सी बस निकल जाती है
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खामोश हो जीने का मकसद भी क्या
खामोशियाँ गम में बदल जाती है
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बैसाख या आषाड़ सावन भादो
मजबूरियां मौसम निगल जाती है
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उसको तराशे थे हमी जी जान से
हीरे की सूरत अब तो खल जाती है
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लाखों की चाहे हो कमाई दौलत
सरकार की नजर आजकल जाती है
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सुशील यादव
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