122२ 1222 1222
वही बस्ती, वही टूटा खिलौना है
वही अलगू,मिया जुम्मन का रोना है
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बना जाते सलीके से मुझे लायक
ये मिटटी अगरचे ढूढो कि सोना है
कहाँ बनते यहाँ रिश्ते सलीके से
किसे मोती कभी आया पिरोना है
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वफा के बीज डालो ये पता तो चले
खफा मौसम रहा या नसीब बौना है
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उसे पैगाम दे दो, खैरियत है मेरी
मिसाल के तौर सुइयां जिसे चुभोना है
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तरीके से मिला करती खुशी कल तक
अभी उस दौर का ख़्वाब ही सलोना है
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सुशील यादव दुर्ग छत्तीसगढ़
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