समय मिले तो ढूढना .....
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सुख की चादर तान के, सोए रहते आप
समय मिले तो ढूंढना , आस्तीन के सांप
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सभी समझ को भूलकर,बातें रख लो याद
हरा -भरा भी सूखता, बिन मिट्टी बिन खाद
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शनै-शनै छोटा हुआ, संयम का आकार
अब तो केवल क्रोध का, फैला खरपतवार
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छोटा अब लगने लगा, रोटी का अनुपात
आश्वासन की बेड़ियां नियमित शाम-प्रभात
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करते-करते तंग हूं, मैं अपना किरदार
अब तो मेरे हाल पर, मुझको छोडो यार
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गांधी मिलकर गोडसे, पूछते कुशलक्षेम
इसे नोट महिमा कहें, या मानवता प्रेम
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शायद मेरी साधना,निहित कहीं है खोट
हर ऊंचाई नापकर,पाते रहता चोट
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तेरा होना इतर सा ,देता था एहसास
तेरे बगैर यूं लगे, चला गया मधुमास
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कैसे जाने फैलता ,जीवन का आकार
साँसों से होता नहीं ,घड़ियों का व्यापार
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सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग....
आओ देखें चाहत के सपने
तेरे राज में राहत के सपने
कैसे जीते लेकर लोग यहाँ
बद -जुबान आदत के सपने
मुँह मेँ हो केवल राम- विराजे
रखते बगल अदावत के सपने
अपनों ने उन को छोड़ दिया है
लेकर सोच बगावत के सपने
काश कि मैं भीअब देखा करता
गाफ़िल नींद मुहब्बत के सपने
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