Thursday, 15 September 2022

 122 122 122 22


मेरी शक्ल का , आदमी मिल जाए

यूँ पहचान का अजनबी मिल जाए


 उदासी  मे घिर के रहा करती हो

बिखेरो  हँसी जिंदगी मिल जाए


सितम क्या सहे हम निज़ाम मे तेरे

फकत  चाहते सादगी मिल जाए 


उजड़ा चमन था कई दिनों से मेरा

बहारो खिले फूल तितली मिल जाए


अलग सपने दुनिया के होते माना

कभी खास  चाहें वही मिल जाए


 जमाना अभी बन गया दुश्मन सा 

पिघलती रहे बर्फ जमी मिल जाए


सुशील यादव दुर्ग


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