आवत साल के सपना...
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सब झिन रस्ता, अपन रेंग दीन
मोला ,तहीं अगोरे होबे
ए बस्ती ले ओ गांव तक
जरत भोभरा, पीपर छांव तक
आजू- बाजू झांक के सुरता,
आमा पक्का तोड़े होबे
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मड़ई मोला बुलावा भेजे
नेवता घलो पठाये
दाई - भैय्या रोकिन - छेकिन
तैं तुनुक मिजाज रिसाये
रहचूली चक्कर जईसन धुर्रा , गोड़ अंगठा कोड़े होबे
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रतिहा के नींद नंदावत होही
झांके बर संसो आवत होही
बईठे लेवैय्या तोर सुध खातिर
गोड अब्बड खजुवावत होही
अपने मन में हांसत फिक्का
चद्दर लाज के ओढ़े होबे
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पाछु साल के बिच्छल रद्दा
कईसनो करके पार लगायेन
आवत साल के कान म झुमका
पहिनाये सेती परण सजायेन
अपन सपना के चुनरी बर
बड़ चंदा - तारा जोड़े होबे
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सुशील यादव दुर्ग
30दिसम्बर 21
पंथी धुन में...
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घर बार छोड़ के
मोह माया तोड़ के
आगेव मेहा जोड़ी मोर
मन निबुआ निचोड़ के....
राखे रहिबे पिरीत के
धागा ल ग जोड़ के....
धागा ल ग जोड़ के.....
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घर बार छोड़ के
मोह मया तोड़ के
काबर आएस मोर करा
मन निबुआ निचोड़ के
तोर ददा भईया बना दी ही
मोला बिना गोड़ के..
मोला बिना गोड जोड़ी
मोला बिना गोड के
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सुशील यादव
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