Tuesday, 27 September 2022

छोड़े हम बैठे hote

 

छोड़े हम बैठे होते,,,,,
संभव हमको दिखता सब,आसान अगर हो जाना
छोड़े हम बैठे होते, बेमतलब  का हकलाना
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हमको समझे होते,ऊपर से नीचे तक जिस दिन
मुमकिन उस दिन हो जाता,चाहत का और ठिकाना
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बारिश का मौसम भी,आता है केवल खामोशी से
यादों के जंगल भीतर फिर ,  पैरहन भिगा जाना
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लेकर अपनी सूरत रोनी सी, बैठे हैं कल से
खुशियों का लगता, इस दीवाली लौट नहीं आना
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सुशील यादव
2122  2122 212
कातिलो के चेहरे ....
खून के छींटे पड़े ,पत्थर  में अब
कातिलो के चेहरे हैं खबर में अब
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कठिन था वो दौर जुल्मो-सितम का
फैलती अफवाह ये  बंजर में अब
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कल  लुटेरा बन के लूटा गजनवी
तुमने पहचाना उसे रहबर में अब
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याद हमको हैं खरोचें भी जरा
लोग रहते आग-झुलसे शहर में अब
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फैसलों की ये घड़ी शायद  नहीं
जीत कर जीते जी क्यूँ कबर में अब
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मेरी पेशानी में है यायावरी
कुछ नफा दिखने लगा दरबदर में अब
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सुशील यादव

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