छोड़े हम बैठे होते,,,,,
संभव हमको दिखता सब,आसान अगर हो जाना
छोड़े हम बैठे होते, बेमतलब का हकलाना
#
हमको समझे होते,ऊपर से नीचे तक जिस दिन
मुमकिन उस दिन हो जाता,चाहत का और ठिकाना
#
बारिश का मौसम भी,आता है केवल खामोशी से
यादों के जंगल भीतर फिर , पैरहन भिगा जाना
#
लेकर अपनी सूरत रोनी सी, बैठे हैं कल से
खुशियों का लगता, इस दीवाली लौट नहीं आना
#
सुशील यादव
2122 2122 212
कातिलो के चेहरे ....
खून के छींटे पड़े ,पत्थर में अब
कातिलो के चेहरे हैं खबर में अब
##
कठिन था वो दौर जुल्मो-सितम का
फैलती अफवाह ये बंजर में अब
##
कल लुटेरा बन के लूटा गजनवी
तुमने पहचाना उसे रहबर में अब
##
याद हमको हैं खरोचें भी जरा
लोग रहते आग-झुलसे शहर में अब
###
फैसलों की ये घड़ी शायद नहीं
जीत कर जीते जी क्यूँ कबर में अब
##
मेरी पेशानी में है यायावरी
कुछ नफा दिखने लगा दरबदर में अब
##
सुशील यादव
No comments:
Post a Comment