हमारे शब्द......
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ना जाने
किन पैरों पर
खड़ा रहता है आसमान
दिन -रात बिना थके हुए
?
मेरे - तुम्हारे शब्दों को
बैसाखी की होती है जरूरत
.....,
हम, यहाँ -वहाँ,
अनाप -शनाप
बेहूदगी मेँ बोलते हैं,
या कहो...
सहानुभूति की किताब
उस जगह से खोलते है
जहाँ पृष्ठ भर
हासिये क़े सिवा
होता नहीं कुछ.....
@
हमी,जिद्दी, सिऱ- फिरे
इन हाशियों मेँ भी
तलाशते हैं
क़ोई ईश वंदना
किसी बुद्ध की सोच....
जैसे,
न जाने किन पैरों पर
खड़ा रहता है आसमान...?
काश....!
हमें
बता दिया गया होता
आसमान कुछ नहीँ
एक हवा है-
धुआँ है-
शून्य है....
और हवा को
धुँआ को
शून्य को
क़ोई बैसाखी
चाहिए भी नहीँ होती?
वैसे ही वो
अपने शाश्वत सत्य पर
टिका रहता है
दिन -रात बिना थके हुए.....
काश हमारे शब्द
हवा की तरह
धुँआ की तरह
शून्य की तरह
होते...
अपने मूल्य पर
टिके रहने को
जरूरत नहीँ होती उनको,
बाजार मेँ बिकने वाली
बैसखियों की.......
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सुशील यादव
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