Thursday, 15 September 2022

इस जंगल मैं

 इस जंगल में आग न लगती

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ये दिन काश हमारे होते

हम आंखों के तारे होते


दूर न होती मंजिल अपनी

पास कहीं दिल हारे होते


बचपन जाओ ढूंढ के लाओ

अक्ल के दुश्मन सारे होते


अधिकार बिना अब क्या जीना

छीन झपट के चारे होते


तुम भी अफसोस किया करती

दांव लगा जब हारे होते


हमको डूबना आ ही जाता

यदि मालूम  किनारे होते


निकले थे घर छांव छोड़कर

ऐसे ही बंजारे होते


खुली किताब समझ के पढना मन 

चाहे वारे न्यारे होते 


इस जंगल में आग न लगती

कुछ दिन और गुजारे होते


खौफ जदा पेशानी में भी

मानिंद बर्फ   नजारे होते


हमको लगता तेरी खातिर

हम नजदीक सहारे होते


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