1222 1222 1222 22
गज़ल
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जमीनों में छिपा रक्खा खजाना मिल जाए
जुदा बरसों कोई साथी पुराना मिल जाए
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हमें ख़त क़े नहीं मिलते पढ़े होने का सबूत
फकत मजनून भाँपे हों,हर्जाना मिल जाए
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नहीं मिलते कभी शहरों सहज रिश्ते जन्मों क़े
बनावट क़े विज्ञापन कुछ बहाना मिल जाए
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गली में जो गुजरती शाम क्या कहने उनके
मेरी तकदीर मौसम वो सुहाना मिल जाए
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मुकम्मल ही नहीं खाना -बदोशी क्या कीजे
खुदा की बारहा रहमत ठिकाना मिल जाए
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग छत्तीसगढ़
7. 6.22
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