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चेहरे क्यों हैं मलीन,.....
जिन्दगी को आदमी, आम की, नजर देखो
रख कभी सीने , वजन कोई , पत्थर देखो
डूबने लग जाए, स्वयं ही वजूद कभी
लहर उठती,रह किनारे, समुंदर देखो
आग नफरत की लगाकर, जो छिपा करते
उतरता 'खूनी' वहां कब , खंजर देखो
जो हमे बेख़ौफ़ मिलते, हर-कहीं हरदम
चेहरे क्यों हैं मलीन, आँखे भी अन्दर देखो
एक तमाशा सा, हुआ तेरे शह्र में कल भी
आज की, ताजी फिजा क्या है ,खबर देखो
@@@१८.१२.१५ ....सुशील यादव ..
१२२ १२२ १२२ १२२
कभी नीद तो कभी ख़्वाब छिनता है
वो खिलने से पहले गुलाब छिनता है
मेरी उतरन कभी पहनता रहा जो
वही मुझसे मेरा नकाब छिनता है
कहाँ क्या बुरा जो मेरे नाम जुड़ता
जमाना मुझी से खिताब छिनता है
अगर तू कहे आसमा ला के दे दूँ
हथेली कोई आफताब छिनता है
बुझे लोग, बदहाल बस्ती बीच लगता
यहाँ याद का हर हिजाब छिनता है
सुशील यादव
समझौते की कुछ सूरत देखो
सुशील यादव
222222222
समझौते की कुछ सूरत देखो
है किसको कितनी ज़रूरत देखो
ढेर लगे हैं आवेदन के अब
लोगों की अहम शिकायत देखो
लूटा करते, वोट गरीबों के
जाकर कुनबों की हालत देखो
भूखों मरते कल लोग मिलेंगे
रोटी होती क्या हसरत देखो
फैला दो उजियारा चार तरफ़
एक दिए की कितनी ताक़त देखो
साहित्य शिल्पी में
शब्द ....
जाने किन पैरों पर
खड़ा रहता है
आसमान
दिन रात
बिना थके हुए ....?
मेरे
तुम्हारे
शब्दों को अब
बैसाखी की
जरूरत
महसूस होती है ...
हम आहत-
अपाहिज मन से
बोलते हैं या
सहानुभूतियों की किताब
उस जगह से खोलते हैं
जहां पृष्ठ भर
हाशिये के सिवा
होता नहीं कुछ
#
हम सिद्धार्थ की तरह
खोजने
निकल पड़ते हैं
यथार्थ ...
मगर हमारा
'यक्ष -प्रश्न'
हमे
घेरता है
बरबस
हम आकाश की बैसाखी
उसके पांव
उसकी जमीन को
तलाशने में जुट जाते हैं,
न जाने किन पैरों पर खड़ा रहता है
आसमान ...?
#
काश ,
हमे पहले
बता दिया गया होता
आसमान कुछ नहीं
एक हवा है
धुँआ है
शून्य है
और
हवा को
धुँआ को
शून्य को
बैसाखी की जरूरत नहीं होती
वह अपने
शास्वत वजूद पर
स्वयं चलता है
दिन -रात बिना थके हुए
#
काश हमारे शब्द
यूँ ही
हवा की तरह
धुँआ की तरह
शून्य की तरह
बिना पैरों
चलते
तैरते
अनवरत
लगातार
संप्रेषित होते
बिना किसी बैसाखी के
सुशील यादव दुर्ग
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