Thursday, 15 September 2022

गीत

 

गीत
उम्र क़े इस पड़ाव में.....
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दर्द जहाँ मैं टांगा करता, टूटी आज वो खूंटी लगती
सारे संबल सभी आसरे,बिना असर की बूटी लगती
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लेकर चलना उसी गली में,यादों का भरता हो मेला
बचपन खेल घरोंदे वाले,नाव डूबता रहूँ अकेला
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अब उम्र क़े इस पड़ाव में, कितनी बातें छूटी  लगती
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अरमानों जब पँख नहीं थे, आकाश लगा करता छोटा
उड़ने की जब ताकत आई,व्यवधानो ने अक्सर टोका
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शेष नहीं कुछ कहने जैसा,गुम नगीना  अंगूठी लगती
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इन बाजुओं का दम है,पहले जैसा आज भी क़ायम
आज भी  मिलने की चाहत,रत्ती भर उत्साह नहीं कम
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चाहत की अब दुनियां तुझ बिन खाली - खाली झूठी लगती
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उमंग उजालों की सजती,सदा रहे पहचान दिवाली
मुस्कान बांटते जाना यूँ,तमाशबीन  बजा दे ताली
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मंहगाई की हाथ थमी हो ,विपदा की लो सूटी लगती
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सुशील यादव

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