Thursday, 15 September 2022

 नज्म : :हर्फ -हर्फ फूल 


अब तो वो कतरा  के निकल जाता है

जाने क्यूँ खुद शरमा के निकल जाता है


अब काटता  चक्कर  नहीं कहीं गली के

अगर मिले नजर चुरा के निकल जाता है


उसकी हालत पे मै तरस खाऊं या वो 

लम्हा लम्हा  सता के निकल जाता है


काटने दौड़ती है रात अजीब तन्हाइयाँ 

जो सिल्वट बिछा के निकल जाता है


मुझे मालुम है अपनी खता खामियाँ

यादें यूँ जंगल ऊगा के निकल जाता है


किताब मे नजर गड़ाऊं भी  मैं कहाँ

हर्फ हर्फ फूल दबा के निकल जाता है


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