Tuesday, 27 September 2022

समय मिले तो

 

समय मिले तो ढूढना .....
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सुख की चादर तान के, सोए रहते आप
समय मिले तो ढूंढना , आस्तीन के सांप
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सभी समझ को भूलकर,बातें रख लो  याद
हरा -भरा भी सूखता, बिन मिट्टी बिन खाद
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शनै-शनै छोटा  हुआ, संयम का आकार
अब तो केवल क्रोध का, फैला खरपतवार
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छोटा अब लगने लगा, रोटी का अनुपात
आश्वासन की बेड़ियां नियमित शाम-प्रभात
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करते-करते तंग हूं, मैं अपना किरदार
अब तो मेरे हाल पर, मुझको छोडो यार
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गांधी मिलकर गोडसे, पूछते कुशलक्षेम
इसे नोट महिमा कहें, या मानवता प्रेम
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शायद मेरी साधना,निहित कहीं है खोट
हर ऊंचाई नापकर,पाते रहता चोट
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तेरा होना इतर सा ,देता था एहसास
तेरे बगैर यूं लगे, चला गया मधुमास
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कैसे जाने  फैलता  ,जीवन का आकार
साँसों से होता नहीं ,घड़ियों का व्यापार
सुशील यादव

2212   2212    1222  2
अहसास ....!

है कौन,जो तन्हाई को सदा देता है
मुझको कभी,बन के सबा हिला देता है

मैं सुनने का आदी नहीं,मगर कानो में
सुर-ताल-नगमा सा कहीं,सुना देता है

हिलती रही दीवार पर,तेरी परछाई
अहसास, अक्स कई तरह,बना देता है

जिस राह पर होती रही मुलाकाते,आज
उस रास्ते पहरा कोई बिठा देता है

गुमनाम से अँधेरे हम निकल भी आये
हालात जीना, हाल हर सीखा देता है

अंजान सा बैठा छिपा हुआ नासूर अब
खुद हरकतों अपनी कभी डरा देता है

मत सोचना, मेरे कदम के नक्शो चलना
जंगल करीब  यकबयक  पहुचा देता  है

है तलब हमको तेरी  किया क्या जाए
ये नाव गलत सुराख  ही डुबा  देता है

मजबूरियां है या समय फरेबी  जाने
दीवार साझा बीच में उठा देता है

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग
10.7.17
लोग  सम्हलने नहीं देते
1222 1222     1222     1222
हमारी नजर में लोग हमे
सम्हलने नहीं देते
यहां माकूल सा माहौल तो
बदलने नहीं देते

न जाने लौट आता सोच क्या,
दिल का बसन्त यहाँ
तेरी रहगुजर होकर, कुछ हैं ,
बस  निकलने नहीं देते

न कायदा है न कानूनी फिकर
देखो जिसे आजकल
हुकूमत के उसूलो से हमे
बाख़बर हो चलने नहीं देते

तलब होती, तेरे दीदार की
मायूसियों में जब
बचा के नजर सैलाब आंख में
उतरने नहीं देते

सुशील यादव

आदमियत की पहचान...
XxX
मैं खुद अपने आप का मुखबिर सा हो गया हूँ यायावर हूँ आजकल मुसाफ़िर  सा हो गया हूँ
XxX
दरख़्त था जो शातिरों को भी छाँव देता रहा
रहमत के नाम से जग - जाहिर सा हो गया हूँ
XxX
लोग  सभी, वजूद मेरा , नकार के, निकले यहाँ-वहाँ
लगता उनके उसूल से, लगभग, बाहिर सा हो गया हूँ
XxX
कितनी बार, आजमाने की,मुझको हुई कोशिशे
मतलबी दुनियां देख यहाँ, काफ़िर  सा हो गया हूँ
XxX
तुम्हारे हाथ आऊं,कि गैर के हिस्से गिना जाऊं तेरे कुनबे मे लौट कर , वही फिर सा हो गया हूँ
XxX
आदमियत की पहचान,जरा- जरा होने लगी
ठोकर  खा सम्हलने मे अब, माहिर सा हो गया हूँ
XxX
मैं भी लगा था उस्तादों की कतार मे, उम्मीद से
जीतूंगा जंग मगर, आदमी आखिर सा हो गया हूँ
XxX
यूँ तो ख्याल तेरा दुरुस्त रहता है यार आजकल
शक के दायरे मे मैं ही बस शातिर सा हो गया हूँ
XxX
बंन्द हूँ, बेजान हूँ, अब तक किसी ने सुधारा नहीं  चौराहे पर नगर घड़ी मैं , स्थिर सा हो गया हूँ
XxX
खजाना ईमान का अकेले मे कल खोल के देखा
बेशकीमती हीरा -मोती जवाहिर सा हो गया हूँ
XxX

सुशील यादव दुर्ग

जिसे सिखलाया बोलना…..2122 १२२२ 2212

चश्म नम और दामन तर होने लगा
जिन्दगी सादगी से बसर होने लगा

जो निचोड़ के रखा है अपना आस्तीन
अब पसीने से नम कालर होने लगा

दाउदों के पते पूछो तो हम कहें
पाक-दोहा कभी तो कतर होने लगा

बाज आऊं बुरी हरकत से मै कभी
मय नशी में इधर-ऊधर होने लगा

अब मेरी मंजिलो के मिलते हैं निशान
पांव के छालो का असर होने लगा

बेजुबां बुत जिसे सिखलाया बोलना
पलटते ही मेरे पत्थर होने लगा
सुशील यादव

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