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तमाचा वक़्त का...
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किताबों में कहां अब फूल मिलता है
बचे लोगों ले दे क़े उसूल मिलता है
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सभी पाशे चले शकुनी की अब चालें
जिसे मौका सही अनुकूल मिलता है
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विरासत को बचाने की कवायद हो
वगरना मशवरा उल जुलुल मिलता है
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नहीँ है कायदे से कोइ रखवाला
सियासत सादगी अब धूल मिलता है
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क़ोई कांटे बिछा क़े जब चला जाता
तमाचा वक़्त का माकूल मिलता है
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सुशील यादव
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