Friday, 12 May 2023

 

छोटी उम्र में बड़ा तजुर्बा.....

सुशील यादव(अंक: 205, मई द्वितीय, 2022 में प्रकाशित)

2221   2221  2221  212

 
जाकर दूर, वापस लौटना, अच्छा नहीं लगा
रिश्तों को, अचानक तोड़ना, अच्छा नहीं लगा
 
मातम भी जताने लोग अब इस तरह आ रहे
रस्मों को तराजू-तौलना अच्छा नहीं लगा
 
क़ाबिल हो अभी माफ़ी के दीगर बात साहबान
गिरना आसमां तेरा कभी  अच्छा नहीं लगा
 
तुम सम्हाल लो  सल्तनत ये बेख़ौफ़ आजकल
कल तो और का है बोलना, अच्छा नहीं लगा
 
ग़म के दौर में कब चलन से बाहर हुआ 'सुशील'
खोटा सिक्का बन के पिघलना अच्छा नहीं लगा
 
लाखों तक रटी गिनती, करोड़ कभी सुने कहाँ
छोटी उम्र में बड़ा तजुर्बा, अच्छा नहीं लगा
 
अपनी हैसियत अनुसार हम रहते यहाँ कहाँ
मन का ठोकरों से बहलना अच्छा  नहीं लगा

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