Saturday, 13 May 2023

 

क़ौम की हवा

सुशील यादव(अंक: 175, फरवरी द्वितीय, 2021 में प्रकाशित)

शिकायत थी ख़राश की, हार ले के  आ गए
तुम आंदोलन की हवा बुखार ले के आ गए
 
काट कर नहीं ला सकते अब की जो  फ़सल
तुम मुट्ठियों में अब की  ज्वार ले के आ गए
 
सहमत नहीं होते तो ना सही मगर क्या
ज़रूरी थी अपनी धुन सितार ले के आ गए
 
सियासत की नासमझी क़तार में खड़ी
तुम ट्रेक्टर को समझ तलवार ले के आ गए
 
वादों से मुकरने का यहाँ जोश लबालब 
इन्हीं के सामने इल्तिजा गुहार ले के आ गए

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