क़ौम की हवा
सुशील यादव(अंक: 175, फरवरी
द्वितीय, 2021 में प्रकाशित)
शिकायत थी ख़राश की, हार ले के आ गए
तुम
आंदोलन की हवा बुखार ले के आ गए
काट कर
नहीं ला सकते अब की जो फ़सल
तुम
मुट्ठियों में अब की ज्वार ले के आ गए
सहमत
नहीं होते तो ना सही मगर क्या
ज़रूरी थी
अपनी धुन सितार ले के आ गए
सियासत
की नासमझी क़तार में खड़ी
तुम
ट्रेक्टर को समझ तलवार ले के आ गए
वादों से
मुकरने का यहाँ जोश लबालब
इन्हीं
के सामने इल्तिजा गुहार ले के आ गए
No comments:
Post a Comment