दायरे शक के रहा बस आइना इन
दिनों
सुशील यादव(अंक: 211, अगस्त द्वितीय, 2022 में प्रकाशित)
2122 2122 2122 12
दायरे शक
के रहा बस आइना इन दिनों
टूट के
बिखरा हुआ है चेहरा इन दिनों
गिनतियों
अच्छे उसूल मिले मुझे बारहा
यों बुरी
संगत हुआ है ये बुरा इन दिनों
टहलने से
फूलती है अब ज़रा साँस भी
बंद मीलों
चलन की है परंपरा इन दिनों
कोशिशें
की ठहरे पानी देख लूँ मैं तुझे
अक्स तेरा
कुछ बना बहुत गहरा इन दिनों
हैं नदारद
वे हिरण आस्था के मेरे कहीं
बेज़ुबां
वो ख़ौफ़ की साज़िश मरा इन दिनों
हम रगों
में हाथ दुखती क्या तेरे रख दिए
हो गया
फिर क्या पुराना घाव हरा इन दिनों
तू बहुत
चुप सा अकेला है 'सुशील' आज कल
बात क्या
है बोल किससे तू डरा इन दिनों
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