इश्तिहार निकाले नहीं
२१२ २१२ २१२ २१२
ज़र्द से
ख़त किताब में सम्हाले नहीं
ता-उम्र
परिंदे यूँ ही पाले नहीं
याद में
वो बसा, चार दिन
के लिए
ता कयामत
चले, शक़्ल ढाले
नहीं
हो कहाँ
जिरह, या बहस
किससे करें
कोशिशें -
बंदिशें, कल पे
टाले नहीं
जिस्म का
ज़ख़्म, पेश्तर कि
भरा करे
इश्तिहार
अख़बार में, निकाले
नहीं
जिगर से
खूं यहाँ, बेसबब रिस
रहा
कहने को
उधर पाँवों में, छाले नहीं
हम जियें
या मरे, गरज़ किसको
'सुशील'
क़िस्मत
किया, किसी के
हवाले नहीं
हो के
हैरान सा अब ज़माना दिखा
सादग़ी, बेड़ियाँ पाँव डाले नहीं
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