रोने की हर
बात पे
रोने की हर बात पे कहकहा लगाते
हो
ज़ख़्मों
पर जलता, क्यूँ
फाहा लगाते हो
गिर न
जाए आकाश, से लौट
के पत्थर
अपने
मक़सद का, निशाना
लगाते हो
हाथों
हाथ बेचा करो, ईमान-धरम
तुम
सड़कों पे
नुमाइश, तमाशा
लगाते हो
फूलो से
रंज तुम्हें, ख़ुशबू से
परहेज़
बोलो किन
यादों फिर, बग़ीचा
लगाते हो
छन के
आती रौशनी, बस उन
झरोखों से
संयम
सुशील मन, से शीशा
लगाते हो
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