मेरे क़द से . . .
सुशील यादव(अंक: 210, अगस्त प्रथम, 2022 में प्रकाशित)
सोने जैसा
जो खरा लगे है
मन ही मन
वो भी डरा लगे है
फीकी
मुस्कानों स्वागत करता
पगला वैसे
अब ज़रा लगे है
हँसते हम
जिन बातों को लेकर
ग़मज़दा
कहीं मसखरा लगे है
ख़ौफ़नाक
आगे मंज़र सारे
हद है
तुम्हें हरा हरा लगे है
मेरी सलाह
आप ज़रा मानो
दुश्मन
हथियारों भरा लगे है
नाप रहा
है जो गर्दन सब की
कट्टर
पंथी माज़रा लगे है
हिम्मत
सदियों हम खोए बैठे
तेरा होना
आसरा लगे है
मेरे क़द
से तुलना कर देखो
मंज़र अब गया
गुज़रा लगे है
लाशों की
ढेर बिछाने वाला
किसी
बददुवा से मरा लगे है
हुज़ूर सदी
का कौन मसीहा
रिश्ता
तुझी से गहरा लगे है
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