Friday, 12 May 2023

 

किन सरों में है . . .

सुशील यादव(अंक: 197, जनवरी द्वितीय, 2022 में प्रकाशित)

 2122        2121        2122
 
इस शहर का मैं मिजाज़ जानता हूँ
किन सरो में है ख़िज़ाब जानता हूँ
 
नासमझ हूँ मिसाल देना न मेरी
कौन पुर्जा क्यूँ ख़राब जानता हूँ
 
बदल दूँ मैं जहाँ कहो आदमी को
कोल्हू की नस्ल रकाब जानता हूँ
 
मैं न जानू सियासती दाँवपेच पर
मैं चुनावी हर किताब जानता हूँ
 
हूँ यहाँ मैं बिना रहम करम तेरे
सर सजेगा कभी ख़िताब जानता हूँ
 
चेहरा लाख छिप जाय कई तहों में
कब कहाँ आए नक़ाब जानता हूँ 
 
साल बीता बड़ी मुश्किलों से पीछे
हर किसी का उफ़ जवाब जानता हूँ


 

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