Saturday, 13 May 2023

 

FacebookTwitterMoreये ज़ख़्म मेरा

सुशील यादव

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ये ज़ख़्म मेरा, भरने लगा है
शहर इस नाम से, डरने लगा है

विष के प्याले, हाथों नहीं थे
'
नस' ज़हर कैसे, उतरने लगा है

हाथ किस के आया, बीता जमाना
'
पर' समय कौन, कुतरने लगा है

भूल रहने की, टूटी कवायद
रह-रह के अक़्स उभरने लगा है

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