Tuesday, 13 November 2018

रहनुमा सा जान उसको ....



है जमाने में वही बस  तमीज वाला
पहन भगवा राह चलता  कमीज वाला

रहनुमा सा जान उसको बिठा करीब
वगरना लोगो सहेजो अपना  निवाला

कब यहाँ से उखड़ जायें तमाम पत्थर
सोच का निकल जाए, कहाँ दिवाला

बून्द भर की प्यास अपनी किसे बताये
वो  नदी के सूखने, जो सजाते प्याला

चुप रहें, तो कौन फरियाद को सुने है
पाँव में जंजीर, मुह को लगा है ताला

हम मनाएं! ढूढ उसको, चलो निकालें
ठौर बदला,राह भटका नहीं उजाला

सुशील यादव

जेखर ये संसार में, लबरा हवे मितान
ठलहा मन के गोठ में,झन फूको जी प्रान
##
उजड़ चुका है बाढ़ में ,संयम का अब खेत
फसलो की मोती कहाँ ,दूर-दूर तक रेत

किस्से और कहानियां ,सब थी कल की बात
आज समय की मार है ,घूसा  लाठी लात

मुझे चाहता है मगर, नहीं बोलता यार
दो-दिन की बस दोस्ती,चार दिनों तकरार

अच्छे दिन के फेर में,किसको चुनते  आप
वजन बराबर तौल कर ,कद को फिर से नाप


झट से चढ़ जा सीढियां ,इस पीढ़ी की मांग
कोई कल को तोड़ दे ,भीम गदा से जांघ

हम पर ये किसने किया ,ऐसा वज्र-प्रहार
आज-अभी से ढूंढ़ लें ,कल का तारणहार


बाहर बैठे लोग हैं ,ज्ञान चक्षु को खोल
अगर चढा कोई नशा,चाणक्य बन के बोल


मोह गया-ममता गई ,राह-चाह  की सून
सर में गोली मार के  ,टेंशन फ्री कानून

पथ दिखलाता था कभी ,पथ से भटका आज
सबको  जिसपे  नाज था ,उतरा वो ही  ताज

कितनी हुई कवायदें ,  तुझको जाएँ  भूल
पर तेरी नादानियाँ , फिर करती मशगूल


तेरी मेरी नादानियां,अतीत समय की बात
दिशा- ध्रुव से ज्ञात है,तारा चमक प्रभात

मन के द्वार विराजिए , नटखट-मोहन- श्याम
धुला-ह्रदय मैं खोलता ,सुबह-दोपहर-शाम

सूने घर जैसे बुने , मकड़ी अपना जाल
वैसे ही प्रभु नाम का,आता रहे ख्याल


बाहर बैठे लोग हैं ,ज्ञान चक्षु को खोल
अगर चढा कोई नशा,राजनीति में बोल


शायद मेरी साधना,निहित कहीं है खोट
हर ऊंचाई नाप कर,मैं पाता हूँ चोट

आज सभी ने खा लिया , पेट-भरा दो जून
कल की केवल राम पर , कैसा हो कानून

अब तो मेरे हाल पर, मुझको छोडो यार
करते-करते  तंग हूँ ,अपना ही किरदार
सुशील यादव दुर्ग

४जून १८

मेरे कद से नाप ले,कद यूँ कभी- कभार
कुर्ता उजला साफ हो,नीयत हो  चमकार
जून 7

छल प्रपंच की बाढ़ में ,मेरी डूबी नाव
एक मिले प्रभु आसरा,शायद होय बचाव
९ सितंबर१८
छल प्रपंच की बाढ़ में ,मेरी डूबी नाव
एक मिले प्रभु आसरा,शायद होय बचाव
सुशील यादव

कुलटा थी संभावना , दिखा गई दर्पण
मै अज्ञानता कर गया ,क्या-क्या उसे अर्पण

अब के बिछुड़े जो मिलें ,ऐसा हो सदभाव
खिंचे -खिंचे से ना रहें ,मन से लगे खिंचाव

होती दुर्गति दूर से ,पास रहो तो  प्यार
जग वाले सब जानते ,मोह नाम संसार
सुशील यादव

बरसो से करते रहे  ,पत्थर फ़ेंक प्रहार
मानवता का नाम ले ,फेंक फूल का हार
९ सितंबर१८


सुने घर में बुन रहा,मकड़ी जैसा जाल
एक तुम्हारी याद ने , जीना किया मुहाल

कोई उस घर में नहीं,है सादगी  सबूत
वर्तमान केवल वहां ,नाच रहा बन भूत


बनना प्रभु का धाम भी ,कैसे बने विवाद
आधार-शिला में रखो ,समझौता बुनियाद

एक तुम्हारी सादगी ,दूजा व्यापक प्यार
उनतालिसवां है बरस,फूले-फले दयार

जी चाहा वैसा मिला,अतीव अतल अथाह
प्रेम भरी थी सादगी, अनुपम था उत्साह


किस दधीचि से मांगना , वज्र बनाने हाड
खतरे में आ बैठ लो,हिला हुआ है झाड़

कौन दधीची दे भला , वज्र बनाने हाड
खतरे में आ बैठ लो,हिला हुआ है झाड़


वर्षगाँठ का आज है ,उनतालिसवां साल
बीते सुख-दुःख साथ में ,प्रभु  रखना  खुशहाल
सुशील यादव

मन में हो गर आस्था ,ह्रदय विराजे प्रेम
वहां कभी क्या पूछना ,कुशल-मंगलम क्षेम

ह्रदय द्वार को खोलिये , करना हो व्यापार
अंधविश्वास  'सेल' में  ,लूटो अपरंपार
  सुशील यादव

मन्दिर बनवा राम का ,ह्रदय बसा लो राम
एक तीर  से हो सके ,शायद दो-दो काम



दो आगे दो को मिला ,हो जाए जब चार
समझौतों का तब दिखे ,होना बेडा पार
सुशील यादव

जी को अपने खोल कर ,दिखलाओ जी आज
दिखे योजना कागजी ,बन्दर बाँट समाज
सुशील यादव

लेना प्रभु का नाम भी ,जी का है जंजाल
हमें  वहीं पे छोड़ दो,होता जहां बवाल



  मंसूबा दिल से बता ,होता  कहाँ  सटीक
  कल भी तू बीमार था ,आज लगे  बस ठीक


कैसे कह दें हम  तुम्हे ,मर्यादा के राम
गिनती के दो-चार तो ,गिनवा दो बस काम


घर से मर्यादा गई ,मन से गया विवेक
आगे मस्तक क्या धरें ,कौन करे अभिषेक

मन  की अंतर्वेदना ,तन में करे खिंचाव
उलझे तनाव  दायरे , कैसे करें बचाव



मत जाओ तुम लांध कर ,गृह-मर्यादा आज
दिशा-हीन हर चाह को ,दण्डित करेसमाज


राजनीति में पालते ,भ्रष्टाचार-रखैल
सबकी माया  एक है,पैसा- पैसा खेल
सुशील यादव दुर्ग

दांत दर्द ..
दन्त कथा ..

दांती वज्र  प्रहार शनि,कैसे करे उपाय
इसी कृपा बूते कभी ,लाखों को निपटाय
##
आज कहूँ फिर से सुनो,कोई साधु न सिद्ध
आसमान से ताकता , सांप-छछुंदर गिद्ध
##
तन से मर्यादा गई ,मन से गया विवेक
आगे मस्तक क्या धरें ,कौन करे अभिषेक
##
सुशील यादव दुर्ग

 २३ जून १८


२३.६.१८



पाप  मुक्त सबको करे ,तेरा यह भगवान
उसके बाद मुझे  कहे ,आका कोई काम
सुशील यादव दुर्ग ,२ जून १८

शायद मेरी साधना, निहित कही पर खोट
हर ऊंचाई नाप कर,पाता रहता चोट
सुशील यादव दुर्ग, ३ जून १८


अब तो मेरे हाल पर ,मुझको छोडो आप
जो मुड़ कर देखा नहीं,मेरा रुदन विलाप
सुशील यादव दुर्ग, ३ जून १८

खूंटे पर ज्यों बांध दे ,निरीह कोई बैल
रुकती साँसे देखती ,जीवन उतरन मैल

परम सत्य आकाश है ,झूठ मोह पाताल
नया बसेरा  खोज तू,अपना आज सँभाल

क्यों कर अब तू पालता,परहित व्यापक मोह
अंत-शरण में दीखते ,केवल खाई-खोह

कभी  परों  को खोल दो, देखो सहज उड़ान
स्थापित करती बेटियां, आसमान  पहचान

नेकी के अब दिन लदे ,सेवा है बेकार
नाम कमा के क्या मिले ,ले जाए सरकार

मन की हर अवहेलना,दूर करो जी टीस
व्यवहारिकता जो बने ,ले लो हमसे फीस
सुशील यादव



तेरा दिल बस छोड़ के ,बाकी सब बकवास
तुझको केवल देख के ,आनन रहे उजास
सुशील यादव

साल नया स्वागत करो ,हो व्यापक दृष्टिकोण
अंगूठा छीने फिर  नहीं ,एकलव्य से  द्रोण
सुशील यादव

ध्वनि की आहट में सहज,मारा करता तीर
प्रतिमा केवल पूज के ,एकलव्य  गंभीर
सुशील यादव ,दुर्ग

भारी जैसे हो गए,नये साल के पांव
खाली सा लगने लगा,यही अनमना गांव
सुशील यादव

ना राहत  की योजना ,ना विकास के पाँव
जिसको पूछे वो कहे ,छुआ तरक्की  गांव

सुख के पत्तल चांट के ,गया पुराना साल
दोना भर के आस दे , बदला लिया निकाल
 
कलेंडर सब उतार दो ,गया पुराना साल
नये साल की  स्वागते,रंग नई दीवाल
सुशील यादव


तेरे पास अकल नहीं ,ले ले ज़रा उधार

तुझसे रिश्ता यूँ लगे ,कोई कर्ज उधार
पीसा की जमीन खड़ी, झुकती सी मीनार

बीते साल यही  कसक,हुए रहे भयभीत
कोसो दूर हमसे रहे ,सपने औ मनमीत

नवा साल उतरे मुड़ी ,जाबे काखर गांव |
साधन तोर घटे हवे ,काला खात-बचांव ||

सुरतावत बनते  बने,अइसन पाछू साल
अतका खिलिस कमल इहां,गाले गाल गुलाल
सुशील यादव दुर्ग



अंगद के जैसा जमे,उखड़े कहीं न पाँव
लूटे सौ-सौ गजनवी,उजड़ न पाए गाँव `

टोपी आम आदमी की

टोपी आम आदमी की… – सुशील यादव

टोपी के बारे में मेरी बचपन से कई अच्छी धारणायें थी|
गांधी जी के अनुमार्गी होने की वजह से, मेरे पिता के पहनावे में ये,जवाहर कोट के साथ शामिल जो था|
वे जब भी घर लौटते, हम भाई –बहनों में टोपी लेने की जंग छिड़ जाती|
भले ही मिनटों –सेकण्डो कि लिए सही, टोपी जो हाथ लगती, मन खिल उठता|
माँ टोपी के गंदे हो जाने के भय से ,जतन से उसे खूंटी पर टांग देती|
हम बापू की टोपी को , गांधी-बाबा के  फेम के बगल में , टंग जाने के बाद अपने –अपने खेल में खो जाते|

टोपी में जाने क्या-क्या संस्कार थे,बरसों हम उन संस्कारों से बंधे रहे|
हमारी शालीनता शादी होने के बाद, पत्नी के तानों से, ज़रा छिन्न-भिन्न हुई| लोग टी व्ही ,फ्रिज,कार ,बंगले जाने क्या क्या कमा के धर दिए,आपसे एक ढंग का स्कूटर नहीं लिया जाता|बिरादरी में नाक कटती है|

आदमी इसी 'बिरादरी' ,'नाक' और 'पत्नी' के चुंगुल में फंस कर,अगल-बगल की दुनिया  देखते हुए  शायद चुपके से , टोपी को जेब में धर लेता है|

इस कहर ने मेरे अनुमान से पिछले बीस-तीस  सालों से ‘टोपी’ को शहर से, मानो गायब सा कर दिया है |
केवल २६ जनवरी ,१५ अगस्त के दिन इक्के-दुक्के नेता टोपी पहने शौकिया दिख जाते हैं |
कांग्रेस के जमाने में ,चुनाव नजदीक आते-आते टोपी का चलन थोड़ा जोर मारता|
टिकट लेने ,पार्टी कार्यालय का चक्कर, टोपी पहन के जाओ तो असर पड़ता है ,जैसे विचार टोपी पहनने की बाध्यता पैदा कर देती थी|लोग दुखी मन से पहन लेते थे|

वैसे हमारे शहर में एक मारवाड़ी गजब की टोपी पहने रहता था|भोजनालय चलाता था|

साफ –सुथरी टोपी की बदौलत, उनकी काया में निखार ,बोली में माधुर्य ,व्यवहार में कुशलता, आप ही आप समा गई थी |

एक ‘टपोरी भोजनालय’ से, आलीशान चार मंजिला होटल तक का सफर करते, उस आम-साधारण आदमी के चश्मदीद , शहर के अनेक लोग हैं|

अफसोस कि अब , उनकी टोपी-युक्त फोटो पर, माला चढ गई है ,पर उस आदमी ने जब भी पहना, झकास पहना, कलफदार पहना , शान से पहना|

उनके व्यवसाय की वजह से उन्हें ‘पुरोहित जी’ कह के बुलाते थे|

उनके दिवंगत होने पर , कोई शहर-व्यापी मातम-पुर्सी नहीं हुई,कारण कि ,उन दिनों मीडिया जैसा कुछ होता नहीं था|

आज के मीडिया युग में, जो 'डेन्डरफ वाले तोते के घर’ को बहुत खास बना के परस देता है ,लोगो के हुजूम पे हुजूम टूट पड़ते हैं ,वे दिवंगत होते तो अलग बात होती|

तमाशा देखना,सनसनी में जीना इस जैसे नए युग का एक ख़ास शगल हो गया हो …लोग कान के कच्चे होने लगे हैं|

ये मीडिया वाले , पुरोहित जी को भी कुछ यूँ “ब्रेकिंग न्यज” के नाम पर घंटों चला लेते …..“आज आपके शहर से एक शख्श जिसने उम्दा भोजन की थालियाँ परोसी ,जिसने लोगों को विशुध्ध भोजन कराया ,जिसने हजारो –करोड़ो लोगों की क्षुधा-शान्ति का व्रत लिया था, जिसने मिलावट के किसी सामान का इस्तमाल नहीं किया ,इमानदारी से कम कीमत में सबके पेट तक भोजन पहुचाना जिनाक्क धर्म बन चुका था ,उस  शख्श का कल परमात्मा से अकाल  बुलावा आ गया ,एक आत्मा का परमात्मा में विलीन होना आज की सबसे बड़ी सदमे वाली खबर है|
सनसनी वाला ऐंकर ,यूँ कहता ,एक आदमी जिसने जिंदगी भर कलफदार टोपी पहनी मगर कभी इलेक्शन टिकट माँगने किसी दर पे नहीं पहुचा | वो आदमी जिसकी खासियत थी, कि गांधी –टोपी को यथा नाम तथा गुण अपने सर में आमरण धारण किये रहा आज दिवंगत हो गया |
आज के ज़माने का अजूबा ,क्या ऐसे लोग भी होते हैं जो बिना राजनैतिक सरोकार के टोपी को अपनी वेशभूषा में बनाए रखते हैं ?...
ऐसे आदर्श पुरुष को हमारे चेनल का नमन| हमारे चेनल की तरफ से उनके उठावना का लाइव टेलीकास्ट किया जाएगा|

सदर बाजार के एक और मारवाड़ी जिनका सोने-चांदी का बिजनेस था,पुरोहित के नक्शे –कदम में टोपी पहना करते थे|उनकी खासियत थी कि जब भी बड़ा ग्राहक आये, वे टोपी उतार के रख देते थे|टोपी पहन के ग्राहक को झांसा देने में जैसे उनकी अंतरात्मा धिक्कारती हो ,वे पेमेंट लेने,बाद ग्राहक को बिदा कर लेने पर  ही टोपी सर पर रखते थे| सात्विक विचार वाले उन जैसे लोग अब कहाँ बचे? उनके दान-पुन्य से अनेको आश्रम ,स्कुल चलते हैं|इन्कमटेक्स वाले उस ‘दानी-दयालु’ आदमी की तरफ कभी झांकने  नहीं गए|

टोपी के बारे में बचपन की सुनी एक कहानी अभी तक दिमाग में काबिज है|
एक व्यापारी टोपियों का व्यापार करता था|अपने टोकरे में ढेर सारी टोपियाँ लिए गाव-गाव फिरता था|चलते –फिरते जहाँ नदी-तालाब आ जाए ,नहाना ,खाना –पीना,झपकी लेना, कर लेता था|
एक बार एक पेड़ के नीचे आराम करते – करते सो गया|
पेड़ पे खूब सारे बन्दर बैठे थे, बंदरों ने नीचे उतर के, उसके टोकरे से टोपियाँ उठा के पहन ली और पेड़ पर चढ़ गये|व्यापारी की नीद जब खुली तो तो टोपियों गायब पाकर उसके होश उड़ गए|इधर-उधर देखने के बाद पता चला कि बंदरों ने सब टोपियाँ पहन रखी हैं|उसे कुछ सूझ नहीं रहा था कि टोपियों को वापस कैसे बरामद करे|उसके पास गनीमत से एक टोपी , जो उसके सर मे थी बच गई थी| उसने बंदरो की तरफ अपने सर से वो टोपी निकाल के उछाल दी|उसकी नकल में सब बन्दर, अपनी-अपनी टोपियाँ उछालने लगे|टोपियाँ नीचे गिरने लगी|व्यापारी ने टोपियाँ सम्हाली और फिर कभी पेड़ के नीचे , गहरी नीद में न सोने का निश्चय करके , आगे बढ़ गया|

इस कहानी का मुझमे कई दिनों तक असर रहा| तालाब और पेड़ के कम्बीनेशन में, मुझे टोपियों की याद आती रही|टोपीवाले का एक्शन,बंदरों का रि-एक्शन,वाला फ़िल्म मन में स्वत: चल जाता |
उस बिजनेस मेन की, तात्कालिक बुद्धि पर दाद देने का मन आज भी करता है|अपने छोटे-छोटे नाती-पोतो को कभी उनकी  जिद पर ये किस्सा सुना के, उनकी प्रतिक्रिया जानना चाहता हूँ|मुझे मालुम है उनके जेहन में 'सचिन-धोनी' वाली क्रिकेट की तिरछी टोपियाँ होती हैं|

‘टोपी-ज्ञान’ पाने के बाद अब बच्चे  कहीं  बंदर  दिखते ही, टोपियाँ ढूढ़ते हैं|वे बंदरों को ‘टोपी पहने’ देखना चाहते हैं|वे घर से बची-खुची टोपी ला के हाथ बढाते हैं|ले…ले… टोपी पहन …..|
दादा ये तो दान्त दिखा रहा है ……….!ये हंस रहा है…….,,
वो इधर को आ रहा है ………..|

मै बच्चो को सहज करने के लिए कहता हूँ ,चलो काउंट करो ,कितने हैं|गिनती शुरू हो जाती है वन..टू…थ्री ….ट्वंटी सेवन ,ट्वंटी एट…|बच्चे आपस में ट्वंटी सेवन ,ट्वंटी एट…की लड़ाई में लग जाते हैं ,एक बंदर तब तक उछल के दूसरे पेड़ पर चल देता है|

मै सोचता हूँ, बच्चो को कल्पना की दुनिया के इतने नजदीक नही ले जाना चाहिए |कहीं बंदरों की छीन-झपट में कुछ नुकसान न हो जाए?

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर
जोन १ स्ट्रीट ३ दुर्ग छत्तीसगढ़
४.११.१८
मोबाइल 9408807420 /9426764552

आवारा कुत्तों का रोड शो .....

मार्निग-वाक में डागी ‘सीसेंन’ को घुमाने का काम फिलहाल मेरे जिम्मे आ गया है।

रास्ते में दीगर कुत्तों से बचा के निकाल ले जाने का टिप, गणपत ने जरूर दिया था, मगर प्रेक्टिकल में तजुर्बा अलग होता है।

एक हाथ में डंडा,एक हाथ में पटटा पकडे, कुत्ते के बताए मार्ग को तय करो | खुद खिंचते चले जाओ। सामने आये दूसरी नस्ल की बिरादरी वालो को भगाते रहो।यह आम कुत्ता प्रेमियों का शगल है |

उस दिन शर्मा जी साथ हो लिए ,पूछे कौन सा है ?मैंने कहा अल्शेशियन।



कितने का लिए ? मैंने कहा ,एक मित्र के यहाँ बोल रखा था ,उनने दिलवाया। वे बोले; और कोई मिले तो दिलवाइए हमें भी ।

मैंने कहा ,शर्मा जी ,कंझट का काम है, कुत्ते का शौक करना। अपना बस चले तो अभी ये पट्टा आपको थमा के छुट्टी पा लें ,मगर 'पिंटू' का शौक है; सो खींचे जा रहे हैं।

वैसे भी आप मांस-मच्छी,अंडा कहाँ खिला पाओगे ,ये नस्ल तो इनके बिना गाय-माफिक हो जायेगी।

शर्मा जी, नान-वेज पर टिक नहीं पाए| वे राजनीति में उतर आये। क्या कहते हैं ?किसकी बनेगी ?

मैंने कहा, जो ज्यादा भौक ले वही मैदान से दूसरों को खदेड़ने के काबिल होता है ,मैंने डार्विन से मिलते-जुलते विचार फेका .... वैसे  आपका क्या कहना है ?

आपकी बात तो सही है। आजकल टी-वी देख-देख ,सुन-सुन के तो कान पाक गए हैं।
एक सोची -समझी साजिश के तहत 'मेंडेट' के नाम पर बिना सर्वे के डाटा दे डालते हैं | दिया खींचने के लिए धमाके करके बताएँगे कि रूलिंग पार्टी का आधार खिसक रहा है | फिर यही लोग चार पैनलिस्ट को बिठाके प्रायोजित तू-तू ,मैं-मैं करके साबित कर देते हैं कि जनता का हुजूम उन्हें जिताने के लिए बेताब बैठी है |  ये ध्यान भटकाने वाले स्केंडल ,सेक्स ,और घोटाला की लंबी फेहरिस्त दे-दे के मुद्दों पर आपको टिकने नहीं देती | यहां ,विपक्ष को अधमरा करना, पहले एजेंडे में शामिल है |



हम  ,क्यों नहीं,अपना भटकना बन्द करते ..... ? ..... ऐ.... सीसेंन उधर नही ....रास्ते में चलो ....।

शर्मा जी ने कहा, आपकी बात समझ लेता है !देखो रास्त में आ गया।

मैंने कहा शर्मा जी यही तो खूबी है, इन कुत्ते लोगो की।

भौकते जबरदस्त हैं ,दौड़ाएंगे भी खूब, मगर जब तक मालिक न कहे काटेंगे नहीं।

आगे देखिये...... ,वे जो कुछ आवारा कुत्ते आ रहे हैं कैसे गुर्रायेगे इस पर....... लगेगा अकेला आये तो नोच लेगे........।

मगर वहीँ ,जब हमारा अल्शेशियाँ एक गुर्रायेगा तो दुम दबा के भाग खड़े हो जायेंगे स्साले .....।

शर्मा जी को तत्कालिक परिणाम भी देखने को मिल गया।

चक्रव्यूह की माफिक, आवारा रोड छाप कुत्तों से, अल्शेशियन सीसेन घिर गया। ,वो थोडा सहमा मगर जैसे ही हमने हिम्मत दी, वो उन सब पर भरी पडने लगा।

आवारा कुत्ते आपनी रोड शो रैली को, दूसरी गली की तरफ ले गए।

मैंने कहा देखा शर्मा जी ,यही हमारे इधर भी हो रहा है।
रैलियां देख के हम अंदाजा लगा लेते हैं उमीदवार में दम है।
जब तक कोई ताल ठोंक के सामने आके नहीं गुर्रायेगा, जनता बेचारी भ्रम पाले रहेगी और अपना वोट देते रहेगी।

हमारा मानना है ,आप क्वालिटी देखो नस्ल देखो ,दमखम देखो।
ये नहीं कि चोर,उठाईगीर धोखेबाज ,सुपारी-किलर ,ब्लेक मार्केटियर ,दलाल-ठेकेदार कोई भी टिकट हथिया ले, और उसे आप चुन लो।
शर्मा जी , इस गड़बड़ को रोकना होगा .... ! आजकल यही सबकुछ हो रहा है।

एक ने भाषण झाडने में महारत हासिल कर ली,दूसरे ने पोल खोलने की विद्या सीख ली | वे दोनों बन गए राजनीति के दिग्गज पंडित ।
गुंडे-मवाली,घूसखोरो,देश का पैसा लूट के भागने वालों  से देश को बचाओ भइ ... बहुत हो गया।

इतनी देर खड़े गपियाने में, सीसेन कब दिशा मैदान से फारिग हो गया ,पता ही नहीं चला।


सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर
जोन १ स्ट्रीट ३ दुर्ग छत्तीसगढ़
४.११.१८
मोबाइल 9408807420 /9426764552

हम दागी हैं

हाँ ! हम दागी हैं .....

मुन्ना भाई, जग्गू हठेला के साथ मेरा पता ढूढते हुए आये |
जग्गू हठेला  ने परिचय कराते हुए कहा ,ये मुन्ना भाई हैं , अपने इलाके के ख़ास नए उम्मीदवार | अब की बार रूलिंग पार्टी ने इनको टिकट दिया है | आप तो इन्हें  अखबार की सुर्ख़ियों में पढ़े होंगे ?
मुझे  दिमाग पर ज्यादा जोर डालने की मशक्कत नहीं करनी पड़ी | 302 का आरोपी मेरे सामने था | इलाके के दबंग मुन्ना भाई का कट्टा, मेरे बरामदे में रखे सेंटर टेबल के उस टांग पर पड़ गया, जो पहले से कमजोर था | लिहाजा वो महज तीन टांगो पर बिलकुल मेरे अधमरे पैरों की तरह काँप रहा था ..|
मैंने लड़खड़ाती जुबान को काबू रखने की कवायद करते उनको बतलाया , "भाई जान के अलावा  अपना और पूरे परिवार का  वोट कहीं गया नहीं है |" आप नइ भी आते तो आपको .....मैं अपनी बात पूरी करता उससे पहले हठेला ने बयान किया , हम वोट के लिए अभी निकले कहाँ हैं ...?

भाई जान को एक विज्ञापन ड्राफ्ट करवाना है .....?
विज्ञापन और मुझसे ...? मैं तो कवि और अदना लेखक हूँ ....| किस्से ,कहानी, कविता या चुनाव है तो कुछ जिंदाबाद के नारे लिख सकता हूँ | कोई तर्ज दो तो विरोधी को उखाड़ने की पैरोडी बना सकता हूँ |
आप आज  आइडिया दे जाइये कल सुबह तक 'माल' मिल जाएगा |
मुझे पहली बार किसी साहित्य विधा की चाशनी में पगे  चीज  को 'माल' कहते हुए शर्म सी आई |
मूढ़ लोगों के बीच में बात , उनकी भाषा में बताने से संप्रेषणीय हो जाता है,कुछ-कुछ इस टाइप का इल्म मुझे था |   

इस बीच भीतर कमरे में रखी मोबाइल की घण्टी बजी|
मैंने एक्सक्यूज मी वाले अंदाज में, चाय नाश्ता भिजवाने  की बात कह भीतर पहुचा |
श्री आदेश पलटवार जी, अपने नए अंक के लिए कुछ चाहते थे |
मैंने आई मुसीबत को बखाना .... |
-कौन हठेला .... वही तो नहीं जो गंज मण्डी में पल्लेदार था ,हाथ ठेला चलाता था | वहीं से उसका नाम हठेला पड़ गया | वो धीरे -धीरे मुन्ना ठाकुर के साथ छुटभैया नेतागिरी करते,आज  उसका दाहिना हाथ है |
मैंने कहा,पलटवार जी ,  मैं हेंडल नहीं कर पाउँगा | तुम्हारे पास भेजता हूँ |
उसने समझाया ,बेवकूफी मत करो ... वे लोग कौन साहित्य के शोध -छात्र हैं | कुछ भी लिख के टरका दो ...बस इतना ख्याल रखना कि 'मटेरियल' में कोई पकड़ की बात न रह जाए |
उन्हें पहले निपटा ,मैं फिर लगाता हूँ |
वापस उनके बीच पहुच के मैंने हठेला जी को कहा , (जी लगाना मेरी मजबूरी में शामिल जान के पढ़े) आप सविस्तार अपने विज्ञापन का मौजू बताइये ..... ?
हठेला ने पूछा ये मौजू क्या है ....?
मैंने कहा किस अखबार में कितने बड़े फांट में किस जगह छपना है |
वो बोला , अपने इलाके में चार अख़बार हैं ,मुन्ना जी चारो के एडीटर को नजदीकी से जानते हैं| जहाँ कहेंगे आयोग के दिशा-निर्देश मानते हुए छाप देंगे |
वे छपाई का खर्चा भी न लेंगे, बावजूद आयोग में जमा करने को पुख्ता  बिल देंगे | मुझ पर उनकी दबंगई हॉबी करवाने का नुस्खा चल पड़ा था |
हठेले ने मुझे आस्वस्त करते हुए कहा ,घबराओ नहीं | भाई जान खुश हुए तो आपके 'बिल'का पाई-पाई नगद दे जाएंगे | पारदर्शिता का मामला है |
हठीले ने भविष्य में  किसी काम को 'पास' करवाने का जिम्मा भी लिया|
मैंने मन ही मन सोचा लेखको को किसी एडीटर पर दबाव डालने की जिस दिन शुरुआत हुई, उस दिन से साहित्य का पतन चालु हुआ समझो .....| 
   वे चले गए ... एकाएक कट्टा उठा लेने से ,मेरे सेंटर टेबल की  चौथी टाँग पूर्व की स्थिति में लौट आई मगर मेरी हालत में पहले सा कुछ नही रह गया था |
अब मेरे सामने, उनके द्वारा दिए गए व्याखान से  'मुन्ना-चालीसा' विज्ञापन रस निचोड़ना था |
मैंने लिखा ,
मेरे प्यारे मतदाताओ !
 आज मैं आपके सामने अपना जी खोल के रखता हूँ |
मैं गरीब ,अछूत जात में पैदा हुआ | मुझमे संगठन क्षमता थी | साथियों से कभी धोखा नहीं किया | पार्टी वाले मुझे किसी बन्द या हड़ताल में ढूंढ के निकाल लेते | मैं उनके एवज डंडा खाता ,धरा 144 के उलंघन पर जेल जाता | इस किस्म के करीब 10 अपराध पर मेरी आये दिन  पेशी होती है | मेरा अपराध क्रमांक और आगे की पेशी तारीख का मैं उल्लेख नीचे कर रहा हूँ |
मुझ पर किडनेपिंग, फिरौती का भी आरोप है| इस अपराध के बारे में आपने तब के अखबार में पढा होगा | कई पत्रकारों ने मेरी भूमिका को सराहा है | मैंने, भष्टाचार में गले तक लिप्त अधकारियों के खिलाप, कई आंदोलन किये ,उस समय के सरकार को चेताया , मगर सरकार स्वयं उन्ही लोगो की हिफाजत में खड़ी थी, लिहाजा मुझे सामने आना पड़ा| इन अपराधों की संख्या छै है| इसे भी आपकी जानकारी में ला रहा हूँ |
अब रही बात 302  की ...? ये विरोधियों की चाल है | मामला अपराध क्रमांक 1111 पर मुझे बेल मिली है | अगर संगीन होता तो मैं बाहर नहीं होता | अभी यह अदालत के अधीन है अत: इस विषय में व्यापक पक्ष रखना उचित नहीं है |
आप मतदान के दिन निर्भयता से मुझ पर भरोसा करते हुए मेरे पक्ष में वोट दे सकते हैं |
आपका सदैव निर्भय भाई ,
मुन्नाभाई ठाकुर
उम्मीदवार ......सत्तापक्ष  दल

हठेले ने इस विज्ञपन राइटिंग पर इतना जरूर कहा, हम सत्ता  काबिज होते ही आपको, राज्य-राजभाषा आयोग का चेयरमेन  बनाने का वादा करते हैं |
मुझे लगा बन्दूक की नोक पर मेरा चयन 'हिंदी' के लिए कितना उत्साही परिणाम देगा पता नहीं ,,,,?   

 सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर
जोन 1 स्ट्रीट 3 
दुर्ग छत्तीसगढ़

मोबाइल 9426764552///9408807420


गड़े मुर्दे की तलाश

गड़े मुर्दों की तलाश
सुशील यादव

ये राजनीति भी अब गजब की हो गई है।
ज़िंदा लोगों पर आजकल की नहीं जाती। मुद्दे आला किस्म के  मिलते नहीं , सो मुर्दे उखाड़े जाते हैं।
राजनीतिज्ञ लोगों को आजकल फावड़ा-बेलचा ले के चलना होता है।
- क्या पता किस जगह किस रूप में क्या गड़ा मिल जावे?
एक अच्छे किस्म के, ताजा-ताजा, स्वच्छ, लगभग हाल ही में पाटे हुए, मुरदे की खुशबु नेता को सैकड़ों मील दूर से मिल जाती है।
एक अच्छा मुर्दा , किस्मत के खजाने खोल देता है, ऐसा जानकार, तजुर्बेकार, राजनीति में सैकड़ों चप्पल घिसे नेताओं का मानना है।

इन दिनों कनछेदी मेरे पास आकर ‘मुरदा पुराण‘ सुनाये जाने की जिद करने लगा।
गुरुजी ! आपने सन बावन से इस देश के पचासों इलेक्शन देखे हैं। आपके जमाने में कैसा क्या होता था ? इलेक्शन के कुरुक्षेत्र में  वेद-पुराण के आप पुरोधा पुरुष हैं। मुझे लगा कनछेदी "बचे हुए अंतिम-पुरोधा " की तरह मुझे ट्रीट कर रहा है |
हम आपके तजुर्बों को अक्षुण रखना चाहते हैं।
उसके ये कहने से लगभग यकीन की हद तक , ”क्या पता आप कब टपक जाओ”, वाली कनछेदी की अंदरुनी सोच ध्वनित होने लगी ।
कनछेदी हमें फ्लेश बेक में ले जाने की, गाहे-बगाहे भरपूर कोशिश करता है। वो कहता है अगर आप, हम जैसे आम लोगों का, या चेटिंग- सेटिंग में बीजी नौजवान पीढ़ी के बचे हुए समय में कुछ ज्ञान वर्धन करेंगे तो बड़ी कृपा होगी। मै कनछेदी को, इलेक्शन वाले किसी अपडेट से नावाकिफ रखना खुद भी कभी गवारा नहीं करता।
उसके अनुरोध को मुझे टालना कभी अच्छा नहीं लगा। मेरे पास इन दिनों समय-पास का कोई दूसरा शगल या आइटम, सिवाय कनछेदी के और कोई बचा भी तो नहीं  .....?  इसलिए उसे बातों के मायाजाल में घेरे रहना मेरी भी मजबूरी है। उसे पुराने किस्से सुनने और मुझे सुनाने का शौक बस यूँ ही पल गया  है।

आप लोगों के पास समय है तो चलें, 'टेम- पास' के लिए कुछ गड़े मुर्दे उखाड़ लें ....?
सन बावन से सत्तर तक के इलेक्शन में, ‘लोकतंत्र के पर्व की तरह’ खुशबू थी, सादगी और भाईचारे से लोग इस पर्व के उत्साह में झूमते रहे।यूँ जीत -हार को संजीदगी से लेने का चलन था जीते तो ठीक वरना अपना क्या गया ....? इलेक्शन में चवन्नी भर का बर्दाश्त काबिल ही तो पैसा लगता था | धीरे -धीरे बाद में  कुछ प्रदेशों में, कट्टा से वोट छापे जाने की शुरुआत हुई। बूथ पर काबिज हो के मजलूम लोगों के वोट के हक़ को छीन लेना नए फैशन में शामिल होने लगा ।
आहिस्ता-आहिस्ता , कट्टा संचालक आकाओ ने सोचा इससे बदनामी हो रही है। जीतने में मजा नहीं आ रहा, वे अपने आदमियों से बाकायदा हवाई गोलियाँ चलाकर लोगो को सचेत कर देने की कहने लगे।
हिन्दुस्तानी नेता, चाहे कैसा भी हो, उनमें कहीं न कहीं से गाँधी-बब्बा की आत्मा देर-सबेर घुस ही आती है, वे अहिंसा का पाठ भी पढ़े होने के हिमायती बने दीखते हैं।

वे अपने लोगों को सीखा के भेजते, आप को पेटी उठाने से पहले  बूथ पर ये जरुर कहना है कि, हम आपको लूटने-धमकाने आये नहीं हैं, हमें बस डिब्बा उठाना है। नेता जिताना है। वे डिब्बा उठाये चलते बनते। 'सत्यमेव-जयते-लोगो’ वाले खाकी वर्दीधारी, पोलिग बूथ के कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी, इस पुनीत कार्य को होते देखने में खुद को अभ्यस्त करते दिखते, वे मन ही मन ‘जान बची और लाखों पाए’ नामक  नोटों को गिनने में लग जाते।

अब ये हरकते, प्राय कम जगहों पर, या कहें तो नक्सलवाद-आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों को छोड़ कहीं देखने में नहीं आतीं। उन दिनों मुर्दा उखाड़ने का झंझट कोई नहीं पालता था, तब केवल  मुर्दे बनाने, टपकाने के खेल हुआ करते थे। सीमित जगहों पर खेला जाने वाला ,ये खेल था तो सांकेतिक मगर जबरदस्त था। एक चेतावनी थी, प्रजातंत्र पर आस्था रखने वालो चेतो, नहीं तो हम समूची बिरादरी में फैलाने के लिए बेकरार हैं।
कनछेदी ! जानते हो इसकी वजह क्या थी ?
कनछेदी भौचक्क देख के, ना वाली मुंडी भर हिला पाता।

मै आगे कहता, राजनीति में आजादी के बाद बेहिसाब पैसा आ गया। अपना देश, गरीब, शोषित, दलित, अशिक्षा, महामारी, अंधविश्वास, झाड़-फुक में उलझा हुआ था। या तो बाबानुमा धूर्त लोग या चालाक नेता इसे ठग रहे थे। योजना के नाम पर बेहिसाब पैसा, सड़कों, नालियों, बाँधों में, ठेकेदार इंजिनीयर के बीच बह रहा था। बाढ़ में पैसा, तूफान में पैसा, भूकंम्प में पैसा, सूखे में पैसा। पैसा कहाँ नही था.....? नेताओं ने इन पैसों को, दिल खोल के बटोरने के लिए इलेक्शन लड़ा। लठैत-गुंडे पाले ......दबदबा बनाया ......मुँह में राम बगल में छुरी लिए घूमे।
एक रोटी की छीन झपट, जो भूखों-नंगों के बीच हो सकती थी वो बेइन्तिहा हुई।
मेरा कहना तो ये है की कमोबेश आज भी आकलन करें तो कोई तब्दीली नजर नहीं आती, हाल कुछ बदले स्वरूप में वही है। अब, वोटर के दिल को जीतने का नया खेल यूँ खेला जाने लगा है कि गड़े हुए मुर्दे उखाड़ो।

बोफोर्स के मुर्दे उखाड़ते-उखाड़ते सरकार पलट गई | नेताओं के सामने नजीर बन गया|

 पिछले किये गए कार्यों का पोस्टमार्टम, उनके कर्ताधर्ताओं का चरित्र हनन अच्छे परिणाम देने लगे।
घोटालो को, घोटालेबाजों को हाईलाईट किये रहना, पानी पी-पी के कोसना, गले बैठने तक कोसना फैशन बन गया। लोग मानने लगे कि, दामाद जी को सूट सिलवा दो तो आफत, न दो तो जग हँसाई।
परीक्षा पास करा के लोगों को नौकरी दो, तो उनके घर के मुर्ग-मुस्सल्ल्म की उड़ती खुशबू सूघ के घोटाले की गणना करने में बाज नही आते ।

‘आय से ज्यादा आमदनी’ के मामले में, अपने देश में बेशुमार मुर्दे गड़े हैं।
इनको तरीके से उलटो-पलटो ,उखाड़ लो, तो, विदेशों से काला धन वापस लाने की तात्कालिक जरूरत नहीं दिखती। कोयला माफिया की कब्र उघाड़ के देख लो, माइनिग वाले, प्लाट आवंटन, मिलेट्री के टाप सीक्रेट सौदे पर तो हम अपनी आँख भी उठा नहीं सकते।
जो है जैसा है, की तर्ज पर, मुंबई फुटपाथ पर सोये हुए बेसहारा ग़रीब माफिक  जनता रात के सन्नाटे में कब लात की ठोकर खाने पर मजबूर हो जाए कह नहीं सकते |
 ये एक-एक शख्श अतीत के गड़े हुए मुर्दे हैं| किन-किन मुर्दों को को कहाँ-कहाँ से उठायें ?
सब एक साथ खोद डाले गए तो चारों तरफ बदबू फैल जायेगी। महामारी फैलने का खतरा अलग से हो सकता है।
चलो ! स्वच्छ भारत के आम स्वच्छ आदमी के मन से सोचे...
इस प्रजातंत्र में, कई इलेक्शन आने हैं...|
अपनी हिन्दू परंपरा में ये अच्छी बात है ,हम मुर्दों को गड़ाने की बजाय जला देते हैं। शरीर जला देने के बाद भी, अविनाशी आत्मा का अंश फकत कुछ दिनों के लिए हमारे दिलों में गड़ा रह जाता है बस वही कनछेदी को बताना था ।

कनछेदी की तन्द्रा भंग हुई। वह मायूस सा लौट गया।

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर
जोन १ स्ट्रीट ३ दुर्ग छत्तीसगढ़
४.११.१८
मोबाइल 9408807420 /9426764552



तैं सुशील ....

अतलंग लेवत  सरकार अडबड
नदिया  चढ़े मानो  धार अडबड

अर्जी देवैया यहु चिन्हारी
जगा-जगा कहे जोहार अड़बड़

का खा के उपजाए महतारी
तोर बाबू के गोहार अडबड

चीन्हे बर मोला,जुग लग जाही
चारो धाम हे  चिन्हार अडबड

परिया परे कस 'जी' लागत असो
करम के जुच्छा कन्हार अडबड

मिरचा सही तोला सुरतावंव
मरत-ले झन्नाथे  झार अड़बड़


तैं सुशील चिक्कन घड़ा के माफिक
मातम में मानस तिहार अडबड

सुशील यादव
फिलहाल ,वडोदरा गुजरात

अड़बड़ = बहुत ज्यादा
चिन्हारी=पहचान
जोहार= दुआ सलाम
गोहार =चीख चिल्लाना
जी = मन ,ह्रदय
परिया= फसल न उगाना
कन्हार=उपजाऊ  जमीन
जुच्छा= खाली
मानस = मनाना

12. 9.18

221 2122 221 2122
वरना कहाँ -चलोगे ...?
हम बेवजह ,जहां में  भटके गुमान लेकर
कोई जरूर आएगा नव-विहान लेकर

कुछ दाग आज भी  बाकी है, जिसे मिटाने
बरसो लगे, पुराने- बीते, निशान  लेकर

इतराये जो पड़ौसी उसको तमीज दे-दो
आदत सुधार लें वो अमिट पहचान लेकर

मजबूत हैं इरादे तो बात ही नहीं है
वरना कहाँ -चलोगे अपनी थकान लेकर

कोशिश करें  सभी जन ,ऊंचा ललाट पाएं
गौरव पलों में झूमे  सब , हिन्दुस्तान  लेकर

सुशील यादव
१३.६.१८/ ३०.९.१८


सबको  मंजिल एक मिले
@

मुझको गड़ा खजाना दे
उसका पता ठिकाना दे

वो दिन लौटा दे मौला
फिर से  पाई-आना दे

लौट सके हम कुनबे तक
गुजरा वही जमाना दे

कागज की हर नाव बहे
हमे हुनर नजराना दे

व्यथित जुलाहा घूम रहा
हाथों  ताना-बाना दे

इस भूगोल क्या भटकना
हर दुविधा  हर्जाना दे

जो कोलाहल के आदी
बड़ी  सजा वीराना दे

सबको  मंजिल एक मिले
सुलझा  पागलखाना दे
@

सुशील यादव

१०अक्टूबर

हम तो मत के दाता ठहरे ...
##
पाँव यहीं जमा लो भइया
धूनी इधर रमा लो भइया
#
तुम पाँच बरस बाद दिखे हो
फिर  हिसाब सम्भालो भइया
#
हम तो मत के दाता ठहरे
डाका जम के डालो भइया
#
हमें  पार तो  बाद लगाना
खुद को 'बेल' छुड़ा लो भइया
#
बनी हुई बरसों की आदत
सच से आँख चुरा लो भइया
#
चौराहा करके पसन्द मूरत
आदमकद बनवा लो भइया
#
देश भला की गर सोचो तो
तम्बू राम निकालो भइया
##
सुशील यादव

३१.१०.१८

दीप जले जब तूफानों में

किस -किस से तुम बातें करते ,किससे यारी पक्की हो गई
है निकट चुनाव तभी  , गठबंधन तैयारी पक्की  हो गई

छल कपट भरी दुनिया में, लेना- देना सब चलता है
तुमने सीखा लेना महज ,बगावत सारी पक्की हो गई

मुह देखी दुनिया में है,  खेल निराले मायावी सारे
लो पीछे की हलचल में अब,धार तुम्हारी पक्की हो गई
   
राह पकड़ लोगे जिस दिन ,शांती-अहिंसा बापू जैसे फिर
मैं समझूँगा उस दिन केवल ,दुनियादारी पक्की हो गई

कच्ची सड़के , गाव् अन्धेरा,दीप जले जब तूफानो में
जिस दिन भूखा सोय न कोई,पहरेदारी पक्की हो गई

बोल थके हम चौराहों पर ,आदमकद अपना लगवा दो
मरने की सब राह  देखते ,अपनी बारी पक्की हो गई

उन्मादों में घेरे  रखता ,बाटे फिरता कुनबों -जातों में
वे पैदल  के दिन लद गए,  घुड़सवारी पक्की हो गई

सुशील यादव
७.११. १८
शुभ दीपावली


@@@@

रिश्ता अतके बच पाही
##

हूके हस ना भूके हस
पान खाय अउ  थूके हस

चेत कभू चढय नही
उही जगा फेर  रुके हस

गांज समय, बड़ पैरावट
आगी- आगी  फुके हस

का  पंदोली पा सकबे
मनखे- मनखे भूके हस
 
रिश्ता अतके बच पाही
जती-जती अपटे-झुके हस

सुशील यादव
18.5.18

sushil yadav durg: है कौन जो

sushil yadav durg: है कौन जो: 2212 2212 1222 2 अहसास ....! है कौन,जो तन्हाई को सदा देता है मुझको कभी,बन के सबा हिला देता है मैं सुनने का आदी नहीं,मगर कानो में सुर...

सुशील यादव दुर्ग :      धनाक्षरी 1     $    'पर' जिनके कटे थे ,वो...

सुशील यादव दुर्ग :

     धनाक्षरी 1
     $
    'पर' जिनके कटे थे ,वो...
:      धनाक्षरी 1      $     'पर' जिनके कटे थे ,वो परिंदे कहाँ  गए      लो सीधे-सादे गाँव के, बाशिंदे  कहाँ गए      $      जमी...