Tuesday, 13 November 2018

टोपी आम आदमी की

टोपी आम आदमी की… – सुशील यादव

टोपी के बारे में मेरी बचपन से कई अच्छी धारणायें थी|
गांधी जी के अनुमार्गी होने की वजह से, मेरे पिता के पहनावे में ये,जवाहर कोट के साथ शामिल जो था|
वे जब भी घर लौटते, हम भाई –बहनों में टोपी लेने की जंग छिड़ जाती|
भले ही मिनटों –सेकण्डो कि लिए सही, टोपी जो हाथ लगती, मन खिल उठता|
माँ टोपी के गंदे हो जाने के भय से ,जतन से उसे खूंटी पर टांग देती|
हम बापू की टोपी को , गांधी-बाबा के  फेम के बगल में , टंग जाने के बाद अपने –अपने खेल में खो जाते|

टोपी में जाने क्या-क्या संस्कार थे,बरसों हम उन संस्कारों से बंधे रहे|
हमारी शालीनता शादी होने के बाद, पत्नी के तानों से, ज़रा छिन्न-भिन्न हुई| लोग टी व्ही ,फ्रिज,कार ,बंगले जाने क्या क्या कमा के धर दिए,आपसे एक ढंग का स्कूटर नहीं लिया जाता|बिरादरी में नाक कटती है|

आदमी इसी 'बिरादरी' ,'नाक' और 'पत्नी' के चुंगुल में फंस कर,अगल-बगल की दुनिया  देखते हुए  शायद चुपके से , टोपी को जेब में धर लेता है|

इस कहर ने मेरे अनुमान से पिछले बीस-तीस  सालों से ‘टोपी’ को शहर से, मानो गायब सा कर दिया है |
केवल २६ जनवरी ,१५ अगस्त के दिन इक्के-दुक्के नेता टोपी पहने शौकिया दिख जाते हैं |
कांग्रेस के जमाने में ,चुनाव नजदीक आते-आते टोपी का चलन थोड़ा जोर मारता|
टिकट लेने ,पार्टी कार्यालय का चक्कर, टोपी पहन के जाओ तो असर पड़ता है ,जैसे विचार टोपी पहनने की बाध्यता पैदा कर देती थी|लोग दुखी मन से पहन लेते थे|

वैसे हमारे शहर में एक मारवाड़ी गजब की टोपी पहने रहता था|भोजनालय चलाता था|

साफ –सुथरी टोपी की बदौलत, उनकी काया में निखार ,बोली में माधुर्य ,व्यवहार में कुशलता, आप ही आप समा गई थी |

एक ‘टपोरी भोजनालय’ से, आलीशान चार मंजिला होटल तक का सफर करते, उस आम-साधारण आदमी के चश्मदीद , शहर के अनेक लोग हैं|

अफसोस कि अब , उनकी टोपी-युक्त फोटो पर, माला चढ गई है ,पर उस आदमी ने जब भी पहना, झकास पहना, कलफदार पहना , शान से पहना|

उनके व्यवसाय की वजह से उन्हें ‘पुरोहित जी’ कह के बुलाते थे|

उनके दिवंगत होने पर , कोई शहर-व्यापी मातम-पुर्सी नहीं हुई,कारण कि ,उन दिनों मीडिया जैसा कुछ होता नहीं था|

आज के मीडिया युग में, जो 'डेन्डरफ वाले तोते के घर’ को बहुत खास बना के परस देता है ,लोगो के हुजूम पे हुजूम टूट पड़ते हैं ,वे दिवंगत होते तो अलग बात होती|

तमाशा देखना,सनसनी में जीना इस जैसे नए युग का एक ख़ास शगल हो गया हो …लोग कान के कच्चे होने लगे हैं|

ये मीडिया वाले , पुरोहित जी को भी कुछ यूँ “ब्रेकिंग न्यज” के नाम पर घंटों चला लेते …..“आज आपके शहर से एक शख्श जिसने उम्दा भोजन की थालियाँ परोसी ,जिसने लोगों को विशुध्ध भोजन कराया ,जिसने हजारो –करोड़ो लोगों की क्षुधा-शान्ति का व्रत लिया था, जिसने मिलावट के किसी सामान का इस्तमाल नहीं किया ,इमानदारी से कम कीमत में सबके पेट तक भोजन पहुचाना जिनाक्क धर्म बन चुका था ,उस  शख्श का कल परमात्मा से अकाल  बुलावा आ गया ,एक आत्मा का परमात्मा में विलीन होना आज की सबसे बड़ी सदमे वाली खबर है|
सनसनी वाला ऐंकर ,यूँ कहता ,एक आदमी जिसने जिंदगी भर कलफदार टोपी पहनी मगर कभी इलेक्शन टिकट माँगने किसी दर पे नहीं पहुचा | वो आदमी जिसकी खासियत थी, कि गांधी –टोपी को यथा नाम तथा गुण अपने सर में आमरण धारण किये रहा आज दिवंगत हो गया |
आज के ज़माने का अजूबा ,क्या ऐसे लोग भी होते हैं जो बिना राजनैतिक सरोकार के टोपी को अपनी वेशभूषा में बनाए रखते हैं ?...
ऐसे आदर्श पुरुष को हमारे चेनल का नमन| हमारे चेनल की तरफ से उनके उठावना का लाइव टेलीकास्ट किया जाएगा|

सदर बाजार के एक और मारवाड़ी जिनका सोने-चांदी का बिजनेस था,पुरोहित के नक्शे –कदम में टोपी पहना करते थे|उनकी खासियत थी कि जब भी बड़ा ग्राहक आये, वे टोपी उतार के रख देते थे|टोपी पहन के ग्राहक को झांसा देने में जैसे उनकी अंतरात्मा धिक्कारती हो ,वे पेमेंट लेने,बाद ग्राहक को बिदा कर लेने पर  ही टोपी सर पर रखते थे| सात्विक विचार वाले उन जैसे लोग अब कहाँ बचे? उनके दान-पुन्य से अनेको आश्रम ,स्कुल चलते हैं|इन्कमटेक्स वाले उस ‘दानी-दयालु’ आदमी की तरफ कभी झांकने  नहीं गए|

टोपी के बारे में बचपन की सुनी एक कहानी अभी तक दिमाग में काबिज है|
एक व्यापारी टोपियों का व्यापार करता था|अपने टोकरे में ढेर सारी टोपियाँ लिए गाव-गाव फिरता था|चलते –फिरते जहाँ नदी-तालाब आ जाए ,नहाना ,खाना –पीना,झपकी लेना, कर लेता था|
एक बार एक पेड़ के नीचे आराम करते – करते सो गया|
पेड़ पे खूब सारे बन्दर बैठे थे, बंदरों ने नीचे उतर के, उसके टोकरे से टोपियाँ उठा के पहन ली और पेड़ पर चढ़ गये|व्यापारी की नीद जब खुली तो तो टोपियों गायब पाकर उसके होश उड़ गए|इधर-उधर देखने के बाद पता चला कि बंदरों ने सब टोपियाँ पहन रखी हैं|उसे कुछ सूझ नहीं रहा था कि टोपियों को वापस कैसे बरामद करे|उसके पास गनीमत से एक टोपी , जो उसके सर मे थी बच गई थी| उसने बंदरो की तरफ अपने सर से वो टोपी निकाल के उछाल दी|उसकी नकल में सब बन्दर, अपनी-अपनी टोपियाँ उछालने लगे|टोपियाँ नीचे गिरने लगी|व्यापारी ने टोपियाँ सम्हाली और फिर कभी पेड़ के नीचे , गहरी नीद में न सोने का निश्चय करके , आगे बढ़ गया|

इस कहानी का मुझमे कई दिनों तक असर रहा| तालाब और पेड़ के कम्बीनेशन में, मुझे टोपियों की याद आती रही|टोपीवाले का एक्शन,बंदरों का रि-एक्शन,वाला फ़िल्म मन में स्वत: चल जाता |
उस बिजनेस मेन की, तात्कालिक बुद्धि पर दाद देने का मन आज भी करता है|अपने छोटे-छोटे नाती-पोतो को कभी उनकी  जिद पर ये किस्सा सुना के, उनकी प्रतिक्रिया जानना चाहता हूँ|मुझे मालुम है उनके जेहन में 'सचिन-धोनी' वाली क्रिकेट की तिरछी टोपियाँ होती हैं|

‘टोपी-ज्ञान’ पाने के बाद अब बच्चे  कहीं  बंदर  दिखते ही, टोपियाँ ढूढ़ते हैं|वे बंदरों को ‘टोपी पहने’ देखना चाहते हैं|वे घर से बची-खुची टोपी ला के हाथ बढाते हैं|ले…ले… टोपी पहन …..|
दादा ये तो दान्त दिखा रहा है ……….!ये हंस रहा है…….,,
वो इधर को आ रहा है ………..|

मै बच्चो को सहज करने के लिए कहता हूँ ,चलो काउंट करो ,कितने हैं|गिनती शुरू हो जाती है वन..टू…थ्री ….ट्वंटी सेवन ,ट्वंटी एट…|बच्चे आपस में ट्वंटी सेवन ,ट्वंटी एट…की लड़ाई में लग जाते हैं ,एक बंदर तब तक उछल के दूसरे पेड़ पर चल देता है|

मै सोचता हूँ, बच्चो को कल्पना की दुनिया के इतने नजदीक नही ले जाना चाहिए |कहीं बंदरों की छीन-झपट में कुछ नुकसान न हो जाए?

सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर
जोन १ स्ट्रीट ३ दुर्ग छत्तीसगढ़
४.११.१८
मोबाइल 9408807420 /9426764552

आवारा कुत्तों का रोड शो .....

मार्निग-वाक में डागी ‘सीसेंन’ को घुमाने का काम फिलहाल मेरे जिम्मे आ गया है।

रास्ते में दीगर कुत्तों से बचा के निकाल ले जाने का टिप, गणपत ने जरूर दिया था, मगर प्रेक्टिकल में तजुर्बा अलग होता है।

एक हाथ में डंडा,एक हाथ में पटटा पकडे, कुत्ते के बताए मार्ग को तय करो | खुद खिंचते चले जाओ। सामने आये दूसरी नस्ल की बिरादरी वालो को भगाते रहो।यह आम कुत्ता प्रेमियों का शगल है |

उस दिन शर्मा जी साथ हो लिए ,पूछे कौन सा है ?मैंने कहा अल्शेशियन।



कितने का लिए ? मैंने कहा ,एक मित्र के यहाँ बोल रखा था ,उनने दिलवाया। वे बोले; और कोई मिले तो दिलवाइए हमें भी ।

मैंने कहा ,शर्मा जी ,कंझट का काम है, कुत्ते का शौक करना। अपना बस चले तो अभी ये पट्टा आपको थमा के छुट्टी पा लें ,मगर 'पिंटू' का शौक है; सो खींचे जा रहे हैं।

वैसे भी आप मांस-मच्छी,अंडा कहाँ खिला पाओगे ,ये नस्ल तो इनके बिना गाय-माफिक हो जायेगी।

शर्मा जी, नान-वेज पर टिक नहीं पाए| वे राजनीति में उतर आये। क्या कहते हैं ?किसकी बनेगी ?

मैंने कहा, जो ज्यादा भौक ले वही मैदान से दूसरों को खदेड़ने के काबिल होता है ,मैंने डार्विन से मिलते-जुलते विचार फेका .... वैसे  आपका क्या कहना है ?

आपकी बात तो सही है। आजकल टी-वी देख-देख ,सुन-सुन के तो कान पाक गए हैं।
एक सोची -समझी साजिश के तहत 'मेंडेट' के नाम पर बिना सर्वे के डाटा दे डालते हैं | दिया खींचने के लिए धमाके करके बताएँगे कि रूलिंग पार्टी का आधार खिसक रहा है | फिर यही लोग चार पैनलिस्ट को बिठाके प्रायोजित तू-तू ,मैं-मैं करके साबित कर देते हैं कि जनता का हुजूम उन्हें जिताने के लिए बेताब बैठी है |  ये ध्यान भटकाने वाले स्केंडल ,सेक्स ,और घोटाला की लंबी फेहरिस्त दे-दे के मुद्दों पर आपको टिकने नहीं देती | यहां ,विपक्ष को अधमरा करना, पहले एजेंडे में शामिल है |



हम  ,क्यों नहीं,अपना भटकना बन्द करते ..... ? ..... ऐ.... सीसेंन उधर नही ....रास्ते में चलो ....।

शर्मा जी ने कहा, आपकी बात समझ लेता है !देखो रास्त में आ गया।

मैंने कहा शर्मा जी यही तो खूबी है, इन कुत्ते लोगो की।

भौकते जबरदस्त हैं ,दौड़ाएंगे भी खूब, मगर जब तक मालिक न कहे काटेंगे नहीं।

आगे देखिये...... ,वे जो कुछ आवारा कुत्ते आ रहे हैं कैसे गुर्रायेगे इस पर....... लगेगा अकेला आये तो नोच लेगे........।

मगर वहीँ ,जब हमारा अल्शेशियाँ एक गुर्रायेगा तो दुम दबा के भाग खड़े हो जायेंगे स्साले .....।

शर्मा जी को तत्कालिक परिणाम भी देखने को मिल गया।

चक्रव्यूह की माफिक, आवारा रोड छाप कुत्तों से, अल्शेशियन सीसेन घिर गया। ,वो थोडा सहमा मगर जैसे ही हमने हिम्मत दी, वो उन सब पर भरी पडने लगा।

आवारा कुत्ते आपनी रोड शो रैली को, दूसरी गली की तरफ ले गए।

मैंने कहा देखा शर्मा जी ,यही हमारे इधर भी हो रहा है।
रैलियां देख के हम अंदाजा लगा लेते हैं उमीदवार में दम है।
जब तक कोई ताल ठोंक के सामने आके नहीं गुर्रायेगा, जनता बेचारी भ्रम पाले रहेगी और अपना वोट देते रहेगी।

हमारा मानना है ,आप क्वालिटी देखो नस्ल देखो ,दमखम देखो।
ये नहीं कि चोर,उठाईगीर धोखेबाज ,सुपारी-किलर ,ब्लेक मार्केटियर ,दलाल-ठेकेदार कोई भी टिकट हथिया ले, और उसे आप चुन लो।
शर्मा जी , इस गड़बड़ को रोकना होगा .... ! आजकल यही सबकुछ हो रहा है।

एक ने भाषण झाडने में महारत हासिल कर ली,दूसरे ने पोल खोलने की विद्या सीख ली | वे दोनों बन गए राजनीति के दिग्गज पंडित ।
गुंडे-मवाली,घूसखोरो,देश का पैसा लूट के भागने वालों  से देश को बचाओ भइ ... बहुत हो गया।

इतनी देर खड़े गपियाने में, सीसेन कब दिशा मैदान से फारिग हो गया ,पता ही नहीं चला।


सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर
जोन १ स्ट्रीट ३ दुर्ग छत्तीसगढ़
४.११.१८
मोबाइल 9408807420 /9426764552

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