सबको मंजिल एक मिले
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मुझको गड़ा खजाना दे
उसका पता ठिकाना दे
वो दिन लौटा दे मौला
फिर से पाई-आना दे
लौट सके हम कुनबे तक
गुजरा वही जमाना दे
कागज की हर नाव बहे
हमे हुनर नजराना दे
व्यथित जुलाहा घूम रहा
हाथों ताना-बाना दे
इस भूगोल क्या भटकना
हर दुविधा हर्जाना दे
जो कोलाहल के आदी
बड़ी सजा वीराना दे
सबको मंजिल एक मिले
सुलझा पागलखाना दे
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सुशील यादव
१०अक्टूबर
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