Tuesday, 13 November 2018


सबको  मंजिल एक मिले
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मुझको गड़ा खजाना दे
उसका पता ठिकाना दे

वो दिन लौटा दे मौला
फिर से  पाई-आना दे

लौट सके हम कुनबे तक
गुजरा वही जमाना दे

कागज की हर नाव बहे
हमे हुनर नजराना दे

व्यथित जुलाहा घूम रहा
हाथों  ताना-बाना दे

इस भूगोल क्या भटकना
हर दुविधा  हर्जाना दे

जो कोलाहल के आदी
बड़ी  सजा वीराना दे

सबको  मंजिल एक मिले
सुलझा  पागलखाना दे
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सुशील यादव

१०अक्टूबर

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