Tuesday, 13 November 2018

रहनुमा सा जान उसको ....



है जमाने में वही बस  तमीज वाला
पहन भगवा राह चलता  कमीज वाला

रहनुमा सा जान उसको बिठा करीब
वगरना लोगो सहेजो अपना  निवाला

कब यहाँ से उखड़ जायें तमाम पत्थर
सोच का निकल जाए, कहाँ दिवाला

बून्द भर की प्यास अपनी किसे बताये
वो  नदी के सूखने, जो सजाते प्याला

चुप रहें, तो कौन फरियाद को सुने है
पाँव में जंजीर, मुह को लगा है ताला

हम मनाएं! ढूढ उसको, चलो निकालें
ठौर बदला,राह भटका नहीं उजाला

सुशील यादव

जेखर ये संसार में, लबरा हवे मितान
ठलहा मन के गोठ में,झन फूको जी प्रान
##
उजड़ चुका है बाढ़ में ,संयम का अब खेत
फसलो की मोती कहाँ ,दूर-दूर तक रेत

किस्से और कहानियां ,सब थी कल की बात
आज समय की मार है ,घूसा  लाठी लात

मुझे चाहता है मगर, नहीं बोलता यार
दो-दिन की बस दोस्ती,चार दिनों तकरार

अच्छे दिन के फेर में,किसको चुनते  आप
वजन बराबर तौल कर ,कद को फिर से नाप


झट से चढ़ जा सीढियां ,इस पीढ़ी की मांग
कोई कल को तोड़ दे ,भीम गदा से जांघ

हम पर ये किसने किया ,ऐसा वज्र-प्रहार
आज-अभी से ढूंढ़ लें ,कल का तारणहार


बाहर बैठे लोग हैं ,ज्ञान चक्षु को खोल
अगर चढा कोई नशा,चाणक्य बन के बोल


मोह गया-ममता गई ,राह-चाह  की सून
सर में गोली मार के  ,टेंशन फ्री कानून

पथ दिखलाता था कभी ,पथ से भटका आज
सबको  जिसपे  नाज था ,उतरा वो ही  ताज

कितनी हुई कवायदें ,  तुझको जाएँ  भूल
पर तेरी नादानियाँ , फिर करती मशगूल


तेरी मेरी नादानियां,अतीत समय की बात
दिशा- ध्रुव से ज्ञात है,तारा चमक प्रभात

मन के द्वार विराजिए , नटखट-मोहन- श्याम
धुला-ह्रदय मैं खोलता ,सुबह-दोपहर-शाम

सूने घर जैसे बुने , मकड़ी अपना जाल
वैसे ही प्रभु नाम का,आता रहे ख्याल


बाहर बैठे लोग हैं ,ज्ञान चक्षु को खोल
अगर चढा कोई नशा,राजनीति में बोल


शायद मेरी साधना,निहित कहीं है खोट
हर ऊंचाई नाप कर,मैं पाता हूँ चोट

आज सभी ने खा लिया , पेट-भरा दो जून
कल की केवल राम पर , कैसा हो कानून

अब तो मेरे हाल पर, मुझको छोडो यार
करते-करते  तंग हूँ ,अपना ही किरदार
सुशील यादव दुर्ग

४जून १८

मेरे कद से नाप ले,कद यूँ कभी- कभार
कुर्ता उजला साफ हो,नीयत हो  चमकार
जून 7

छल प्रपंच की बाढ़ में ,मेरी डूबी नाव
एक मिले प्रभु आसरा,शायद होय बचाव
९ सितंबर१८
छल प्रपंच की बाढ़ में ,मेरी डूबी नाव
एक मिले प्रभु आसरा,शायद होय बचाव
सुशील यादव

कुलटा थी संभावना , दिखा गई दर्पण
मै अज्ञानता कर गया ,क्या-क्या उसे अर्पण

अब के बिछुड़े जो मिलें ,ऐसा हो सदभाव
खिंचे -खिंचे से ना रहें ,मन से लगे खिंचाव

होती दुर्गति दूर से ,पास रहो तो  प्यार
जग वाले सब जानते ,मोह नाम संसार
सुशील यादव

बरसो से करते रहे  ,पत्थर फ़ेंक प्रहार
मानवता का नाम ले ,फेंक फूल का हार
९ सितंबर१८


सुने घर में बुन रहा,मकड़ी जैसा जाल
एक तुम्हारी याद ने , जीना किया मुहाल

कोई उस घर में नहीं,है सादगी  सबूत
वर्तमान केवल वहां ,नाच रहा बन भूत


बनना प्रभु का धाम भी ,कैसे बने विवाद
आधार-शिला में रखो ,समझौता बुनियाद

एक तुम्हारी सादगी ,दूजा व्यापक प्यार
उनतालिसवां है बरस,फूले-फले दयार

जी चाहा वैसा मिला,अतीव अतल अथाह
प्रेम भरी थी सादगी, अनुपम था उत्साह


किस दधीचि से मांगना , वज्र बनाने हाड
खतरे में आ बैठ लो,हिला हुआ है झाड़

कौन दधीची दे भला , वज्र बनाने हाड
खतरे में आ बैठ लो,हिला हुआ है झाड़


वर्षगाँठ का आज है ,उनतालिसवां साल
बीते सुख-दुःख साथ में ,प्रभु  रखना  खुशहाल
सुशील यादव

मन में हो गर आस्था ,ह्रदय विराजे प्रेम
वहां कभी क्या पूछना ,कुशल-मंगलम क्षेम

ह्रदय द्वार को खोलिये , करना हो व्यापार
अंधविश्वास  'सेल' में  ,लूटो अपरंपार
  सुशील यादव

मन्दिर बनवा राम का ,ह्रदय बसा लो राम
एक तीर  से हो सके ,शायद दो-दो काम



दो आगे दो को मिला ,हो जाए जब चार
समझौतों का तब दिखे ,होना बेडा पार
सुशील यादव

जी को अपने खोल कर ,दिखलाओ जी आज
दिखे योजना कागजी ,बन्दर बाँट समाज
सुशील यादव

लेना प्रभु का नाम भी ,जी का है जंजाल
हमें  वहीं पे छोड़ दो,होता जहां बवाल



  मंसूबा दिल से बता ,होता  कहाँ  सटीक
  कल भी तू बीमार था ,आज लगे  बस ठीक


कैसे कह दें हम  तुम्हे ,मर्यादा के राम
गिनती के दो-चार तो ,गिनवा दो बस काम


घर से मर्यादा गई ,मन से गया विवेक
आगे मस्तक क्या धरें ,कौन करे अभिषेक

मन  की अंतर्वेदना ,तन में करे खिंचाव
उलझे तनाव  दायरे , कैसे करें बचाव



मत जाओ तुम लांध कर ,गृह-मर्यादा आज
दिशा-हीन हर चाह को ,दण्डित करेसमाज


राजनीति में पालते ,भ्रष्टाचार-रखैल
सबकी माया  एक है,पैसा- पैसा खेल
सुशील यादव दुर्ग

दांत दर्द ..
दन्त कथा ..

दांती वज्र  प्रहार शनि,कैसे करे उपाय
इसी कृपा बूते कभी ,लाखों को निपटाय
##
आज कहूँ फिर से सुनो,कोई साधु न सिद्ध
आसमान से ताकता , सांप-छछुंदर गिद्ध
##
तन से मर्यादा गई ,मन से गया विवेक
आगे मस्तक क्या धरें ,कौन करे अभिषेक
##
सुशील यादव दुर्ग

 २३ जून १८


२३.६.१८



पाप  मुक्त सबको करे ,तेरा यह भगवान
उसके बाद मुझे  कहे ,आका कोई काम
सुशील यादव दुर्ग ,२ जून १८

शायद मेरी साधना, निहित कही पर खोट
हर ऊंचाई नाप कर,पाता रहता चोट
सुशील यादव दुर्ग, ३ जून १८


अब तो मेरे हाल पर ,मुझको छोडो आप
जो मुड़ कर देखा नहीं,मेरा रुदन विलाप
सुशील यादव दुर्ग, ३ जून १८

खूंटे पर ज्यों बांध दे ,निरीह कोई बैल
रुकती साँसे देखती ,जीवन उतरन मैल

परम सत्य आकाश है ,झूठ मोह पाताल
नया बसेरा  खोज तू,अपना आज सँभाल

क्यों कर अब तू पालता,परहित व्यापक मोह
अंत-शरण में दीखते ,केवल खाई-खोह

कभी  परों  को खोल दो, देखो सहज उड़ान
स्थापित करती बेटियां, आसमान  पहचान

नेकी के अब दिन लदे ,सेवा है बेकार
नाम कमा के क्या मिले ,ले जाए सरकार

मन की हर अवहेलना,दूर करो जी टीस
व्यवहारिकता जो बने ,ले लो हमसे फीस
सुशील यादव



तेरा दिल बस छोड़ के ,बाकी सब बकवास
तुझको केवल देख के ,आनन रहे उजास
सुशील यादव

साल नया स्वागत करो ,हो व्यापक दृष्टिकोण
अंगूठा छीने फिर  नहीं ,एकलव्य से  द्रोण
सुशील यादव

ध्वनि की आहट में सहज,मारा करता तीर
प्रतिमा केवल पूज के ,एकलव्य  गंभीर
सुशील यादव ,दुर्ग

भारी जैसे हो गए,नये साल के पांव
खाली सा लगने लगा,यही अनमना गांव
सुशील यादव

ना राहत  की योजना ,ना विकास के पाँव
जिसको पूछे वो कहे ,छुआ तरक्की  गांव

सुख के पत्तल चांट के ,गया पुराना साल
दोना भर के आस दे , बदला लिया निकाल
 
कलेंडर सब उतार दो ,गया पुराना साल
नये साल की  स्वागते,रंग नई दीवाल
सुशील यादव


तेरे पास अकल नहीं ,ले ले ज़रा उधार

तुझसे रिश्ता यूँ लगे ,कोई कर्ज उधार
पीसा की जमीन खड़ी, झुकती सी मीनार

बीते साल यही  कसक,हुए रहे भयभीत
कोसो दूर हमसे रहे ,सपने औ मनमीत

नवा साल उतरे मुड़ी ,जाबे काखर गांव |
साधन तोर घटे हवे ,काला खात-बचांव ||

सुरतावत बनते  बने,अइसन पाछू साल
अतका खिलिस कमल इहां,गाले गाल गुलाल
सुशील यादव दुर्ग



अंगद के जैसा जमे,उखड़े कहीं न पाँव
लूटे सौ-सौ गजनवी,उजड़ न पाए गाँव `

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