2212. 2212 2122 2
बादल मेरी छत को भिगोने नहीं आते
आसान से सदमो में रोने नहीं आते
@@
वादों की रस्सी मे तनाव आ गया है
मंदिर के चर्चे हैं चुनाव आ गया है
गुस्ताख स्वागत माफ करना हुजूर
चेहरे पे मसलन खिचाव आ गया है
रोगग्रस्त थी उफ ये नदी पांच साल से
अब की बारिश कैसा बहाव आ गया है
ये लोग उठाने से कतरा रहे परचम
इरादों मे इनके बदलाव आ गया है
खबर हमें भी थी कोई लहर उठेगी
समुन्दर के रस्ते कटाव आ गया है
लादेन जा रहा था अपने पैरो चल के
पुतिन जो मिला ठहराव आ गया है
हुकूमत की ऐसी लग गई है आदत
सच लगे बेचने कि भाव आ गया है
##
नज्म : :हर्फ -हर्फ फूल
अब तो वो कतरा के निकल जाता है
जाने क्यूँ खुद शरमा के निकल जाता है
अब काटता चक्कर नहीं कहीं गली के
अगर मिले नजर चुरा के निकल जाता है
उसकी हालत पे मै तरस खाऊं या वो
लम्हा लम्हा सता के निकल जाता है
काटने दौड़ती है रात अजीब तन्हाइयाँ
जो सिल्वट बिछा के निकल जाता है
मुझे मालुम है अपनी खता खामियाँ
यादें यूँ जंगल ऊगा के निकल जाता है
किताब मे नजर गड़ाऊं भी मैं कहाँ
हर्फ हर्फ फूल दबा के निकल जाता है
कहाँ इस जंगल में आग न लगती
**
ये दिन काश हमारे होते
हम आंखों के तारे होते
दूर न होती मंजिल अपनी
पास कहीं दिल हारे होते
बचपन जाओ ढूंढ के लाओ
अक्ल के दुश्मन सारे होते
अधिकार बिना अब क्या जीना
छीन झपट के चारे होते
तुम भी अफसोस किया करती
दांव लगा जब हारे होते
हमको डूबना आ ही जाता
यदि मालूम किनारे होते
निकले थे घर छांव छोड़कर
ऐसे ही बंजारे होते
खुली किताब समझ के पढना मन
चाहे वारे न्यारे होते
इस जंगल में आग न लगती
कुछ दिन और गुजारे होते
खौफ जदा पेशानी में भी
मानिंद बर्फ नजारे होते
हमको लगता तेरी खातिर
हम नजदीक सहारे होते
@@@
1222 1222 1222 22
गज़ल
#
जमीनों में छिपा रक्खा खजाना मिल जाए
जुदा बरसों कोई साथी पुराना मिल जाए
#
हमें ख़त क़े नहीं मिलते पढ़े होने का सबूत
फकत मजनून भाँपे हों,हर्जाना मिल जाए
#
नहीं मिलते कभी शहरों सहज रिश्ते जन्मों क़े
बनावट क़े विज्ञापन कुछ बहाना मिल जाए
#
गली में जो गुजरती शाम क्या कहने उनके
मेरी तकदीर मौसम वो सुहाना मिल जाए
#
मुकम्मल ही नहीं खाना -बदोशी क्या कीजे
खुदा की बारहा रहमत ठिकाना मिल जाए
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग छत्तीसगढ़
7. 6.22
3मई 2020
चौपाई :बरसात में ....
पानी-पानी, आया पानी | गर्मी दूर भगाया पानी ||
सबने खूब निकाले छाते | रंग-बिरंगे, काले छाते ||
सुख की गिनती कौन करेगा, अब जो भीतर भीग डरेगा |
यूँ ना देखी होगी बारिश , सहमी-विनती और गुजारिश |
लो कृषको का मन हर्षाया, मेघ-घटा, उमड़- घुमड़ आया |
हल लेकर ये खेतों निकले ,मिटटी कोना- सोना पिघले |
हो जाती हर शाम-सुहानी,देखो छेड़ अतीत कहानी |
बचपन की नावों का मिटना ,भीगे-भीगे आकर पिटना |
बारिश पानी बहता जाता ,सूखा-नाला भी उफनाता |
किन्तु हमी-हम ठहरे होते ,नम रिश्ते भी गहरे होते |
सुशील यादव दुर्ग
गीत
उम्र क़े इस पड़ाव में.....
#
दर्द जहाँ मैं टांगा करता, टूटी आज वो खूंटी लगती
सारे संबल सभी आसरे,बिना असर की बूटी लगती
##
लेकर चलना उसी गली में,यादों का भरता हो मेला
बचपन खेल घरोंदे वाले,नाव डूबता रहूँ अकेला
0
अब उम्र क़े इस पड़ाव में, कितनी बातें छूटी लगती
##
अरमानों जब पँख नहीं थे, आकाश लगा करता छोटा
उड़ने की जब ताकत आई,व्यवधानो ने अक्सर टोका
0
शेष नहीं कुछ कहने जैसा,गुम नगीना अंगूठी लगती
##
इन बाजुओं का दम है,पहले जैसा आज भी क़ायम
आज भी मिलने की चाहत,रत्ती भर उत्साह नहीं कम
0
चाहत की अब दुनियां तुझ बिन खाली - खाली झूठी लगती
##
उमंग उजालों की सजती,सदा रहे पहचान दिवाली
मुस्कान बांटते जाना यूँ,तमाशबीन बजा दे ताली
0
मंहगाई की हाथ थमी हो ,विपदा की लो सूटी लगती
##
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ़
मोबाईल :7000226712
विपदा की परछाई में
O
पहले जैसा अब कहीं,होता नहीं कमाल
फँसा धोखे शेर हो, चूहा कुतरे जाल
कभी उतरता ही नहीं, सत्ता गजब बुखार
बारह बरस पोंगरी, अजमा ले सरकार
सुशील यादव दुर्ग
कोई तिलस्म सा लगे, तेरा रूप निखार 👌
मौसम कितना छीन ले,
@@
1.
आजकल जाने क्यों.....
#
एक गलत सोच, आखों की स्याही बदल देता है
समूचे शहर को बारूदी , तबाही बदल देता है
#
फर्क पड़ता नहीं तुम्हारे ऐशो- आराम में तनिक
आंकड़ो की मुनादी ही बस गवाही बदल देता है
#
रिश्तों को निभाना इतना नहीं आसान आपस में
जुबान की जरा तलखी आवाजाही बदल देता है
#
मजबूरी ये कि हम बदल नहीं सकते खुद पडोसी
सामने का मुल्क बातों की कड़ाही बदल देता है
#
छीन कर ले जाता था कोई मेरा चैन -करार वही
आजकल जाने क्यों तरीका उगाही बदल देता है
#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ़
मोबाईल :7000226712
2.....
2212 2212 1222
यूँ ही मुझे जो शर्मसार करना था
शर्मिंदगी बेशक इजहार करना था
==
मिलती जमाने से अगर इजाजत नहीँ
छिपते- छिपाते तुझको प्यार करना था
==
अपनों क़े मरने से निराश कुछ होते
गम सूखने का इंतिजार करना था
==
लाये उठा जो आफ़ताब पहले ही
तो रात समझौता सौ बार करना था
==
है सामने बिकते उसूल क़े नजीर
मगर उसी पे हमें एतबार करना था
==
@@
3...
2212 2212 222
बात तल्ख़ सी
#
मेरी जुबां जब भी फ़िसल जाती है
कुछ बात तल्ख़ सी बस निकल जाती है
#
खामोश हो जीने का मकसद भी क्या
खामोशियाँ गम में बदल जाती है
#
बैसाख या आषाड़ सावन भादो
मजबूरियां मौसम निगल जाती है
#
उसको तराशे थे हमी जी जान से
हीरे की सूरत अब तो खल जाती है
#
लाखों की चाहे हो कमाई दौलत
सरकार की नजर आजकल जाती है
##
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ़
मोबाईल :7000226712
@@
4.
2212 2212 2122
सनसनी....
अब तो यहाँ इस बात की सनसनी है
हाथों में पत्थर, और जान पे बनी है
#
हमने तराशा हीरे की शक्ल-सूरत
लिपटी वहीं पे तरबतर चाशनी है
#
सरकार क्यूँ हैं आग बबुला से मेरे
दब कौन सी नस गई, चढ़ी झुंझुनी है
#
खामोश हो जीने का मकसद यहाँ क्या
आसार बारिश ,मेघ परतें घनी है
#
ये फैसलों क़े बाल सारे हैं सफेद
राहत यहां कमजोर सी संगनी है
#
तुम हो कहां सब आजमाने लगे हैं
उम्मीद की हर किरण अब अनमनी है
#
रहबर मिले तो मंजिले खूब आसान
वरना तो खुल्ले आम अब रहजनी है
##
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ़
मोबाईल :7000226712
.
.2212 1212 22
आल्हा 16 15
ज़िन्दगी
2.
यूँ ही मुझे जो शर्मसार करना था
शर्मिंदगी का जरा इजहार करना था
==
जमाने से अगर नहीं थीं इजाजत
छिपते- छीपाते क्या प्यार करना था
==
लोग अपनी मय्यत में क्या ले जाते
मरने की दुआ का इंतिजार करना था
==
उठा लाते सुबह से पहले आफ़ताब
रात गिड़गिड़ाना सौ बार करना था
==
नजीर है सामने उसूल बेचते लोग
मगर उसी पे हमें एतबार करना था
==
ज़िन्दगी
2212 2212,2122
यूँ ही मुझे जो शर्मसार करना था
शर्मिंदगी हर हाल इजहार करना था
==
मिलती जमाने से अगर ना इजाजत
छिपते- छिपाते ही प्यार करना था
u
लोग अपनी मय्यत में क्या ले जाते
मरने की दुआ का इंतिजार करना था
==
उठा लाते सुबह से पहले आफ़ताब
रात गिड़गिड़ाना सौ बार करना था
==
नजीर है सामने उसूल बेचते लोग
मगर उसी पे हमें एतबार करना था
हैं मुश्किल ये घड़ी बहुत थोड़ी राहत दे दे
@@
2122 2122 2122
कातिलों क़े शहर में.....
#
फूल की खुशबू वफा में चमक क़े लिए
हो नहीँ बस जंग आपसी नमक क़े लिए
#
वक़्त ने देखा जहर नफ़रत का घुलता
बोलते क्या- क्या रहे तुम सनक क़े लिए
#
आज भी तेरी कहीं से याद आती
छोड़ती है रात लम्बी कसक क़े लिए
#
एक हम जो दे रहे हैँ आज दस्तक
यूँ सभी लापता हैं शफक क़े लिए
#
कहने को बाक़ी बचा क्या पास मेरे
कातिलों क़े इस शहर में रमक़ क़े लिए
#
रहगुजर में बैठ कर यूँ देखता रहा
आस तो मिटती कहां इक झलक क़े लिए
#
मयकदे में जो नसीहत पी गया हो
खैर उसकी क्या मनाएं शतक क़े लिए
#
शफक = क्षितिज की लाली
रमक़ = रही सही जान, थोड़ी सी जिंदगी
#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ़
मोबाईल :7000226712
2212 2212 2212 112/22
माथे शिकन कब चेहरा आकर तनाव गया
सच बेचने निकला जहाँ लाखो का भाव गया
क्यूं तौलते अपनी गरज से लोग आजकल
लगता तुम्हारे शहर से होकर चुनाव गया
माथे पे शिकन, चेहरे पर चाहे तनाव आ जाये
सच कभी न बेचिये लाखों भले भाव आ जाये
लोगों को तौलते हैं अक्सर अपनी गरज में आप
बिना मकसद कब पूछते,जब न चुनाव आ जाये
उनके इशारों में तो फिजूल लाख लुटा देते हैं
बात तब हैं ईंट पत्थरो क़े घर लगाव आ जाये
अपना कुनबा छोड़ क़े यायवर कब तक जियें चढ़ती उमर क़े फैसलों में कहीं कसाव आ जाये
बारिश क़े भरोसे में नदी उफनाती रही यक़ीनन
किसे मालूम किस ढलान कहां रिसाव आ जाये
26.6.22
मौसम....
#
मेरे चाहने से कब बदला है मौसम
तेरे कहने पे जो चलता है मौसम
#
घुटने - घुटने पानी जब नावें चलती
ठहरा - ठहरा तब तो लगता है मौसम
#
नदिया बीच भंवर मेँ फँस कर ये जाना
खुद भी कैसे रह लेता तन्हा मौसम
#
एक दूजे की करते पूछ परख तब तक
तिरपाल तले हो कुनबा सूखा मौसम
#
सालों बाद भटकते आया है जाने
कुछ तिलस्मी, फिल्मी कुछ गोया मौसम
#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ़
मोबाईल :7000226712
2212 2212 2212 1222
मालूम किसे....
@
माथे शिकन, या चेहरा चाहे
तनाव आ जाये
सच को कभी ना बेचिये
लाखों का भाव आ जाये
@
लोगों को तुम हो तौलते
अपनी गरज से आए दिन
मकसद बिना कब पूछते,
जब ना चुनाव आ जाये
@
उनके इशारों में फिजूल
लाखों लुटा रहे हो क्यूं?
है बात तब,
घर,ईंट, पत्थर से लगाव आ जाये
@
क्या छोड़ क़े कुनबा,
जियोगे जिंदगी, फकीरो की
अब सोचना, इन फैसलों में
फिर कसाव आ जाये
@
बारिश भरोसे ये नदी तो,
उफनती रही हरदम
मालूम किसे किस तरफ ढाल
कहां रिसाव आ जाये
@
सुशील यादव दुर्ग
न्यू आदर्श नगर,जोन 1 स्ट्रीट 3 A
दुर्ग छत्तीसगढ़
मोबाईल :7000226712
@@
किताबों में दबे फूल का मौसम ..
##
ख्वाबो में खुशबू ख्यालो ललक नहीं है
तेरी आँखों में पहली सी चमक नहीं है
#
आती कभी दूर से जो आवाज तेरी
पास वहां देखू तो गूंज गमक नहीं है
#
बीमार बंद खिड़की, खामोश दरबाजे
गलत पते पर लिखा है खत शक नहीं है
#
किताबों में दबे फूल का मौसम गया
रिवाजो खिले फूलों में महक नहीं है
#
मेरी नाकामियां आओ घेर लो मुझको
पहले सा टूटने में अब झिझक नहीं है
##
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर जोन वन स्ट्रीट 3 दुर्ग छत्तीसगढ़
7000 226712
सच की नाभि में ऐठन खिचाव नहीँ हैं
# @
122
किताबों दबे फूल का देख मौसम नहीँ हैं
@
2212 2212 2212
आओ शहर में एक नया बदलाव मिले
शिद्द्त से सच की खातिर
लोगो का सच क़े लिए
सच की तरफ शिद्द्त से झुकाव मिले
@
1222 1222 1222
तमाचा वक़्त का...
#
किताबों में कहां अब फूल मिलता है
बचे लोगों ले दे क़े उसूल मिलता है
#
सभी पाशे चले शकुनी की अब चालें
जिसे मौका सही अनुकूल मिलता है
#
विरासत को बचाने की कवायद हो
वगरना मशवरा उल जुलुल मिलता है
#
नहीँ है कायदे से कोइ रखवाला
सियासत सादगी अब धूल मिलता है
#
क़ोई कांटे बिछा क़े जब चला जाता
तमाचा वक़्त का माकूल मिलता है
#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर जोन वन स्ट्रीट 3 दुर्ग छत्तीसगढ़
7000 226712
हमारे शब्द......
@
ना जाने
किन पैरों पर
खड़ा रहता है आसमान
दिन -रात बिना थके हुए
?
मेरे - तुम्हारे शब्दों को
बैसाखी की होती है जरूरत
.....,
हम, यहाँ -वहाँ,
अनाप -शनाप
बेहूदगी मेँ बोलते हैं,
या कहो...
सहानुभूति की किताब
उस जगह से खोलते है
जहाँ पृष्ठ भर
हासिये क़े सिवा
होता नहीं कुछ.....
@
हमी,जिद्दी, सिऱ- फिरे
इन हाशियों मेँ भी
तलाशते हैं
क़ोई ईश वंदना
किसी बुद्ध की सोच....
जैसे,
न जाने किन पैरों पर
खड़ा रहता है आसमान...?
काश....!
हमें
बता दिया गया होता
आसमान कुछ नहीँ
एक हवा है-
धुआँ है-
शून्य है....
और हवा को
धुँआ को
शून्य को
क़ोई बैसाखी
चाहिए भी नहीँ होती?
वैसे ही वो
अपने शाश्वत सत्य पर
टिका रहता है
दिन -रात बिना थके हुए.....
काश हमारे शब्द
हवा की तरह
धुँआ की तरह
शून्य की तरह
होते...
अपने मूल्य पर
टिके रहने को
जरूरत नहीँ होती उनको,
बाजार मेँ बिकने वाली
बैसखियों की.......
@@@#
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर जोन वन स्ट्रीट 3 दुर्ग छत्तीसगढ़
7000 226712
खोज जारी है ...
अब दुश्मन जाने पहचाने हैं
यारो हम भी बहुत सयाने हैं
है आज-जुदा फिर राम-कहानी
समझौतों के स्याह निशाने हैं
मुस्कान पकड़ में कम आती है
गम के चौतरफा अफसाने हैं
परिचय अपना, मैं तुमको क्या दूँ
चर्चित तो नाकाम बहाने हैं
सबने जी भर तौला-परखा मुझको
गुजरे - बीते इतिहास पुराने हैं
दिल भीतर खोज अभी है जारी
दाल अभी तो बहुत गलाने हैं
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर ,दुर्ग ,छ ग
@@
समय मिले तो ढूढना .....
##
सुख की चादर तान के, सोए रहते आप
समय मिले तो ढूंढना , आस्तीन के सांप
#
सभी समझ को भूलकर,बातें रख लो याद
हरा -भरा भी सूखता, बिन मिट्टी बिन खाद
#
शनै-शनै छोटा हुआ, संयम का आकार
अब तो केवल क्रोध का, फैला खरपतवार
#
छोटा अब लगने लगा, रोटी का अनुपात
आश्वासन की बेड़ियां नियमित शाम-प्रभात
#
करते-करते तंग हूं, मैं अपना किरदार
अब तो मेरे हाल पर, मुझको छोडो यार
#
गांधी मिलकर गोडसे, पूछते कुशलक्षेम
इसे नोट महिमा कहें, या मानवता प्रेम
#
शायद मेरी साधना,निहित कहीं है खोट
हर ऊंचाई नापकर,पाते रहता चोट
#
तेरा होना इतर सा ,देता था एहसास
तेरे बगैर यूं लगे, चला गया मधुमास
#
कैसे जाने फैलता ,जीवन का आकार
साँसों से होता नहीं ,घड़ियों का व्यापार
##
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग....
आओ देखें चाहत के सपने
तेरे राज में राहत के सपने
कैसे जीते लेकर लोग यहाँ
बद -जुबान आदत के सपने
मुँह मेँ हो केवल राम- विराजे
रखते बगल अदावत के सपने
अपनों ने उन को छोड़ दिया है
लेकर सोच बगावत के सपने
काश कि मैं भीअब देखा करता
गाफ़िल नींद मुहब्बत के सपने
@#
2212 2212 1222 2
अहसास ....!
है कौन,जो तन्हाई को सदा देता है
मुझको कभी,बन के सबा हिला देता है
मैं सुनने का आदी नहीं,मगर कानो में
सुर-ताल-नगमा सा कहीं,सुना देता है
हिलती रही दीवार पर,तेरी परछाई
अहसास, अक्स कई तरह,बना देता है
जिस राह पर होती रही मुलाकाते,आज
उस रास्ते पहरा कोई बिठा देता है
गुमनाम से अँधेरे हम निकल भी आये
हालात जीना, हाल हर सीखा देता है
अंजान सा बैठा छिपा हुआ नासूर अब
खुद हरकतों अपनी कभी डरा देता है
मत सोचना, मेरे कदम के नक्शो चलना
जंगल करीब यकबयक पहुचा देता है
है तलब हमको तेरी किया क्या जाए
ये नाव गलत सुराख ही डुबा देता है
मजबूरियां है या समय फरेबी जाने
दीवार साझा बीच में उठा देता है
सुशील यादव
न्यू आदर्श नगर दुर्ग
10.7.17
2212 2212 1222
दीवार साझा....
है कौन जो तन्हाई मेँ सदा देगा
बन के सबा मुझको जरा हिला देगा
Q
क़ोई सुने ये तल्ख़ सी हकीकत को
किस जुल्म की मुनसिफ़ मुझे सजा देगा
Q
तुम जो रहो गर उम्र भर करीब मेरे
दिनरात चुटकी मेँ समय बिता देगा
Q
हिलती हुई परछाई से रखो दूरी
बेमौत कब दीवार यहीं टंगा देगा
Q
जिस राह पर होती रही मुलाकातें
पहरा क़ोई उस मोड़ पर बिठा देगा
Q
गुमनाम अँधेरे से हम निकल आये
हालात जीना,भी हमें सिखा देगा
Q
अंजान सा बैठा छिपा हुआ नासूर
कब हरकतों आकर कहीं डरा देगा
Q
मत सोचना, नक्शे कदम मेरे चलना
ले जा बियाबान एक दिन गिरा देगा
Q
तेरी तलब है हमको मगर करें तो क्या
बस तंज ही काफी इसे डुबा देगा
Q
मजबूरियां है या समय फरेबी सा
दीवार साझा बीच कल उठा देगा
Q
टीकमगढ़ 11.7.22
जंगल जंगल फैला रहे, वहमों का तुम जाल
जान सको तो जान लो, जनता है किस हाल
सुशील यादव दुर्ग
फलदार दोहे...
Q
सपने सब तो हो गए,घर मेँ चकनाचूर|
अरमानो के बेचते, सड़कों मेँ अंगूर ||
Q
केला हमें मिले नहीँ, अमरुद बढ़ते दाम |
राहत खोजे आदमी, गली गली बदनाम ||
Q
आकर कब से चल दिया ,मौसम जो था खास |
तुम्ही छीलते रह गए, बंजर जंगल घास ||
Q
कहाँ - कहाँ मैं रोपता, सच्चाई की झाड़ |
दंभ भरे माहौल मेँ, बुलडोजर है सांड़ ||
Q
मौका जिसको मिल गया, अकबर हुआ महान
वरना खेतों रात दिन, जी भर जुते किसान
Q
राहत के सब आंकड़े, फेंको कूड़ादान
पेड़ो पर अब फल नहीँ, लटके मिलें किसान
Q
मन मेँ कौन उगा रहा, धतुरा और बबूल
साथ निभाने की कसम, बैठे सारे भूल
Q
अपने मन की आड़ मेँ, कर कानूनी बात
लेता छप्पर फाड़ के, ई डी की सौगात...,
Q
कल की अपनी सोच पर, होती हमको खीझ
नालायक सब चुन लिए, बातों -बातों रीझ
Q
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